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नोएडा एक्सटेंशन में फ्लैट बुक कराने वालों का क्या होगा?

उच्चतम न्यायालय ने ग्रेटर नोएडा में किसानों की 156 हेक्टेयर जमीन बिल्डरों को देने के यूपी सरकार के निर्णय को गलत करार दिया है और यह जमीन किसानों को वापस लौटाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को उचित बताया है. इससे वे लोग फंस गए हैं जिन्होंने बिल्डरों की हाउसिंग योजनाओं में फ्लैट बुक कराए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण पर 10 लाख रुपये जुर्माना भी ठोंक दिया है. न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और एके गांगुली की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण ने नियमों का उल्लंघन कर जमीन बिल्डरों को दी है.

उच्चतम न्यायालय ने ग्रेटर नोएडा में किसानों की 156 हेक्टेयर जमीन बिल्डरों को देने के यूपी सरकार के निर्णय को गलत करार दिया है और यह जमीन किसानों को वापस लौटाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को उचित बताया है. इससे वे लोग फंस गए हैं जिन्होंने बिल्डरों की हाउसिंग योजनाओं में फ्लैट बुक कराए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण पर 10 लाख रुपये जुर्माना भी ठोंक दिया है. न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और एके गांगुली की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण ने नियमों का उल्लंघन कर जमीन बिल्डरों को दी है.

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण, आम्रपाली, सुपरटेक जैसे बिल्डरों की याचिका दिया. ज्ञात हो कि यूपी सरकार ने नोएडा एक्सटेंशन के छह गांव की भूमि उद्योग स्थापना के नाम पर अधिग्रहित की और उसे मास्टर प्लान बदलकर रिहायशी घोषित कर दिया. फिर इसे महंगे दाम पर बिल्डरों के हवाले कर दिया. बिल्डरों के लिए ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने ‘स्टैग्गर्ड पेमेंट स्कीम’ यानी किश्तवार भुगतान स्कीम की घोषणा की. इसके तहत भूमि आवंटन के समय बिल्डरों को जमीन की कीमत का 10 फीसदी अदा करना था, बाकी पैसा नौ किश्तों में दस साल में जमा करना था. नोएडा एक्सटेंशन के ज्यादातर हाउसिंग प्रोजेक्ट इसी स्कीम के तहत बनाए जा रहे थे. बिल्डरों ने फ्लैट बुक करने वाले ग्राहकों से वादा किया कि वे उन्हें तीन से चार साल में फ्लैट्स देंगे. वजह यह कि वे ग्राहकों से पैसा लेकर प्राधिकरण को जमा करते. अब नोएडा एक्सटेंशन में फ्लैट्स खरीदने वालों के सामने सवाल है कि अगर बिल्डर अथॉरिटी को पूरा पैसा जमा नहीं कर सके या बीच में प्रोजेक्ट बेच दी गई या बंद हो गई तो इस सूरत में ग्राहकों का क्या होगा. फिलहाल उनकी स्थिति मुश्किल भरी हो गई है जिन्होंने इस प्रोजेक्ट के तहत फ्लैट बुक कराया है. कोर्ट ने अपने निर्णय में जो कुछ प्रमुख टिप्पणियां की हैं, वह इस प्रकार है-

1. ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण ने नियमों का पूरी तरह उल्लंघन कर बिल्डरों को जमीन दी है जबकि भूमि का अधिग्रहण करने की वजह कुछ और बतायी गयी थी.

2. बिल्‍डर और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी किसानों का दर्द नहीं समझ सकते, किसान के लिए जमीन उसकी मां के बराबर है.

3. अफसर भूमि अधिग्रहण पर ‘औपनिवेशिक कानून’ का फायदा उठाकर धनी लोगों की झोली भरने के लिए किसानों को उनकी उपजाऊ कृषि भूमि से वंचित कर रहे हैं.

4. राज्य सरकारें कानून का फायदा उठाकर गरीबों से भूमि लेने और उसे बिल्डरों को देने का ‘कुटिल अभियान’ चला रही हैं, जहां मल्टीप्लेक्स, मॉल, पॉश रिहायशी परिसर विकसित किए जा रहे हैं, जो आम आदमी की पहुंच के बाहर हैं. क्या यह सार्वजनिक उद्देश्य की धारणा के तहत आता है जिसके लिए भूमि का अधिग्रहण किया गया है.’

5. यह वो योजना नहीं है जिसके लिए भूमि का अधिग्रहण किया गया था. भूमि के इस्तेमाल में बदलाव के लिए कैसे अलग-अलग अधिसूचनाएं आईं.

9. भूमि विकास के लिए दी जाती है जो निश्चित तौर पर समावेशी होनी चाहिए. राज्य गरीबों के खिलाफ कानून का फायदा उठा रहा है. विभिन्न राज्य सरकारें कपटी अभियान चला रही हैं. राज्य बिल्कुल जनविरोधी काम कर रहा है.

10. भूमि अधिग्रहण के उद्देश्यों को विफल किया जा रहा है. जनहित में समाज के सबसे गरीब व्यक्ति को लाभ मिलना चाहिए लेकिन अधिकारी इस तरह काम कर रहे हैं कि उन्हें (गरीब और आम आदमी) हटाया जा रहा है.

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