करीब दो-ढाई दशक में ठेला लगाने से लेकर पचास हजार करोड़ की सम्पत्ति बनाने वाली पोंटी चड्ढा एंड कम्पनी को लेकर जो कुछ सामने आ रहा है वह हमारे इस कथित लोकतंत्र का विद्रूप है। हमारे राजनेताओं, नौकरशाहों, जनप्रतिनिधियों, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने अपने निहित स्वार्थों के लिए इनके साथ मिलकर लूटखसोट का जो नंगा नाच किया, उसे देख आम लोग हैरान हैं। लेकिन उत्तराखंड आन्दोलनकारियों ने माफिया संस्कृति विरोधी जन अभियान चलाकर इन तत्वों को कड़ी चुनौती देते हुए अपराध अराजकता, लूटखसोट के इन खलननायकों उनके दलालों और पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों को बेनकाब करने की पूरी कोशिश की। यह और बात है कि इस दौर में कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सपा और उक्रांद तक के कुछ नेता इनकी कठपुतली बनकर लोकतंत्र को कलंकित करते रहे। दूसरी ओर, अपने घर और समाज को बचाने के लिए बार-बार सड़कों पर उतरी ग्रामीण महिलाओं ने शराब माफिया के इन गिरोहों को कड़ी चुनौती दी; पर उनका साथ किसी जन प्रतिनिधि, अखबार या सरकार ने नहीं दिया। उल्टे ये सभी लोग उत्तराखंड और समाज को बर्बाद करने वाले तत्वों के आगे नतमस्तक रहे।
इस दौर में आम जनता को कानून के राज का पाठ पढ़ाने वाले पुलिस प्रशासन के अधिकतर अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं के साथ मिलकर इन माफिया के गुर्गों को अपनी समानांतर सरकार चलाने का मौका देते रहे। यह एक ऐसा दौर था जब कुमाऊं-गढ़वाल की हर पुलिस चौकी-बैरीयर पर इन धन्धेबाजों (इन्हें कंपनी के नाम से पुकारा जाता था) के गुर्गे आम जनता की तलाशी लेकर उनसे अभद्रता करते थे। लोकतंत्र के पूरे तंत्र के बिक जाने के इस दौर में उत्तराखं जन अधिकार मंच और माफिया संस्कृति विरोधी जन अभियान ने इनका जमकर प्रतिकार किया। यह वह दौर था जब अल्मोड़ा के हुक्का क्लब जैसी प्रतिष्ठित सांस्कृतिक संस्था पोंटी के स्थानीय एजेंटों को अपने परिचय पोस्टरों में प्रमुख सहयोगी के रूप में प्रचारित कर विशेष सम्मान दे रही थी। इन कोशिशों का विरोध करने पर और खलनायकों को नायक बनाने की प्रवृति को लेकर मार्च-अप्रैल 2003 में हुक्का क्लब के सचिव शिवचरण पांडे के साथ जोरदार विवाद हुआ था। उन दिनों खेल मैदानों से लेकर सांस्कृतिक मंचों, अखबारों के पृष्ठों पर टुकड़खोर लोग पोंटी के गुर्गों के यशोगान में व्यस्त रहते थे और शराब के तस्करों को श्रीनगर गढ़वाल में सम्मानित कर अपनी औकात दिखा रहे थे। अपने प्रतिकार से बौखलाये इस गिरोह ने इन लेखक के खिलाफ बेनामी अनर्गल पर्चे-पोस्टरों के माध्यम से बरसों तक युद्ध छेडे़ रखा। इस काम में प्रबुद्ध समाज के अनेक लोग, अधिवक्ता, पत्रकार और कथित संस्कृतिकर्मी शामिल थे।
पोंटी चड्ढा गिरोह ने पुजारियों से मिली भगत कर उत्तराखंड के मंदिरों पर कब्जे के सुनियोजित प्रयास किये। इन मन्दिरों में शराब के तस्करों के गिरोह भंडारे के नाम पर लोगों को बुलाते थे, जिनमें जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक स्तर तक के अधिकारी शामिल होते थे। पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों, छात्र नेताओं, और कथित जनप्रतिनिधियों को अपने साथ मिलाकर इन गिरोहों ने अपने खिलाफ बोलने वाले समूहों को धमकाकर और चुप कराने के लिए सरकारी तंत्र और पुलिस का बेजा इस्तेमाल किया। इस कथित शराब कम्पनी के लोग जहां एक ओर “प्रेस” लिखे वाहनों से भी शराब की तस्करी करते थे, वहीं शराब का धंधा करने वाले अपने प्रतिद्वंद्वी लोगों को खुद गिरफ्तार कर उनसे मारपीट करते और पुलिस के साथ मिलकर उन पर चरस के मुकदमे लगवा देते थे।
ऐसे ही एक मामले में पीडि़त एक व्यक्ति की शिकायत पर अल्मोड़ा के तत्कालीन सीजेएम श्री डीपी गैरोला ने अल्मोड़ा कोतवाली को इनके गुर्गों कैलाश चन्द्र, इनके मैनेजर कमल कपूर, पुलिस सब-इंस्पेक्टर, और पुलिस के दीवान समेत 20-25 लोगों के खिलाफ 10 फरवरी 2000 को धारा 342, 323,147 के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज करवाया था। उन दिनों इस तरह की घटनाएं आम थीं और पूरा पुलिस प्रशासन लगभग इनके हाथों बिका हुआ था। इन गिरोहों की हरकतों के खिलाफ उत्तराखंड जन अधिकार मंच की ओर से 23 फरवरी 2000 को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के नाम दर्जनों लोगों ने ज्ञापन भेजा। इसके बाद इन तत्वों ने विभिन्न राजनीतिक दलों में अपने समर्थकों के साथ मिलकर सीधे दुष्प्रचार शुरू कर दिया। इन तत्वों ने स्थानीय केबिल मालिक के माध्यम से उन चैनलों का प्रसारण रोक दिया जो इन माफिया का विरोध करते थे। सितम्बर 2004 में जिला बार एसोसिएशन और तमाम लोगों ने जब इसका विरोध शुरू किया, तब मजबूर होकर इनमें से एक सहारा न्यूज़ चैनल को खोला गया। इस दौरान प्रत्यक्ष में माफिया का विरोध करने वाले अनेक स्वनामधन्य नेताओं की बाहरी चुप्पी एवं आन्तरिक मिलीभगत भी सामने आयी, चूंकि जनता जानती थी कि ये लोग केबल ऑपरेटरों के कितने खासमखास हैं। इसी दौरान इस कंपनी के गुर्गों ने न्यायदेवता के नाम से विख्यात अल्मोड़ा के चितई मन्दिर के पुजारियों के साथ सांठगांठ कर जीर्णोद्धार के नाम पर लोगों द्वारा चढ़ाई गयी घंटियों को गलाकर उनके बड़े-बड़े घंटे बनाकर उन पर अपना नाम लिखकर मन्दिर के चारों ओर सजा दिया और मन्दिर के मुख्य द्वार पर अपने एक हिस्ट्रीशीटर गुर्गे हरिप्रसाद वर्मा का शिलापट्ट लगा दिया जो आज भी आस्थावान जनता का मुंह चिढ़ाता है। ज्ञातव्य है कि हरिप्रसाद वर्मा गैंगवार में मारा गया था। जनआस्था पर चोट करने वाली इस कार्यवाही के खिलाफ अनेकलोगों ने माफिया संस्कृति विरोधी जन अभियान शुरू किया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य शराब माफिया, असामाजिक तत्वों को सामाजिक मान्यता दिये जाने के खिलाफ जनप्रतिरोध खड़ा करना और चितई मन्दिर से जुडी इनकी हरकतों को मुद्दा बनाकर समाज को इनके दुष्प्रभाव से मुक्त कराना और उनका साथ देने वाली ताकतों को बेनकाब करना था।
लम्बे समय तक इस अभियान के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े “बजरंग दल” के लोग खुले आम माफिया के साथ सड़क पर उतरे और 01 जनवरी 2004 को चितई मन्दिर में माफिया संस्कृति विरोधी कार्यक्रम के दौरान इन तत्वों ने आन्दोलन के नेतृत्वकारी साथियों एवं महिलाओं के साथ अभद्रता की और वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों ने इन तत्वों का साथ दिया। पिछले 20-22 वर्ष में इन असामाजिक तत्वों ने अपने समाज को शराब से मुक्त करने की हर कोशिश का नेतृत्व करने वाले लोगों, महिलाओं और समुदायों के खिलाफ सुनियोजित दुष्प्रचार कर उन्हे उत्पीडि़त करने की हरसम्भव कोशिश की है और दूसरी ओर पहाड़ में शराब का विरोध करने वाली महिलाओं के मनोबल को तोड़ने के लिए काफलीखान, दन्यां, गंगोलीहाट, ताकुला, बसौली, लमगड़ा, और चम्पावत समेत प्रतिरोध के हर क्षेत्र में घृणित कार्यवाहियां कीं. ग्रामीण महिलाओं के नाम से आबकारी ठेके लेने के लिए पर्चियां डलवायीं और यह प्रचारित करने की कोशिश की कि उत्तराखंड की महिलायें अब शराब के खिलाफ नहीं, वरन शराब व्यापार में हिस्सेदार के रूप में सामने आ रही हैं। शराब के इन कुख्यात गिरोहों ने शराब के कारोबार के लिए फर्जी पत्रों और ड्राफ्टों की फोटोस्टेट लगाकर जरूरी हैसियत प्रमाण बनवाये। इन मामलों को भी माफिया विरोधी अभियान ने सामने लाकर सूचना अधिकार अधिनियम से इस पूरे गड़बड़झाले का पर्दाफाश किया, लेकिन प्रशासन ने तब भी इनके खिलाफ कार्यवाही नहीं की।
इस दौरान प्रशासन ही नहीं, मीडिया का एक वर्ग भी इनके साथ खड़ा हो गया था। स्थिति इतनी खराब थी कि यह लेखक जिस दैनिक अखबार में काम करता था, उसके प्रधान सम्पादक से मिलकर पोंटी चड्ढा ने यह फरमान जारी करवा दिया कि माफिया विरोधी अभियान की कोई खबरें प्रकाशित नहीं की जायेंगी। देखने की बात यह थी कि इस दैनिक अखबार में काम करते हुए अक्टूबर 1984 में लखनऊ में इस लेखक ने मुलायम सिंह के “ हल्ला बोल कार्यक्रम” पर हल्ला बोलकर ऐसे अखबारों का साथ दिया, किन्तु इस अखबार के मालिकान ने माफिया के कहने पर इस लेखक को अखबार से ही अलग कर दिया। समझने की बात यह है कि तथाकथित सच के जोश से भरे इन लोगों ने इस लेखक को आज तक यह नहीं बताया कि इस घटना का सच क्या था और इस लेखक का कसूर क्या था। संघर्ष के इस दौर में माफिया विरोधी अभियान के साथियों ने तमाम विपरीत परिस्थितियों में दमदार तरीके से आन्दोलन चलाकर यह साबित किया कि अवैध व्यापार करने वाले लफंगों की अपनी कोई जमीन व ताकत नहीं होती। इनकी असली ताकत इनके टुकड़खोरों तथा इनके कारनामों पर खामोश रहने वाले शरीफ लोगों की चुप्पी में है। उन दिनों पोंटी एंड कम्पनी ने चितई के साथ वृद्धजागेश्वर, गुरना, पिथौरागढ़, बागनाथ, बागेश्वर, दूनागिरी आदि में भी मन्दिरों के पुजारियों के सहयोग से हस्तक्षेप करने की कोशिश की; लेकिन बावजूद इसके माफिया विरोधी आन्दोलन के बढ़ते प्रभाव के कारण चितई मन्दिर की सैकड़ों घंटियों से पोंटी चड्ढा और विजयेन्द्र जायसवाल के नाम हटाने के लिये इन लोगों को विवश होना पड़ा, जिसे इनकी हार के रूप में देखा गया।
माफिया विरोधी अभियान ने इन वर्षों में कुमाऊं मंडल और उत्तराखंड में सैकड़ों नुक्कड़ सभायें और गोष्ठियां कर तथा परचे- पोस्टर निकालकर इन तत्वों को पीछे हटने को मजबूर किया। माफिया विरोधी अभियान ने पहाड़ में आस्था के केन्द्रों और मंदिरों को विद्रूप करने और उन पर कब्जा करने की इन तत्वों की रणनीति को विफल कर दिया। देखने की बात यह भी थी कि माफिया से आमने-सामने के दौरान माफिया विरोधी आन्दोलन के अनेक अलम्बरदार तटस्थ बने रहे। ऐसा क्यों हुआ, इसका विश्लेषण जरूरी है। तथ्य यह भी है कि जब कुमाऊं मंडल के छोटे-बड़े पुलिस- प्रशासनिक अधिकारी जब रेता-बजरी और खनन के कारोबार में इनके साथ साझीदारी कर बेनामी सम्पत्ति बना रहे थे, तब पहाड़ में महिलायें और आंदोलनकारी लोग “माफिया तेरी कब्र बनेगी उत्तराखंड की धरती पर” का नारा बुलन्द करते हुए इन गिरोहों को चुनौती दे रहे थे. और आज जब पुलिस प्रशासन से मिलीभगत कर जनता के धन को लूटकर और उसे बरबादी के कगार पर पहुंचाकर पचास हजार करोड की संपत्ति जंमा करने वाले लोग अपने घर में भी बुलेटप्रूफ जैकेट पहने अपने भय को अखबारों के माध्यम से साझा कर रहे हैं, तब हमारी सरकार को उन नौकरशाहों, राजनेताओं, पुलिस अधिकारियों की पहचान करनी चाहिए जो इस काली कमाई का साम्राज्य खड़ा करने में इन तत्वों का हाथ बटा रहे थे। आज सभी महसूस करते हैं कि ऐसे तत्वों की काली कमाई की निष्पक्ष जांच और जब्ती हो। उनको दंडित किया जाय तभी हमारा लोकतंत्र बच सकता है। वरना, समाज और सरकार को कलंकित करने वाले नामधारी जैसे दर्जनों लोगों को संवैधानिक पदों से नवाजने वाले ये बगुलाभगत भारतीय लोकतंत्र को ध्वस्त करने के कारण बन जायेंगे। कुल मिलाकर, इसे दुरुस्त करना वक्त की जरूरत है।
लेखक पीसी तिवारी पत्रकार हैं.


