: इस खोमोशी की गूँज बहुत लंबी होनी चाहिए : शरीर के अंगों और सांसों ने तो दामिनी का साथ छोड़ दिया मगर उस हिम्मत जो उसने दरिंदों से जूझने में दिखाई थी देश के करोडो नौजवानों में बिखर गयी. साँसें थम गयी और जिस्म बेजान हो गया मगर उसके एक संघर्ष ने देश की आत्मा को झकझोर दिया और साथ ही सियासतदानों की फर्जी संवेदना के कपडे भी उतार दिए. दरअसल दामिनी के जिस्म को नंगा करने वालों की असफलता ने राजनीतिज्ञों को नंगा कर दिया. जिस तरह देश कि संसद ने घटना के तुरंत बाद प्रतिक्रिया दी थी उससे न चाहते हुए भी एक आस जगाई थी. हालांकि दिल गवाही तो नहीं दे रहा था कि इन घडियाली आंसुओं पर यकीन करे मगर फिर भी लगा था कि शायद कुछ संवेदना बची हो.
हाँ कुछ सवाल जरूर मन में उठे थे कि जो जया बच्चन फफक फफक के रो रही थी वो अपने नेताओं के मामले में चुप क्यूँ हैं. याद कीजिये सपा सुप्रीमो ने कई साल पहले रामपुर तिराहा कांड के बलात्कार पीडितों को गलत बताते हुए कहा था कि यदि ये साबित हो गया कि एक भी बलात्कार हुआ था तो वो राजनीती से संन्यास ले लेंगे और बाद में ३८ महिलाओं से पुलिसकर्मियों के बलात्कार सिद्ध हुए और उन्हें सजा भी हुयी पर मुलायम सिंह आज भी जया जी के नेता हैं. निठारी कांड से समय शिवपाल सिंह ने इसे एक मामूली घटना बताया था और अभी कल ही उनके एक बौद्धिक सहयोगी कह रहे थे कि उनको असल में मामले का पता ही नहीं था. और तुर्रा ये कि जया जी की पार्टी के एक मंत्री मनोज कुमार पारस अभी भी बलात्कार के आरोपी हैं. संसद में अपने आर्द्रता से परिपूर्ण भावुकता भरे बयान से देश का दिल जीतने वाली सुषमा जी और स्मृति जी बातें इस लिए खोखली लग रही थी कि वे उस नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने में लगी हैं, जिनके राज में प्रायोजित नरसंहार में गर्भवती का पेट चीर कर बच्चे निकले गए थे और मोदी का कहना है कि उस बात को भूल कर विकास करें.
मगर वे ये भूल गए कि देश कि नौजवान पीढ़ी इन झांसों में नहीं आती. उसने वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व को नकार दिया है. उसे इस बात से मतलब नहीं कि आपकी लच्छेदार बातें कैसी है? वो आपकी आँखों में झाँक कर उसकी धूर्तता को पहचान चुकी है और अब आपसे धरने कि परमिशन भी नहीं मांगेगी. उसके लिए आप द्वारा निर्धारित धरना स्थल कि स्वीकार्यता की कोई बाध्यता नहीं है. संसद की कार्रवाईयों में उसे कोई रूचि नहीं है. वह देश के सर्वोच्च पद को भी चुनौती दे सकती है और उसके लिए सवाल सुरक्षा का कम अस्मिता का ज्यादा है. देश की आत्मा अंगारे पे बैठी है और दिल्ली उसका प्रतीक बन रहा है. इस अंगार को और हवा मिली तो सियासी धूर्तता का ढांचा उसमे जल जायेगा. फैज़ का शेर मुकाम पा जायेगा कि ……..
“जब जुल्मो सितम के कोहे गरां
रुई कि तरह उड़ जायेंगे,
हम महकुमों के पावों तले
ये धरती धड़ धड़ डोलेगी
और अहेले हुकुम के सर ऊपर
ये बिजली कड़ कड़ कड़केगी
हम देखेंगे …लाजिम है कि हम भी देखेंगे।
लेखक उत्कर्ष कुमार सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं.


