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बलात्‍कार और छेड़खानी में मीडिया में प्रकाशित अश्‍लील विज्ञापनों की भूमिका

मीडिया का नैतिक कर्तव्य है कि समाज में फैली हुई कुरीतियों से समाज को सजग करे, देश और समाज के हित के लिए जनता को जागरूक करें, परन्तु ऐसा लगता है कि धन कमाने की अंधी दौड़ में लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ अपनी सभी मर्यादाओं को लाँघ रहा है। सभी समाचार पत्रों में संपादक प्रतिदिन बड़ी-बड़ी पांडित्यपूर्ण सम्पादकीय लिख कर जनमानस को अपनी लेखनी की शक्ति से अवगत करते हैं परन्तु व्यावहारिक रूप में ऐसा लगता है कि पैसा कमाने के लिए सभी कायदे कानूनों को तक पर रख दिया गया है। सभी समाचार पत्रों में अश्लील एवं अनैतिक विज्ञापनों की भरमार है, जिससे समाज के लोग गुमराह होते हैं। समाचार पत्र केवल एक लाइन लिखकर लाभान्वित हो जाता है। क्या कभी किसी समाचारपत्र ने ऐसे विज्ञापनों की सत्यता को जांचने की कोशिश की? क्या ऐसे अश्लील और अनैतिक विज्ञापनों को समाचार पत्रों में छपने भर से वह अपनी जिम्मेवारी से मुक्त हो सकता है?

मीडिया का नैतिक कर्तव्य है कि समाज में फैली हुई कुरीतियों से समाज को सजग करे, देश और समाज के हित के लिए जनता को जागरूक करें, परन्तु ऐसा लगता है कि धन कमाने की अंधी दौड़ में लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ अपनी सभी मर्यादाओं को लाँघ रहा है। सभी समाचार पत्रों में संपादक प्रतिदिन बड़ी-बड़ी पांडित्यपूर्ण सम्पादकीय लिख कर जनमानस को अपनी लेखनी की शक्ति से अवगत करते हैं परन्तु व्यावहारिक रूप में ऐसा लगता है कि पैसा कमाने के लिए सभी कायदे कानूनों को तक पर रख दिया गया है। सभी समाचार पत्रों में अश्लील एवं अनैतिक विज्ञापनों की भरमार है, जिससे समाज के लोग गुमराह होते हैं। समाचार पत्र केवल एक लाइन लिखकर लाभान्वित हो जाता है। क्या कभी किसी समाचारपत्र ने ऐसे विज्ञापनों की सत्यता को जांचने की कोशिश की? क्या ऐसे अश्लील और अनैतिक विज्ञापनों को समाचार पत्रों में छपने भर से वह अपनी जिम्मेवारी से मुक्त हो सकता है?

ऐसे बहुत से विज्ञापन हैं जिनमें कोई पता नहीं होता, केवल मोबाइल नंबर दे दिया जाता है क्योंकि लाख कोशिश करने के बाबजूद भी ऐसे विज्ञापनदाताओं ने अपना पता नहीं बताया। इस तरह की कई शिकायतें थाने में दर्ज भी कराई गई है, परतु उस पर कार्रवाई नहीं के बराबर होता है। ऐसे विज्ञापनदाता जनता से धन ऐंठकर चम्पत हो जाते हैं। क्या इनके दुराचार में मीडिया भी बराबर का भागीदार नहीं है? संपादक को चरित्रवान एवं देश व समाज के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए, तभी उनके सम्पादकीय की गरिमा का आभास जन मानस को हो सकेगा और उनके विद्वता का लाभ देश और समाज को मिल सकेगा। आज सामाजिक पतन के लिए काफी हद तक मीडिया भी जिम्मेदार है। यदि इन्टरनेट की बात छोड़ दें तो इस प्रकार के गुमराह करने वाले विज्ञापनों से की जाने वाली कमाई से देश में और खासकर महानगरों में बलात्कार जैसी घटनाएँ नहीं होंगी तो और क्या होगा?

पच्चीस वर्ष पहले भी जब पंजाब केसरी समाचार पत्र में विदेशी महिलाओं के अश्लील फोटो छपते थे तो कई सजग पाठकों ने इसका विरोध भी किया था, परन्तु यह आज तक जारी है। खास बात यह है कि बहुत से लोग केवल इसी कारण इस समाचार पत्र को पसंद करते हैं। अब तो प्रायः सभी अखबार यही कर रहे हैं। खेद की बात है कि हर आदमी धनवान बनना चाहता है, चाहे उसके लिए समाज और देश को कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। जब हम निर्मल बाबा और दूसरे धर्म के ठेकेदारों, भ्रष्ट नेताओं को कोसते हैं तो संपादक मंडल को भी अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है कि हम क्यों पेड़ न्यूज़ और भ्रामक विज्ञापन के द्वारा चंद लोगों के लाभ के लिए समाज के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? समाज के कई भद्र कुलीन व्यक्ति इन धोखेबाज लोगों के शिकार होते हैं, परन्तु अपनी बदनामी से बचने के लिए आवाज नहीं उठाते, आवश्यकता है कि जनहित में छद्म ग्राहक बनकर इनकी गतिविधियाँ जानकर उसका भंडाफोड़ करने के लिए सजग लोग अग्रसर हों। क्या संपादक मंडल राष्ट्रहित में लिंगवर्धन, मसाज पार्लर, महिलाओं से दोस्ती जैसे भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने का भरसक प्रयास करेंगे?

लेखक गोपाल प्रसाद स्वतंत्र पत्रकार एवं आरटीआई एक्टिविस्ट है। इनसे संपर्क [email protected] एवं [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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