राजस्थान के सीमावर्ती बाडमेर जिले में बन्धुआ मजदूरी प्रथा आजादी के 64 साल बाद भी कयम हैं। यह स्वयं सरकार कबूल कर रही हैं। देश भर में केन्द्र और विभिन्न राज्यों की सरकारें बन्धुआ मजदूरी समाप्त करने का दावा करती हैं लेकिन ठीक इसके विपरीत सीमावर्ती बाडमेर जिले के सरकारी आंकड़ों के अनुसार साढे आठ हजार बन्धुआ मजदूर परिवार बन्धक श्रमिक के रूप में कार्य्र कर रहे हैं जिसमें ५४५९ परिवार बीपीएल तथा ३०९४ गैर बीपीएल परिवार हैं। चौंकाने वाला यह आंकडा जिला प्रशासन बाडमेर की सरकारी वेबसाईट पर उपलब्ध है। बालोतरा पंचायत समिति में १३३२ बीपीएल, ५४० गैर बीपीएल, बाडमेर में ५९१ बीपीएल ओर १४७ गैर बीपीएल, बायतु में सर्वाधिक १४८५ बीपीएल, ४३५ गैर बीपीएल सहित जिले की समस्त आठों पंचायत समितियों में कुल साढे आठ हजार परिवार बन्धुआ श्रमिक परिवार के रूप में चिन्हित हैं। जिला प्रशासन हमेशा यह दावा करता हैं कि बन्धुआ मजदूरी प्रथा जिले में समाप्त हो चुकी है। वहीं जिला परिषद बाडमेर द्वारा जारी किए गये आंकडो से स्पष्ट है कि बाडमेर जिले के ८५५३ परिवार आज भी बन्धुआ मजदूरी का दंश भोग रहे हैं। बाडमेर जिले में बीपीएल परिवारों के चयन के लिए सरकारी स्तर पर कराए गए सर्वे में यह आंकड़ा सामने आया हैं। जिला परिषद द्वारा इस सूची में महिला और बाल श्रमिकों का आंकडा २४३९२ दर्शाया गया है। बहरहाल बाडमेर जिले में जागीरदारी प्रथा की समाप्ति के साथ विभिन्न सरकारों ने बन्धुआ मजदूरी प्रथा पूर्ण रूप से समाप्त होने का दावा किया था।
आधुनिकता की इस दौड में आज भी साढे आठ हजार परिवार बन्धुआ श्रमिकों के रूप में कार्यरत हैं, इससे अधिक शर्मनाक राज्य सरकार और जिला प्रशासन के लिए क्या हो सकता है। श्रम विभाग जहां जिले में बन्धुआ मजदूर का आंकडा जीरो बता रहा है वहीं प्रशासन श्रम विभाग के खोखले दावों का पिटारा खोल रहा है। इस जिले के पाकिस्तान सरहद से सटे सीमावर्ती गांवों में आज भी बन्धुआ मजदूरी प्रथा धडल्ले से जारी है। दलित वर्ग के परिवार आज भी प्रभावशाली परिवारो के यहां दो जून की रोटी के बदले बन्धक श्रमिक के रूप में बेगार प्रथा का निर्वाहन कर रहे हैं। जिला प्रशासन का कोई अधिकारी इस सम्बन्ध में अपनी जबान खोलना नहीं चाहती। जब सरकारी आंकडों में साढे आठ हजार परिवार बन्धुआ परिवार हैं, तो परिवारों की वास्तविक संख्या का अन्दाजा लगाया जा सकता है।
बाड़मेर से चन्दन सिंह भाटी की रिपोर्ट


