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इस बार भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार राहुल पाण्डे को दे देना चाहिये!

Neelabh Ashk : आज हमसे किसी ने कहा कि हैरत है इस बार भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के लिए निर्णायक को कोई नाम नहीं मिला. हमने कहा कि तीन-चार नाम तो हमीं सुझा देते लेकिन पुरस्कारों के निर्णायक अपने ऊंचे आसन से ज़रा नीचे झांकें तो. बहरहाल, उन सज्जन ने कहा कि उनके ख़याल से इस बार राहुल पाण्डे को दे देना चाहिये. हमने कहा, भई वह कहानियां लिखता है. वे बोले, क्या नीलाभ जी, इतना समय साहित्य में गुज़ारने के बाद आप कविताएं नहीं पहचान पाते. हम बड़े चकराये. गये राहुल के ब्लौग पर तो पाया कि हां, यक़ीनन जिन्हें हम-आप कहानियां समझे थे, वे एक अलग ज़ाविये यानी कोण से देखने पर बख़ूबी कविताएं मानी जा सकती हैं. मगर मनवाये कौन? यह यक्ष प्रश्न है. शायद इसका जवाब Shashi Bhooshan Dwivedi या कल्बे कबीर दे पायें, सुख़न-शनास बन्दे हैं.

Neelabh Ashk : आज हमसे किसी ने कहा कि हैरत है इस बार भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के लिए निर्णायक को कोई नाम नहीं मिला. हमने कहा कि तीन-चार नाम तो हमीं सुझा देते लेकिन पुरस्कारों के निर्णायक अपने ऊंचे आसन से ज़रा नीचे झांकें तो. बहरहाल, उन सज्जन ने कहा कि उनके ख़याल से इस बार राहुल पाण्डे को दे देना चाहिये. हमने कहा, भई वह कहानियां लिखता है. वे बोले, क्या नीलाभ जी, इतना समय साहित्य में गुज़ारने के बाद आप कविताएं नहीं पहचान पाते. हम बड़े चकराये. गये राहुल के ब्लौग पर तो पाया कि हां, यक़ीनन जिन्हें हम-आप कहानियां समझे थे, वे एक अलग ज़ाविये यानी कोण से देखने पर बख़ूबी कविताएं मानी जा सकती हैं. मगर मनवाये कौन? यह यक्ष प्रश्न है. शायद इसका जवाब Shashi Bhooshan Dwivedi या कल्बे कबीर दे पायें, सुख़न-शनास बन्दे हैं.

Dinesh Charan मैंने सुना कि अशोक वाजपेयी चाहते थे कि इस बार यह कल्बे कबीर को दिया जाए, चाहे वे उसे गोभी का बोरा कहकर ठुकरा दें। तो उनके चेलों ने कहा कि वे तो वरिष्ठ हैं, तो अशोक वाजपेयी को सुझाव दिया गया कि Neelabh Ashk जी को दिया जाना चाहिए तो अशोक वाजपेयी ने कहा कि वे बेशक युवा हैं, और उनके मूलत: कवि होने में मुझे संदेह नहीं , परन्तु क्या हिंदी जगत क्या मान लेगा कि वह कवि है। और प्रसंग अनिर्णीत समाप्त हुआ।

Neelabh Ashk अगर अशोक जी को यह परेशानी थी तो उन्हें केदार जी को देने का सुझाव दीजिये, उन्हें यह और रघुवीर सहाय पुरस्कार ही नहीं मिले हैं बाक़ी सब मिल गये हैं. अपने बारे में कुछ कहना समीचीन नहीं जान पड़ता, पर अब बात चली है तो मीर के हवाले से — मुझको शाइर न कहो मीर कि साहब मैंने, दर्द-ओ-ग़म कितने किये जमअ सो दीवान किया. — यों अशोक वाजपेयी यह कहते समय निश्चय ही उस घड़ी को कोस रहे होंगे जब उन्हों ने ख़ाकसार के पहले संग्रह की समीक्षा धर्मयुग में की थी और “फ़िलहाल” में शामिल की थी. ख़ैर.

नीलाभ अश्क के फेसबुक वॉल से.

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