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कांवड़ियों ने जो दुर्गति की उसको काफी हद तक कम करने का श्रेय पुलिसवालों को है

Sushil Upadhyay : हरिद्वार में रहने के बहुत-से कष्ट हैं। इन्हीं में से एक कष्ट कावंड़ यात्रा भी है। इस बार तीन दिन के लिए देहरादून चला गया था। छोटे भाई के घर पर। गलती ये हुई कि आज की बजाय बीते कल हरिद्वार पहुंच गया। दून से हरिद्वार की 50 किमी की दूर चार घंटे में तय हुई। वो भी तब अपने स्कूटर को चोर-गलियों और छिपे हुए रास्तों से लेकर हरिद्वार पहुंचा। पिछले 24 घंटे कष्ट में बीते। मेरा घर हरिद्वार-दिल्ली रोड पर है। सीटी, हार्न, सायरन और डीजे की आवाजें बहरा कर देने की हद तक चारों तरफ फैली हुई हैं।

Sushil Upadhyay : हरिद्वार में रहने के बहुत-से कष्ट हैं। इन्हीं में से एक कष्ट कावंड़ यात्रा भी है। इस बार तीन दिन के लिए देहरादून चला गया था। छोटे भाई के घर पर। गलती ये हुई कि आज की बजाय बीते कल हरिद्वार पहुंच गया। दून से हरिद्वार की 50 किमी की दूर चार घंटे में तय हुई। वो भी तब अपने स्कूटर को चोर-गलियों और छिपे हुए रास्तों से लेकर हरिद्वार पहुंचा। पिछले 24 घंटे कष्ट में बीते। मेरा घर हरिद्वार-दिल्ली रोड पर है। सीटी, हार्न, सायरन और डीजे की आवाजें बहरा कर देने की हद तक चारों तरफ फैली हुई हैं।

बीते कल शांतिकुंज से बहादराबाद के बीच 20 किमी लंबा जाम लगा था। 40-45 हजार बड़े वाहन और इनमें लाखों लोग रास्ते में फंसे रहे। पता नहीं ये कौन-सा धार्मिक कृत्य है! इस बार एक बड़ा बदलाव आया, जलार्पण यानि शिवचैदस में हरिद्वार में लगभग खाली हो जाता था, लेकिन अभी तक सड़क पर कावंडि़यों का हुजूम दौड़ रहा है। इस पूरे आयोजन में मुझे एक ही बात से आश्वस्ति होती है। वो है, अपने पुलिसवालों और सुरक्षाकर्मियों को देखकर। आखिरी के तीन दिनों के 72 घंटों से ज्यादातर पुलिसवाले और सुरक्षा बल 48 घंटे तक सड़क पर थे। लगातार लोगों को संभालते, दौड़ते, भीड़ को रास्ता दिखाते और लोगों को आपस में लड़ने से बचाते। कांवड़ियों ने हम जैसे लोगों की जो दुर्गति की, उस दुर्गति को काफी हद तक कम करने का श्रेय पुलिसवालों को ही है। जो इन्हें गालियां देते हैं, ठुल्ला बताते हैं, भ्रष्ट और बदजुबान बताते हैं, उन्हें हरिद्वार में कांवड़ मेले के दिनों में इनकी ड्यूटी का अनुभव करना चाहिए।

पत्रकार और शिक्षक सुशील उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

Shambhu Nath Shuklla : कांवड़ में डीजे बजाना मना कब था लेकिन इस्लाम में संगीत मना है। इसकी वजह भी है अरब की एकरस प्रकृति में विविधता नहीं थी। यह अलग बात है कि ईरान में आते-आते सूफियों में संगीत और कला के प्रति लगाव बढ़ा। पर भारत में संगीत तो एक आराधना है। यहां पर तो राम दरबार में भी नाच होता है और जनक दरबार में भी। रावण के दरबार में तो बाकायदा कैबरे टाइप डांस होता था। फिर शंकर तो स्वयं कामस्वरूप हैं इसलिए शिवरात्रि पर डीजे बजाया जाना चाहिए। इसे रोकने की मांग करने वाले सामी धर्मों के दबाव में आए हिन्दू हैं। सारी नृत्य कलाएं शिव में समाहित हैं। इसीलिए तो शिव को नटराज कहा गया है।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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