अभी कुछ ही दिन पहले की बात है। राजनीति में रसूख रखने वाले कुछ नेताओं से बात चल रही थी। दोनों ही प्रमुख दलों के नेताओं से चर्चा इस बात पर हुई कि आखिर क्या बात है कि आतंकी हमलों के बाद हम अपने आपको इतना असहाय और अकेला क्यों पाते हैं। क्यों हम में अमेरिका जैसा साहस नहीं है। कांग्रेसी नेता ने यही कहा कि सरकार से जितना करते बन रहा है, उतना कर रही है। देखो मुंबई में 26/11 अटैक के बाद क्यों आतंकी सिर नहीं उठा पा रहे हैं (यह बात बुधवार को हुए मुंबई अटैक से पहले उन्होंने कही थी)। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेता ने उस वक्त जो कहा वह लिखना मुझे कुछ उचित प्रतीत हो रहा है। भाजपा नेता ने कहा कि हमारा सत्ताधारी दल कुछ करे या न करे, उसे तार जोडऩा आता है।
ब्लास्ट भारत के किसी भी हिस्से में हो, उसका तार कहीं न कहीं जोड़ दिया जाता है। असम ब्लास्ट का तार बोडो से जोड़ दिया जाता है। छत्तीगढ़ का नक्सलियों से तो मुंबई-दिल्ली-पुणे या अन्य किसी महानगर में होने वाले ब्लास्ट के तार का एक सिरा हमारे केंद्रीय मंत्री तुरंत ही भारत से निकालकर सरहद के पार पहुंचा देते हैं। उन्होंने भले ही यह बात मजाक में कही हो पर अब सोलह आने सच नजर आ रही है। जब ब्लास्ट का तार कहीं भी जोड़ देने से काम चल जाता है तो फिर ज्यादा माथा-पच्ची क्यों करें। वैसे भी यह भी हमारे ही देश का जज्बा है कि एक ब्लास्ट के बाद दूसरे दिन सब कुछ वह सामान्य कर देती है। ज्यादा किसी को नहीं कोसती। देश को चलाने वाली सरकार को तार जोडऩा अवश्य आता है। लेकिन यह पता लगाने में उन्होंने पसीना आ जाता है कि ब्लास्ट के लिए रखे गए बम में आखिर तार किसने जोड़ा था।
मुंबई ब्लास्ट के बाद राहुल गांधी टीवी पर प्रकट हुए। बोले हम हर आतंकी हमला तो नहीं रोक सकते। वाह राहुल जी। जख्म पर मरहम नहीं लगाया गया तो नमक ही छिड़क बैठे। वैसे भी आपसे कौन उम्मीद लगाए बैठा है कि आपकी सरकार हर आतंकी हमले को रोक ही लेगी। वो तो बेचारी जनता है जो भगवान भरोसे जिंदा है। वैसे भी विदेशी कहते हैं कि भारत ही विश्व में एकमात्र ऐसा देश है जो भगवान चला रहे हैं। ऐसे में लाख टके का सवाल यह है कि आखिर हम नाकाम क्यों रहते हैं। आतंकी हमले रोकने में। आतंकियों की करतूत को नकेल कसने में। 1992 में हुए मुंबई सीरियल ब्लास्ट के मास्टर माइंड दाउद को हम 19 साल में नहीं तलाश पाए। हम सिर्फ सूची ही दे रहे हैं। मोस्ट वांटेड की। वो भी ऐसी सूची कि जिनके नाम सूची में लिख दिए उनमें से कुछ तो भारत में ही कमाते-खाते मिले और सरकार ने पाकिस्तान को सौंपी सूची में कह दिया कि यह आपके यहां छिपे हैं।
अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका ने लादेन की तलाश में जमीन-आसमान एक कर दिया था। वह भूसे में से सुई तलाश करने जैसा नहीं बल्कि भूसे के ढेर में उस भूसे के तिनके को तलाशने जैसा अभियान था जिसकी अमेरिका को तलाश थी। जिस देश में आतंकियों की पौध तैयार होती है। जहां के कई प्रांत में सुबह ही हिंसा और मारकाट के साथ होती हो। जहां के राष्ट्रपति के भाई को उसके ही अंगरक्षक ने गोलियों से उड़ा दिया हो, ऐसे देशों में अमेरिकी फौज ने चप्पा-चप्पा छाना। उसकी तलाश में जिसने अमेरिकी की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देने का दुस्साहस किया था। उसे तलाश करने में समय भले ही लगा हो पर न केवल ढूंढ निकाला बल्कि उसे अगले पल सांस लेने का मौका भी नहीं दिया। इस आपरेशन को अंजाम दिया अमेरिका ने हजारों किलोमीटर दूर जाकर। इसके बाद आतंकियों की अमेरिका में घुसने की हिम्मत नहीं हुई। और हमारे राहुल गांधी कहते हैं, अमेरिका भी आतंकी हमलों से महफूज नहीं है। अब ऐसे में उनसे पूछा जाना और उनका ज्ञान अवश्य बढ़ाया जाना चाहिए कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर अटैक का अमेरिका ने न केवल बदला ले लिया बल्कि हमले में मास्टर माइंड को दूसरे देश में घुसकर डंके की चोट पर मार गिराया।
और हमारे देश के नेता हैं कि वे मुंबई में बुधवार की रात हुए सीरियल ब्लास्ट के बाद इस बात की तलाश में हैं कि उनके हाथ में ब्लास्ट के तार का जो छोर है उसे किस दूसरे देश में घुसाया जाए, ताकि इस बार फिर अपनी नाक बचाई जा सके। ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि हां हमारे देश को तार जोडऩा आता है। हमें यह नहीं आता कि तार आखिर आया किस रास्ते से भारत में। किनके सहयोग से। क्यों आतंकी भारत में आराम से खुले में सांस लेते हैं। क्यों फांसी की सजा पाने के बाद भी हमारे हाथ उन्हें फंदे तक ले जाने से पहले ही कांपने लगते हैं। क्यों हम बार-बार कहते हैं कि अब हम और कड़ा कदम उठाएंगे। भगवान ने जब काम करने के लिए हाथ दिए हैं तो हम क्यों कदम उठाने की बात करते हैं। यह कभी क्यों नहीं बताना उचित समझते कि आखिर हमने ऐसे कौन से कड़े कदम उठाएं हैं जिससे देश की सवा सौ करोड़ जनता दिन भर खटने के बाद रात को चैन से सोने के लिए घर पहुंचे और जब सुबह जागे तो उसे अखबार के पहले पन्ने पर ब्लास्ट के घायल या मरे किसी व्यक्ति की लहूलुहान फोटो देखने को न मिले।
लेखक प्रफुल्ल नायक मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.


