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मेनस्ट्रीम मीडिया में यह खबर दिखी क्या आपको? इंफाल में हिन्दी भाषियों की जान पर सांसत

Shubh Narayan Pathak : पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में हिन्दी भाषियों की जान एक बार फिर सांसत में है। इनर लाइन परमिट के मुद्दे पर हुए बवाल के बाद मणिपुर की राजधानी इंफाल में पिछले एक-डेढ़ महीने से तनाव बढ़ता जा रहा है। हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि राजधानी में हिन्दी भाषियों के घर जलाए जा रहे हैं और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। बवालियों के भय से हिन्दी भाषी और मारवाड़ी लोगों का व्यवसाय चौपट होने के कगार पर है। इंफाल घाटी व शहर में बड़े पैमाने पर हिन्दी भाषी व मारवाड़ी लोग दुकान और अन्य छोटे-मोटे व्यवसाय करते हैं।

Shubh Narayan Pathak : पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में हिन्दी भाषियों की जान एक बार फिर सांसत में है। इनर लाइन परमिट के मुद्दे पर हुए बवाल के बाद मणिपुर की राजधानी इंफाल में पिछले एक-डेढ़ महीने से तनाव बढ़ता जा रहा है। हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि राजधानी में हिन्दी भाषियों के घर जलाए जा रहे हैं और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। बवालियों के भय से हिन्दी भाषी और मारवाड़ी लोगों का व्यवसाय चौपट होने के कगार पर है। इंफाल घाटी व शहर में बड़े पैमाने पर हिन्दी भाषी व मारवाड़ी लोग दुकान और अन्य छोटे-मोटे व्यवसाय करते हैं।

बवाली इन दुकानों को निशाना बना रहे हैं। जिसके कारण हिन्दी भाषियों ने अपनी दुकानें बंद कर रखी हैं। मणिपुर की राजधानी में सक्रिय छात्र संगठन यहां दशकों से काबिज हिन्दी भाषियों को भी निशाना बना रहे हैं। मणिपुर में हिन्दी भाषियों की तादाद लगभग एक लाख है। ज्यादातर हिन्दी भाषी इंफाल जिले में ही रहते हैं। इनमें 60 से 70 प्रतिशत लोग बिहार के ही हैं। इंफाल में रह रहे छपरा के राकेश, बक्सर के दुल्लहपुर गांव के पंकज कुमार ने बताया कि स्थानीय लोग दहशत कायम कर वहां से बिहारियों को भगाने का प्रयास कर रहे हैं। पिछले दिनों बिहार के जीतु (पीड़ितों की सुरक्षा को देखते हुए नाम काल्पनिक) का मकान बवालियों ने जला दिया।

इसके अलावा भी हिन्दी भाषियों की दुकान, बाइक व अन्य सपंत्तियों को नुकसान बनाया जा रहा है। विरोध करने पर हिन्दी भाषियों को पीटा भी जा रहा है। पंकज ने बताया कि वे इंफाल में 25-30 सालों से रह रहे हैं। यहां उनका पूरा परिवार रहता है। मकान और दुकान भी है। उपद्रवी इन लोगों को सबकुछ छोड़कर वापस जाने के लिए दबाव बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह सबकुछ पुलिस व स्थानीय प्रशासन के सामने होता है। लेकिन न तो प्रशासन और न स्थानीय मीडिया ही हिन्दी भाषियों की मदद कर रहा है।

जेसीआईएलपीएस के बैनर तले चल रहा आंदोलन

ज्वाइंट कमिटी ऑफ इनर लाइन परमिट सिस्टम (जेसीआईएलपीएस) ने इनर लाइन परमिट के मुद्दे पर लगातार आंदोलन चलाया जा रहा है। यह मणिपुर के करीब 30 स्थानीय संगठनों का समूह है। यह संगठन और इसके सहयोगी संगठन पिछले एक माह से लगातार पब्लिक कफ्र्यू और बंद के बहाने हिन्दी भाषियों का जीना मुहाल किए हुए हैं। पब्लिक कफ्र्यू का निशाना केवल हिन्दी भाषियों को बनाया जा रहा है।

क्या है इनर लाइन परमिट सिस्टम

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में जाने के लिए भारतीय नागरिकों को भी परमिट लेना पड़ता है। इसी को इनर लाइन परमिट (आईएलपी) के नाम से जाना जाता है। आईएलपी में राज्य के अंदर आने वाले बाहरी व्यक्ति के प्रवेश का उद्देश्य व ठहरने की सीमा निर्धारित होती है। अस्थायी परमिट 15 दिन जबकि, स्थायी परमिट की अवधि अधिकतम 6 माह होती है। फिलहाल यह सिस्टम अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड में लागू है। 15 जुलाई को मणिपुर विधानसभा में आईएलपी सिस्टम लागू किए जाने की मांग उठी थी। आईएलपी सिस्टम लागू करने की मांग को लेकर इंफाल में स्थानीय छात्र नेता पिछले कई दिनों से अनशन पर हैं। तभी से माहौल लगातार बिगड़ रहा है।

शुभनारायण पाठक के फेसबुक वॉल से.

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