लखनऊ : रीम कोर्ट ने जैसे ही देश के सबसे बडे़ सूबे उत्तर प्रदेश के विवादित कैबनिट सचिव शशांक शेखर की तैनाती को लेकर सवाल खड़ा करते हुये उत्तर प्रदेश सरकार से जबाब मांगा, वैसे ही सूबे में इस बात की चर्चाएं शुरू हो गयी कि शशांक शेखर का अब क्या होगा और मुख्यमंत्री मायावती का खास होगा कौन? अभी इन सवालों का जबाब ना तो सुप्रीम कोर्ट और ना ही कहीं और दाखिल हो पाया पर कुछ लोग शंशाक शेखर की ताकत को देखकर इस बात का एहसास करने लगे हैं कि शंशाक शेखर अब सर से माननीय होने जा रहे है।
सर से माननीय होने जैसी बात का अभी प्रमाण लेना बकाया है लेकिन फिलहाल सूबे की राजधानी में जिस तरह की बातें शशांक शेखर को लेकर कही जा रही हैं उसको देखकर यही भाव निकाला जा सकता है कि शशांक शेखर चंद दिनों में सर से माननीय हो जायेंगे। लेकिन शशांक का माननीय स्वरूप क्या होगा इसका फिलहाल आंकलन ही किया जा सकता है। अब कर ली जाये शशांक शेखर के माननीय बनने को लेकर की जा रही सूबे की चर्चाओं की। असल में जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुये उत्तर प्रदेश के कैबिनेट सचिव शशांक शेखर की तैनाती पर सवाल खड़ा करते हुये 7 दिन में जबाब मांगा है, उसको लेकर तरह तरह के कायस लगाये जाने लगे हैं। इन कयासों के बीच सबसे प्रमुख बात यही कही जा रही है कि मायावती के सबसे खास हैं शशांक शेखर, ऐसे में कैसे शशांक शेखर को हटाया जायेगा? अगर हटाया जाता है तो फिर मायावती का भरोसेमंद कौन रह पायेगा, जो उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक अफसरों की नब्ज टटोल कर मायावती को बतायेगा?
कैबिनेट सचिव पद को लेकर चर्चाओं में आये शशांक शेखर को लेकर एक बात खूब कही जा रही है कि शशांक शेखर में आखिर ऐसा क्या है जो अर्से से सूबे के सबसे बडे़ राजनेताओं के खासमखास बन जाते है? कभी वीपी सिंह के सबसे खास रहने वाले शशांक शेखर मुलायम, राजनाथ और अब मायावती के खास कैसे बने हुये हैं? इस को लेकर भी उनके चमत्कारिक व्यकित्तव पर राजनैतिक समझ रखने वाले राजनेताओं के अलावा आला दर्जे के अफसर मंथन करने में जुटे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तरप्रदेश सरकार को झटका देते हुए कहा है कि वह गैर सिविल सेवा वाले व्यक्ति को कैबिनेट सचिव कैसे बना सकती है? शीर्ष कोर्ट ने कहा कि शशांक न तो आईएएस हैं और न ही पीसीएस अफसर। फिर उनकी नियुक्ति इस पद पर कैसे हो सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने मायावती सरकार से ये सवाल मैग्सेसे अवार्ड विजेता संदीप पांडे की याचिका पर पूछे। कोर्ट ने शशांक शेखर की नियुक्ति की वैधता की जांच करने का निर्णय लिया है। जस्टिस वीएस सिरपुरकर और टीएस ठाकुर की बेंच ने वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी से पूछा कि किस नियम के तहत शशांक शेखर की नियुक्ति हुई है? क्या नियम ऐसी नियुक्ति की अनुमति देते हैं? इस पर द्विवेदी ने कहा कि शशांक की नियुक्ति तय नियमों के मुताबिक ही हुई है। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में अभी याचिका दायर नहीं की जानी चाहिए थी, क्योंकि यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहले से ही चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि क्यों न उनकी नियुक्ति रद्द कर दी जाए?
फिलहाल कैबिनेट सचिव के तौर पर काबिज शशांक शेखर ट्रेंड पायलट हैं। वे वीपी सिंह, मुलायम सिंह यादव और खुद मायावती के पायलट भी रहे हैं। यहीं से उन्हें नॉन कैडर आईएएस का दर्जा मिला। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल रोमेश भंडारी ने इन्हें अपना सलाहकार बनाया था। इसके बाद कई विभागों के प्रमुख सचिव पद पर भी रहे। 2007 में सत्ता में आने के बाद मायावती ने शशांक शेखर को कैबिनेट सचिव बना दिया था। अदालत मे दायर की गई याचिका में कहा गया था कि शशांक शेखर की नियुक्ति आईएएस काडर रुल्स एवं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 312 के तहत गैर कानूनी है। यह भी कहा गया था कि शशांक शेखर भारतीय प्रशासनिक सेवा आईएएस के अधिकारी नहीं हैं इसलिए गैर आईएएस संवर्ग के अफसर की नियुक्ति कैबिनेट सचिव जैसे नौकरशाही के सर्वोच्च पद पर करना विधि विरुद्ध है। कहा गया था कि राज्य सरकार नियमों में संशोधन नहीं कर सकती, यह भी आरोप लगाया गया कि प्रदेश सरकार उन्हें राज्य योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाकर उन्हें कैबिनेट सचिव का दर्जा दिया जो गैरकानूनी है।
यहां इस बात का जिक्र करने मे कोई गुरेज नहीं है कि कैबिनेट सचिव पद पद कर किसी आईएएस की ही तैनाती की जायेगी ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नही है, इससे पहले भी केंद्र सरकार में बिना आईएएस संवर्ग के अफसर कैबिनेट सचिव तो बन ही चुके हैं, कई देशों के राजदूत भी रह चुके हैं। यह सही है कि उत्तर प्रदेश में शशांक शेखर के लिये नया पद सृजित किया गया है लेकिन किसी आईएएस का कोई हक तो नहीं मारा गया है, लेकिन एक लॉबी की ओर से यह बात प्रचारित कर रखी गई है कि शशांक शेखर को कैबिनेट सचिव बना करके मायावती ने आईएएस अफसरों के हकों पर डाका डलवा दिया है। देश की आजादी के बाद यह पहला मौका है जब देश के किसी भी राज्य में कैबिनेट सचिव स्तर का पद अस्थाई तौर पर सृजित कर के किसी आम इंसान को तैनात किया गया है। यह एक ऐसा पद माना जा रहा है कि इस पर का सृजन ही मात्र शशांक शेखर के लिये हुआ है और शशांक शेखर के हटने के बाद इस पद का ना तो कोई औचित्य होगा और ना ही इस पद पर किसी दूसरे को काबिज कराया जायेगा।
शशांक के विरोधियों की ओर से ऐसी बातें प्रचारित करके रखी गई हैं कि शशांक शेखर उत्तर प्रदेश के सबसे ताकतवर नौकरशाह हैं। वह आईएएस और आईपीएस अफसरों से गालियों से बात करता है। वह मायावती का सबसे खास अफसर है। वह कैबिनेट सचिव है, पर वह खुद न तो आईएएस है और न आईपीएस, न पीसीएस और न पीपीएस। फिर भी वह कैबिनेट सचिव है और सारे अफसरों का बाप है। लेकिन शशांक किसी को गालियां देते है इसका कोई भी प्रमाण अभी सामने नहीं आया है, जो लोग इस बात को प्रमाणिकता से कहने का दंभ भरते हैं उनके पास भी ऐसा कोई सबूत नही है कि शशांक शेखर अफसरों को गालियां देते हैं।
उल्लेखनीय है कि सोमवार 3 मार्च को उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार की ओर से शपथ-पत्र प्रस्तुत किया गया। केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सालीसिटर जरनल डॉ. अशोक निगम एवं सहायक सालीसिटर जरनल ऋतुराज अवस्थी ने शपथ-पत्र प्रस्तुत कर कहा कि प्रदेश में कैबिनेट सचिव का पद बनाकर और उस पर शशांक शेखर की नियुक्ति असंवैधानिक है। केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि केंद्र सरकार के समान प्रदेश में कैबिनेट सचिव का पद सृजित करना संविधान की मौलिक एकरूपता के खिलाफ है। यह पद आईएएस कैडर रूल्स के तहत सृजित होना चाहिए। राज्य में पहली बार इस तरह का पद गठित किया गया है, जबकि आजादी के बाद से इस प्रकार का कोई पद नहीं रहा है। केंद्र सरकार की ओर से शपथ-पत्र कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय के निदेशक चैतन्य प्रसाद की ओर से प्रस्तुत किया गया।
केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि प्रदेश सरकार ने कैबिनेट सचिव का पद सृजित कर गलत परंपरा की शुरुआत की है। कहा गया कि जिस तरह केंद्र सरकार के सिविल सर्विसेज में कैबिनेट सचिव का पद उच्च होता है, उसी तरह प्रदेश में मुख्य सचिव पद उच्च होता है। प्रदेश में कैबिनेट सचिव का पद सृजित कर पद व उसकी गरिमा को गहरा आघात पहुंचाया गया है। राज्य सरकार ने कैबिनेट सचिव का पद सृजित करने के दौरान यह स्पष्ट नहीं किया कि इस पद पर नियुक्ति की क्या योग्यता एवं शर्तें है। केंद्र सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के पुराने निर्णय का हवाला देते हुए कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य में कैबिनेट सचिव के पद को अनुचित करार दे चुका है।
दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से गोपनीय विभाग के विशेष सचिव कृष्ण गोपाल की ओर से शपथ-पत्र प्रस्तुत किया गया। राज्य सरकार की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता देवेन्द्र कुमार उपाध्याय ने कहा 29 फरवरी को कैबनेट सचिव शशांक शेखर ने स्वेच्छा से कैबिनेट मंत्री का दर्जा एवं प्रशासनिक प्रमुख पद छोड़ दिया है। राज्य सरकार ने 18 मई 2007 के शासनादेश को वापस ले लिया है, जिसके तहत राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष शशांक शेखर को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया था। यह भी कहा गया कि राज्य सरकार की कार्य नियमावली में किसी भी अधिकारी को कैबिनेट सचिव बनाने का प्रावधान है। ऐसी स्थिति में याचिका के लंबित रहने का कोई औचित्य नहीं है एवं याचिका खारिज होने योग्य है। वहीं याची की ओर से प्रति उत्तर शपथ-पत्र प्रस्तुत करने के लिए समय की माँग की गई है।
इसी के साथ कैबिनेट सचिव का नाम किडनी कांड में भी चल रहा है। अम्बाला की एक अदालत के सामने डॉ. उपेन्द्र ने पहली बार शशांक का नाम लेकर उन्हें मुश्किल में डाल दिया था। प्रमुख विपक्षी दल सपा सहित अन्य विपक्षी दलों ने कैबिनेट सचिव को हटाए जाने की माँग लगातार कर रहे हैं। दरअसल राज्य के प्रशासनिक अधिकारी कैबिनेट सचिव के पद पर गैर संवर्गीय (गैर आईएएस) की नियुक्ति का अन्दरूनी तौर पर भारी विरोध कर रहे हैं। कैबिनेट सचिव की नियुक्ति के बाद आरोप हैं कि शशांक ने आईएएस रूल्स ऑफ बिजनेस में संशोधन कर खुद को राज्य का प्रशासनिक मुखिया बनाए जाने के आदेश जारी करा दिए थे, जिसके तहत मुख्य सचिव से भी अधिक प्रशासनिक ताकत उनके हाथों मे आ गई थी, जिसका विरोध आईएएस कर रहे थे।
उच्च न्यायालय में कैबिनेट सचिव पद पर शशांक शेखर सिंह की नियुक्ति को लेकर लम्बित वाद में न्यायमूर्ति कई बार टिप्पणी कर चुके थे कि सरकारी कर्मचारी को मंत्री पद कैसे दिया जा सकता है, तथा क्या गैर संवर्गीय अधिकारी के अधीन मुख्य सचिव कार्य कर सकता है? इन्हीं सब विवादों से फिलहाल बचने के लिए मुख्यमंत्री मायावती बैकफुट पर आ गईं और उन्होंने सिंह को राज्य के प्रशासनिक मुखिया के पद से हटाकर मुख्य सचिव को पूर्व की भांति प्रशासनिक मुखिया घोषित कर शासनादेश जारी किया। 300 से अधिक किडनी प्रत्यारोपण करने वाले तथा किडनी रैकेट के मुख्य सरगना डॉ. अमित कुमार की शरणगाह कहीं उत्तर प्रदेश सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे राज्य के कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह का मकान तो नही! किडनी मामले में चर्चा एवं विवादों में घिरे रहने वाले प्रदेश सरकार के कैबिनेट सचिव सिंह का नोएडा स्थित मकान चर्चा में आ गया था।
शशांक शेखर का नाम कई तरह के विवादों में जुड़ता हुआ तो दिख ही रहा है कैबिनिट सचिव शशांक की शैक्षणिक स्तर पर भी सवाल उठे हुये हैं, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश के नेता विरोधी दल शिवपाल सिंह यादव ने शशांक शेखर के स्तानक के दस्तावेजों को फर्जी करार देते हुये राज्यपाल से जांच कराये जाने की मांग की थी, लेकिन जांच होना तो दूर अभी तक कुछ भी नहीं हुआ है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी के बाद कैबिनेट सचिव नई दिल्ली मे कैंप कर रहे बताये जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में कैबिनिट सचिव पद को लेकर जिस जबाब को दाखिल कराना है उसी की तैयारी मे शशांक लगे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सुप्रीम कोर्ट का व्यापक असर देखा जा रहा है। शशांक को लेकर गंभीर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। ऐसा माना जा रहा है कि 26 जुलाई तक शशांक शेखर नये रूप में सामने होंगे, जिसको लेकर ऐसा समझा जा रहा है कि शशांक शेखर अब सर से माननीय हो जायेंगे, लेकिन जब तक कुछ परिर्वतन नहीं हो जाता है तब तक यथाहालात मान कर ही इंतजार करना होगा।
लेखक दिनेश शाक्य सहारा समय उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के इटावा रिपोर्टर हैं।


