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40 साल पुराना है विश्व हिंदी सम्मेलन का इतिहास

भारत में 32 साल बाद हो रहे विश्व हिंदी सम्मेलन का इतिहास 40 साल पुराना है। पिछले चालीस वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन दुनिया भर के अलग-अलग देशों में किया जाता रहा है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह की पहचान हिंदी को मिलनी चाहिए, वह आज भी उस से अछूती ही है। हिंदी आज भी संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा नहीं बन सकी है, जबकि लंबे समय से इसकी मांग होती चली आ रही है।

भारत में 32 साल बाद हो रहे विश्व हिंदी सम्मेलन का इतिहास 40 साल पुराना है। पिछले चालीस वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन दुनिया भर के अलग-अलग देशों में किया जाता रहा है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह की पहचान हिंदी को मिलनी चाहिए, वह आज भी उस से अछूती ही है। हिंदी आज भी संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा नहीं बन सकी है, जबकि लंबे समय से इसकी मांग होती चली आ रही है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रभाषा के प्रति जागरूकता पैदा करने एवम् हिंदी के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार ने पहली बार 1975 में विश्व हिंदी सम्मेलन की शुरूआत की थी। इसकी पहल पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने की थी। पहला विश्व हिंदी सम्मेलन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के सहयोग से नागपुर में किया गया था।तब से अब तक 9 अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन नागपुर, मॉरिशस, त्रिनिडाड व टोबेगो, लंदन, सूरीनाम, न्यूयार्क और जोहांसबर्ग में संपन्न हो चुके हैं। दसवां सम्मेलन आज 32 साल बाद भारत में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में किया जा रहा है। जिसमें दुनिया भर से साहित्यकार, पत्रकार, भाषा विज्ञानी, विषय विशेषज्ञ और हिंदी प्रेमी जुटे हैं।

 

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