हिंदी को सम्मान दिलाने का सपना बचपन से ही दिल में था। इंदौर से ही हिंदी आंदोलन की शुरुआत की। लेकिन अगर सरकार से ही ठन जाए तो फिर कौन बच सकता है? अगस्त 1965 की बात है, डिफेंस आफ इंडिया रुल के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। तीन साल वहां रहा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शोध की इच्छा थी। जेल से पीएचडी के लिए आवेदन किया। पिता चाहते थे कि देश में रह कर ही पढ़ूं। सो दिल्ली के इंडियन स्कूल आफ इंटरनेशनल स्टडीज़ (अब जेएनयू) में प्रवेश लिया।
छात्रावास का अध्यक्ष बना, इसके उद्घाटन के लिए मैंने मोरारजी देसाई को आमंत्रित किया। मोरारजी ने हिंदी में ही अपनी बात खत्म की। इसके बाद मैंने अपना शोध हिंदी में ही पूरा किया। लेकिन विवि ने लेने से इंकार कर दिया, कहा— यहां अंग्रेजी में ही पढ़ाई होती है इसलिए उसी में लिखना होगा। मैं नहीं माना तो विवि से बाहर कर दिया। मैं तमाम सांसदों से समर्थन लेने गया। राममनोहर लोहिया, अटलजी, मधु लिमये, जैसे बड़े लोगों ने मेरा समर्थन किया।
संसद की कार्रवाई जैसे ही शुरु होती मेरे विषय पर हंगामा होने लगता। कई दिन संसद ठप रही। परेशान होकर लोकसभा स्पीकर ओमसिंह ने मुझे बुलाया, बोले— वैदिक कोई हल बताओ। इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मुझे समझाया। मैं नहीं माना। इंदिरा ने विवि के अनुदान पर रोक लगा दी और मेरा शोध स्वीकारने को कहा। मजबूर हो विवि को अपने संविधान में संशोधन करना पड़ा। शोधग्रंथ भी स्वीकार करना पड़ा। यह हिंदी की जीत थी। हमेशा से ही हिंदी के लिए लड़ता रहा। वर्तमान में हिंदी में हस्ताक्षर का अभियान चला रहा हूं। लोगों से अपील है कि सिर्फ अपने हस्ताक्षर ही हिंदी में कर दें।
लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.


