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समाजवाद : विचारधारा या गिरोह

समाजवादी पार्टी को भाव देने में नीतिश और लालू से कहीं न कहीं चूक हुई होगी यहां तक तो मुलायम सिंह का शिकवा ठीक है। पहले भी कई बार ऐसा हुआ है जब समान धर्मी दलों के बीच चुनाव में तालमेल नहीं हो पाया और उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ मित्रतापूर्ण संघर्ष किया। मुलायम सिंह बुजुर्ग और जमीनी नेता हैं ऐसे प्रसंगों से वे हम जैसे पत्रकारों से बहुत ज्यादा परिचित ही नहीं हैं बल्कि इन तमाम अवसरों में वे महत्वपूर्ण पात्र भी रहे हैं। पहले कभी समान धर्मी दलों में गठबंधन दरकता था तो मित्र दल जहां पर अपने को ताकतवर समझते थे वहां दूसरे दल के दावे के खिलाफ अपना उम्मीदवार भी खड़ा कर देते थे लेकिन यह सभी सीटों पर नहीं होता था।

समाजवादी पार्टी को भाव देने में नीतिश और लालू से कहीं न कहीं चूक हुई होगी यहां तक तो मुलायम सिंह का शिकवा ठीक है। पहले भी कई बार ऐसा हुआ है जब समान धर्मी दलों के बीच चुनाव में तालमेल नहीं हो पाया और उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ मित्रतापूर्ण संघर्ष किया। मुलायम सिंह बुजुर्ग और जमीनी नेता हैं ऐसे प्रसंगों से वे हम जैसे पत्रकारों से बहुत ज्यादा परिचित ही नहीं हैं बल्कि इन तमाम अवसरों में वे महत्वपूर्ण पात्र भी रहे हैं। पहले कभी समान धर्मी दलों में गठबंधन दरकता था तो मित्र दल जहां पर अपने को ताकतवर समझते थे वहां दूसरे दल के दावे के खिलाफ अपना उम्मीदवार भी खड़ा कर देते थे लेकिन यह सभी सीटों पर नहीं होता था।

मुलायम सिंह चाहते तो बिहार विधानसभा चुनाव में वे सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने की बजाय उन्हीं सीटो पर जदयू, राजद और कांग्रेस गठबंधन के खिलाफ अपने उम्मीदवार मित्रतापूर्ण संघर्ष के लिए पेश करते जहां उन्हें यह यकीन है कि उनकी स्थिति इन दलों से ज्यादा मजबूत है तब उन पर कोई उंगली नहीं उठाता। पर उन्होंने बिहार की सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने का फैसला किया इसके पीछे किस दल का स्वार्थ साधने का उनका उद्देश्य है यह शायद ही किसी से छिपा रह जाये।

मुलायम सिंह अब नीतिश कुमार के खिलाफ विषवमन भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि नीतिश कुमार क्या धर्म निरपेक्ष सिद्धांतों की रक्षा करेगें जबकि वे इसके पहले भाजपा के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ने और सरकार बनाने की चूक कर चुके हैं। अकेले नीतिश कुमार को इस मामले में निशाना बनाकर उन्होंने अपनी नीयत को और ज्यादा सवालों से घेर लिया है। जनता दल के जिस धड़े ने आडवाणी की रथ यात्रा के बाद राजनीति में हुई पालाबंदी के बावजूद भाजपा से गलबहियां करने का कुफ्र किया था उसके नेता जनाब जार्ज फर्नांडीज थे नीतिश कुमार तो उसमे बहुत छोटे मोहरे थे। गौरतलब यह भी है कि जार्ज फर्नांडीज ने तो पहली गैरकांग्रेसी सरकार का गला घोटनें का काम दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठाकर ही किया था।

इस कारण उन्हें तो किसी भी कीमत पर भाजपा से कभी भी तब तक राजनैतिक समझौता करना ही नहीं चाहिए था जब तक कि वह आरएसएस से अपने वजूद को पूरी तरह से अलग करने का रास्ता न अपनाती। लेकिन जार्ज को तो मुलायम सिंह आज भी समाजवाद का सबसे बड़ा मसीहा मानते हैं। यहां तक कि उन्होंने शरद यादव का भी नाम इस मामले में आलोचना के लिए नहीं लिया जबकि शरद उक्त मामला अगर गुनाह है तो नीतिश से ज्यादा बड़े गुनहगार हैं। क्योंकि वे तो राजग के संयोजक ही बन गये थे और उनका बस चलता तो मोदी को भाजपा के द्वारा पीएम पद के लिए प्रोजेक्ट किये जाने के बावजूद जदयू राजग से अलग नहीं होता।

इसके अलावा यह भी स्मरण रखा जाना चाहिए कि मुलायम सिंह के प्रेरणास्रोत यानी डा. राममनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेस वाद को सरकार के रूप में फलित करने के लिए बहुत पहले जनसंघ के साथ गठबंधन की राह खोल दी थी। अगर भाजपा से रिश्ता रखना कर्मनाशा में नहाना है तो डा. लोहिया तो बहुत पहले इसमें बुड़की लगाकर अपने सारे पुण्य नष्ट कर चुके थे। दरअसल मुलायम सिंह ने समाजवाद को विचारधारा की वजाय गिरोह का पर्याय बना दिया है और कई स्वनाम धन्य समाजवादी नेताओ ने भी इसी कारण उनका साथ दिया जो समाजवादी विचारधारा के पतन की वजह साबित हुआ। जैसे कि डा. लोहिया ने सोशलिस्ट की प्रमुख लाक्षणिक विशेषता के रूप में यह प्रतिपादित किया था कि इस विचारधारा का कार्यकर्ता राजनीति में परिवारवाद को पोषने से कोसो दूर रहेगा और राजनारायण जैसे शिष्य आजीवन इस उसूल से टस से मस नहीं हुए लेकिन स्वयं भू छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्रा ने ही राजनीति में मुलायम सिंह के युवराज अखिलेश की इंट्री उनकी पहली साइकिल यात्रा को हरी झण्डी दिखाकर कराई थी।

मधुलिमये पिछड़ों ने बांधी गांठ सौ में पावे सांठ जैसे लोहिया के नारे को मूर्तरूप देने वाले वीपी सिंह के खिलाफ इसलिए हो गये क्योंकि उनका मूल सोशलिस्ट नही था। इसकी वजाय उन्होंने मुलायम सिंह को जीवन के अंतिम समय तक अपना वरदहस्त दिया जिन्होंने 1991 में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ते हुए लोकतंत्र की इतनी बुरी तरह हत्या कर दी थी कि चुनाव आयोग को उनके जिले का पूरा चुनाव ही स्थगित करना पड़ा था। कलयुग केवल नाम अधारा गोस्वामी तुलसी दास जी के इस कथन से अब उबरने की जरूरत है। सोशलिस्ट और सेक्युलर नाम रखने से कोई पार्टी इन गुणों की धनी नहीं हो जाती उसकी तासीर उसके अमल से समझी जानी चाहिए। डा. लोहिया ने तो कभी गिरोहवाद को महत्व नहीं दिया। वैचारिक वास्तविकता को ही उन्होंने सर्वोच्च महत्व दिया और इसके लिए कई बार पार्टी तोड़ने और पाखंडी सोशलिस्टों को सबक सिखाने में उन्होंने कसर नहीं छोड़ी।

पत्रकार केपी सिंह का विश्लेषण. संपर्क: [email protected]

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