भोपाल : भारतीय राजनीति में कांग्रेस ने सचमुच दिग्विजय सिंह को खुला छोड़ दिया है। वे स्वतंत्र हैं, किसी के विरूद्ध किसी भी अशिष्ट भाषा में कोई भी बयान देने के लिए, वे स्वतंत्र हैं प्रदर्शन कर रहे युवाओं को खुलेआम पीटने और दौड़ाने के लिए, वे स्वतंत्र हैं लगभग हर राष्ट्रीय मुद्दे पर कोई बेतुका बयान देने के लिए। इसके बाद भी कांग्रेस ने उन्हें अधिकार दिया हैं कि वे भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के भाग्यविधाता और पथ प्रदर्शक कहलायेंगे। दिग्विजय सिंह के इन कृत्यों से उनकी छवि तो बिगड़ती ही हैं, राहुल गांधी और उनके करीबी लोगों की छवि पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।
अनर्गल बयान देते-देते थक चुके दिग्विजय सिंह उज्जैन में उन्हें काले झण्डे दिखाने आये भाजपा के युवा कार्यकर्ताओं से न सिर्फ भिड़ गये, बल्कि उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर पीटते हुए नजर आये। राजनीतिक क्षेत्रों में दिग्विजय सिंह के इस कृत्य पर कांग्रेस कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही हैं। इतिहास में संभवतः पहली बार हुआ हैं कि अखिल भारतीय स्तर का कोई नेता सड़क पर खुलेआम सामान्य गुन्डों की तरह मारपीट करता नजर आये। इस कृत्य से कांग्रेस की छवि और राष्ट्रीय कहे जाने वाले नेताओं के हैसियत पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। दिग्विजय सिंह अपने बयानों के कारण सुर्खियों में बने रहने के आदी हो चुके हैं। मीडिया में उनके बयानों को अब संभवतः गंभीरता से लेना कम कर दिया हैं। इसका प्रमुख कारण प्रत्येक विषय पर दिग्विजय सिंह द्वारा हमेशा कुछ ऐसा कह देना हैं, जो तात्कालिक परिस्थितियों और गतिविधियों पर उल्टा बैठता हुआ नजर आता है।
दिग्विजय सिंह के बयानों के कारण कांग्रेस कई बार संकट में पड़ी हैं। राजनीति में सक्रिय लोग दिग्विजय सिंह के बयानों को कांग्रेस की भविष्य की योजनाओं का प्रतिबिम्ब मानते हैं। इसके बाद भी सार्वजनिक तौर पर वे यही कहते हैं कि इन बयानों को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। भारत में चल रही सोशल साईड में दिग्विजय के प्रति आम व्यक्ति के असंतोष को व्यक्त किए जा रहे अपशब्दों से आसानी से समझा जा सकता है। दिग्विजय सिंह इन अपशब्दों के प्रति भी गंभीर नहीं है। वे संभवतः यह चाहते हैं कि उनके अनर्गल बयानों पर समाज की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया हो। वर्तमान राजनैतिक परिदृष्य में स्वयं को जिंदा रखने का उन्होंने यह अचूक नुस्खा ढूंढ लिया है।
दिग्विजय सिंह के साथ मारपीट की घटनाएं होना सामान्य बात है। मुख्यमंत्री रहते हुए उनके साथ कई बार मारपीट की घटनाएं हुई थी, जिनका प्रतिरोध करना भी उन्होंने उचित नहीं समझा। कांग्रेस में उनके जैसा वीर नेता संभवतः पहले कभी पैदा नहीं हुआ, जो आम जनता के बीच हाथ-पैर चलाने का कौशल रखता हो। कल उज्जैन में हुई घटना में दिग्विजय सिंह और प्रेमचंद गुड्डू ने मिलकर भाजपा के कार्यकर्ताओं को पीटा, जिसका प्रतिरोध भाजपा कार्यकर्ताओं ने रात शाजापुर के पास दिग्विजय की कार पर हमला करके लिया।
अखिल भारतीय स्तर के नेता होने के मायने अभी तक एक सम्मानित व्यक्ति होना था। अभी तक के इतिहास में यह कहीं जिक्र नहीं मिलता कि किसी भी राजनैतिक दल के नेता ने स्वयं हथियार उठाये हो। पिछले दिनों जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में जनार्दन द्विवेदी के ऊपर सुनील नाम के आदमी ने चप्पल उठाई थी, तो केवल दिग्वजय सिंह ही वे पदाधिकारी थे, जो भीड़ में सुनील को मारते हुए स्पष्ट नजर आते थे। एक अनुमान के अनुसार दिग्विजय सिंह की दबी हुई हिंसक वृत्ति को जब-जब बाहर निकलने का अवसर मिलता हैं, वे उसका पूरा उपयोग करते हैं। इन स्थितियों में वे अपनी राजनैतिक हैसियत अपने दल की प्रतिष्ठा और अपने शिष्य राहुल गांधी की मान मर्यादा को पीछे छोड़ देते है।
दिग्विजय सिंह को राहुल गांधी का पथ प्रदर्शक और भाग्य विधाता माना जाता हैं। भट्टा परसौल में जिस तरह उन्होंने राहुल गांधी के साथ संरक्षणवादी व्यवहार किया था, उससे यह स्पष्ट होता हैं कि कांग्रेस हाईकमान उन्हें राहुल का सबकुछ मानने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। यही कारण हैं कि केन्द्रीय कैबिनेट में इन दिनों यदि कोई व्यवहारिक रूप से सबसे अधिक प्रभावशील हैं, तो वे दिग्विजय सिंह ही है। इन स्थितियों में उनके द्वारा किया गया कोई भी कृत्य या उनके द्वारा दिया गया कोई भी बयान राहुल गांधी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के लिए पर्याप्त है। ऐसा नहीं हैं कि दिग्विजय सिंह इस बात को नहीं जानते हो। इसके बावजूद राजनीति में अशोभनीय और अशिष्ट आचरण करके वे कौन सी राजनैतिक विधा का विस्तार करना चाहते है, यह समझ पाना कठिन है।
कल उज्जैन में हुई घटना का व्यापक प्रभाव प्रदेश की राजनीति में पड़ना तय हैं। इस वीरता पूर्ण कार्य के कारण कांग्रेस के नेताओं को अपने राष्ट्रीय महासचिव को संरक्षण देना भी अब भारी पड़ सकता हैं। दूसरी ओर यह तय माना जा रहा हैं कि दिग्विजय सिंह अपने बाहुबल के प्रदर्शन का एक और अवसर बहुत जल्दी तलाश कर लेंगे।
लेखक सुधीर पाण्डे पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


