पिछले कुछ महीनों में हमारे खिलाड़ियों ने देश और विदेश में कई बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की है. मगर अफ़सोस की बात यह है कि हम इन उपलब्धियों पर अधिक खुशी मना भी नहीं पाते हैं कि कुछ ऐसी खबरें आ जाती हैं और हमारा सर शर्म से झुक जाता है. हमारे खिलाड़ियों का डोपिंग में फँसे होने की खबर भी कुछ ऐसी ही है। इन दिनों भारतीय एथलीट सिनी जोंस, जौना मुर्मू, टियाना मेरी थामस, अश्विनी अकुंजी और प्रियंका पवार डोपिंग की वजह से सुर्खियों में हैं। सिनी राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों की स्वर्ण पदक विजेता महिला रिले टीम की सदस्य हैं, जबकि जौना एशियाई खेलों की 400 मीटर बाधा दौड़ में चौथे स्थान पर रही थीं। मेरी थामस पिछले साल ढाका में दक्षिण एशियाई महासंघ खेलों की स्वर्ण पदक विजेता रिले टीम की सदस्य थी।
अश्विनी और प्रियंका को सात से दस जुलाई तक जापान में हुई एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप के लिए रवाना होने से पहले डोपिंग में पकड़ा गया था। क्योंकि उन्हें पहली बार डोपिंग का दोषी पाया गया है, इसलिए इन पांचों पर अधिकतम दो साल का प्रतिबंध लग सकता है। यह बड़ी शर्मनाक बात है कि जिस बदनाम डोपिंग मामले में पहले विदेशी खिलाड़ियों के नाम आते थे, उसमें अब हमारे खिलाड़ी भी फँसने लगे हैं। पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि आए दिन कोई न कोई भारतीय खिलाड़ी डोपिंग में फंस जाता है। डोपिंग में फँसने वाले भारत के बड़े खिलाड़ियों की बात करें तो इनमें कुंजू रानी देवी, अपर्णा पोपट, मोनिका देवी, सीमा आंतिल और नीलम जे सिंह का नाम खास तौर पर लिया जा सकता है।
कुंजू रानी देवी को 2001 के एशियाई वेटलिफ्टिंग चैम्पियनशिप में प्रतिबंधित दवा के इस्तेमाल का दोषी पाया गया और उन पर छह महीने का प्रतिबंध लगा। बैडमिंटन खिलाड़ी अपर्णा पोपट पर भी प्रतिबंधित दवा लेने का दोषी पाया गया और उन पर भी छह माह का प्रतिबंध लगा, मगर बाद में तीन माह बाद उनका प्रतिबंध हटा दिया गाय। भारत को सबसे ज़्यादा शर्म तब उठानी पड़ी, जब 2008 के बीजिंग ओलंपिक से ठीक पहले मोनिका देवी को प्रतिबंधित दवा के सेवन का दोषी पाया गया। उन्हें ओलंपिक में शरीक होने से रोका गया मगर बाद में सबूत नहीं मिल सका और वो बेदाग़ बच गयी। मगर अभी भी खेल के जानकार कहते हैं कि मोनिका ने गलती की थी उसकी किस्मत ने उसे बचा लिया।
अब सवाल यह है आख़िर ऐसी खबरें बार बार क्यों आती हैं कि हमारे खिलाड़ी डोपिंग में पकड़े गये. एक खास प्रश्न यह भी है कि खिलाड़ी आख़िर ऐसी दवा का इस्तेमाल करते ही क्यों हैं, जिन्हें खिलाड़ियों को इस्तेमाल करने से मना किया गया है. कुछ खेल के जानकार कहते हैं कि ऐसा कभी-कभी अंजाने में हो जाता है और कुछ यह कहते हैं कि ऐसा कोच के कहने की वजह से होता है, मगर ईमानदारी से देखा जाए तो अधिकतर खिलाड़ी अच्छी तरह समझते हैं कि वो जिस दवा का इस्तेमाल कर रहे हैं उसे इस्तेमाल में लाना जुर्म है. खिलाड़ियों को भोला भाला समझना उचित नहीं है. कम से कम आज के खिलाड़ी तो इतने भोले नहीं हैं कि उन्हें सही और ग़लत का पता नहीं चले.
मुझे जो बात समझ में आती है वो यह है कि डोपिंग की सिर्फ़ सिर्फ़ एक ही वजह है प्रदर्शन में सुधार. एक ओर जहाँ कोच पर यह दबाव रहता है कि किसी भी तरह से खिलाड़ियों का प्रदर्शन बेहतर होना चाहिए तभी उन्हें अधिक पैसे मिलेंगे और उनकी सेवा आगे भी ली जाती रहेगी, वहीं खिलाड़ियों पर भी अच्छे प्रदर्शन का दबाव रहता है. खिलाड़ी इनाम के चक्कर में भी इस ग़लत रास्ते पर चलते है. आजकल देखने में आ रहा है कि किसी टूर्नामेंट में बेहतर प्रदर्शन करने के बाद खिलाड़ियों पर हर ओर से इनाम की बारिश होने लगती है. ऐसे में हर खिलाड़ी चाहता है कि उसका प्रदर्शन अच्छा हो ताकि पैसे कमाए जा सकें. अच्छा प्रदर्शन करके खबरों में आ गये तो विज्ञापन मिलने का भी चांस रहता है और यदि विज्ञापन मिल गया तो और भी मोटी कमाई हो जाती है. यह सारा खेल पैसे का है. पैसे की लालच में ही खिलाड़ी डोपिंग के चक्कर में फँसते हैं.
अभी नये मामले में भारत सरकार ने कोच समेत कई अधिकारियों पर करवाई तो की है मगर उसे समझना चाहिए कि खिलाड़ियों को भोला समझना उसकी भूल होगी. खिलाड़ियों को सब पता होता है कि वो जो कर रहे हैं वो सही नहीं है, मगर इसके बावजूद वो ऐसा करते हैं. इसकी बड़ी वजह है सज़ा में कमी. डोपिंग में पकड़े गये खिलाड़ियों के खिलाफ सख़्त से सख़्त करवाई होनी चाहिए। यह अलग बात है की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्टार पर डोपिंग के मामले इन दिनों कुछ अधिक सामने आ रहे हैं, मगर ऐसा नहीं है कि नशीली दवाएं पहले इस्तमल नहीं होती थीं। खिलाड़ी अपने प्रदर्शन में सुधार के लिए हर दौर में गलत तरीकों का इस्तेमाल करते रहे हैं, जिन में नशीली दवा या फिर या फिर शक्तिवर्धक दवा का इस्तेमाल होता रहा है। हर देश में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में खिलाड़ी खासतौर पर एथलीट नशीली दवाओं का इस्तेमाल करते रहे हैं। ओलंपिक, राष्ट्रमण्डल खेल और इसी प्रकार के बड़े टूर्नामेंट में शायद ही ऐसा हो कि कोई न कोई खिलाड़ी डोपिंग में न पकड़ा जाता हो।
आपको यह जानकार ताज्जुब होगा कि 1904 के ओलंपिक में ही अधिक ऊर्जा हासिल करने के लिए ग़लत तरीका अपनाया गया था। जी हाँ 1904 के ओलंपिक में मैराथन धावक थॉमस हीक ने दौड़ जीतने के लिए कच्चे अंडे, इंजेक्शन और ब्रांडी का इस्तेमाल किया था। जैसे-जैसे दुनिया ने तरक़्क़ी की डोपिंग के तरीके भी बदलने लगे। शुरू में तो खिलाड़ी धूल झोंक देते थे मगर धीरे-धीरे खेलों का आयोजन करने वाली संस्थाओं ने भी अपनी कमर कस ली और अब खिलाड़ियों के लिए धूल झोंकना आसान नहीं रह गया है। इस सिलसिले में अब एंटी डोपिंग संस्थाओं ने बड़े सख्त कानून बनाए हैं। बार-बार डोपिंग में पाये जाने वाले खिलाड़ियों पर आजीवन प्रतिबंध भी संभव है। कानून सख्त होने के बावजूद डोपिंग के मामले सामने आते रहते हैं। सबसे अफसोस की बात यह है कि अब डोपिंग के मामले में भारत का नाम भी खूब उछलता है। पिछले कुछ सालों में तो इस सिलसिले में कई बार भारत के खिलाड़ियों ने देश का नाम बदनाम किया। कभी पहलवानों ने सर नीचा करवाया तो कभी वज़न उठाने वालों ने बेइज्जती कराई, अब यह काम महिला एथलीटों ने किया है। यदि डोपिंग में शामिल एथलीटों पर सख्त कार्रवाई नहीं की जाती तो आने वाले दिनों में हमारे खिलाड़ी देश की नाक कटवाते रहेंगे।
लेखक ए एन शिबली हिन्दुस्तान एक्सप्रेस के ब्यूरो चीफ हैं. उनसे [email protected] या 9891088102 पर संपर्क किया जा सकता है.


