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सिपाहियों के मामूली अलाउंस से कैसे रुके अपराध ?

डीजीपी साहब एक नज़र इधर भी…
प्रदेश मे बढते अपराध पर अंकुश लगा पाने मे प्रदेश की पुलिस कामयाबी हासिल नहीं कर पा रही है। जिसके लिए जनता उन्हें ही दोषी मानती है और एक भय मुक्त समाज का सपना साकार नही हो पा रहा है। असल मे देखा जाये तो पुलिसिंग का कार्य बीट सिपाही/सिपाही या छोटे स्तर के ही पुलिस अधिकारी करते है। वही सिपाही को साइकिल अलाउंस के नाम पर मामूली भत्ता मिलता है और पेट्रोल महंगा होने के कारण वो अपने पैसे के पेट्रोल से कितना भाग-दौड कर अपराधियो की खोज-खबर ले पायेंगे?

डीजीपी साहब एक नज़र इधर भी…
प्रदेश मे बढते अपराध पर अंकुश लगा पाने मे प्रदेश की पुलिस कामयाबी हासिल नहीं कर पा रही है। जिसके लिए जनता उन्हें ही दोषी मानती है और एक भय मुक्त समाज का सपना साकार नही हो पा रहा है। असल मे देखा जाये तो पुलिसिंग का कार्य बीट सिपाही/सिपाही या छोटे स्तर के ही पुलिस अधिकारी करते है। वही सिपाही को साइकिल अलाउंस के नाम पर मामूली भत्ता मिलता है और पेट्रोल महंगा होने के कारण वो अपने पैसे के पेट्रोल से कितना भाग-दौड कर अपराधियो की खोज-खबर ले पायेंगे?

जहां तक बात तालमेल बनाकर काम करने की बै तो पुलिस विभाग मे सिर्फ थाना प्रभारी स्तर तक के अधिकारी को ही सीयूजी मोबाइल सरकार द्वारा उपलब्ध कराया गया है। जबकि अपराधियों के सुरगकशी व समाज के लोगों से ताल-मेल बनाने का कार्य सिपाही ही करते है। इसके बावजूद प्रदेश सरकार इनको मजबूत बनाने व जोश पूर्वक कार्य करने के लिये कोई भी पहल नही कर रही है, साथ ही साथ प्रदेश मे पुलिस बल की कमी के कारण भी अपराध पर अंकुश लगा पाने मे प्रदेश की पुलिस कामयाब नहीं हो पा रही है। इसके पीछे एक अहम कारण यह भी है कि विभाग के बडे अधिकारी व थाना प्रभारी (कुछ को छोडकर) अपनी रौब रुतबे के अनुसार फरियादियों व समाज के लोगो का आकलन कर थाने या अपने कार्यालय मे उनका आव-भगत व सम्मान करते है। थाने स्तर पर फरियाद लेकर गये गरीब तपके के लोगो से सीधे मुंह तक बात भी नहीं की जाती तो उनकी फरियाद सुनने की बात ही कहां रह जाती है या गरीब उनके रौब को देखकर अपनी फरियाद को सुना ही नहीं पाता। (आकलन उच्च अधिकारियो के समक्ष प्रस्तुत रोजाना प्रस्तुत फरियादियों के प्रार्थना पत्रो की बढती संख्या) इस दोहरी मानसिकता व दोहरे मापदण्ड के आधार पर, आखिर कैसे रुके अपराध?

इस आधार पर किस न्याय की उम्मीद की जा सकती है! क्या बिना इस मापदण्ड को बदले एक नये समाज का सृजन अपराध मुक्त, भय मुक्त किया जाना सम्भव प्रतीत होता है? ये कार्यशैली व कार्यनीति मे पारदर्शिता के बिना सम्भव नहीं है। समाज को भयमुक्त करने की बात कहने वाले उच्चाधिकारी जब तक अपने ही विभाग के छोटे कर्मचारियों के कन्धे से कन्धा मिलाकर नहीं चलेंगे तब तक समाज को अपराध मुक्त, भयमुक्त बनाने का सपना साकार नहीं होगा। एक ओर अधिकारी अपने अधीनस्थों को कानून का पालन करने व कराने की बात कहते हैं वहीं दूसरी ओर वसूली के पैसे में से अपना हिस्सा भी लेने को तैयार रहते हैं, या यूँ कहे कि कुछ अधिकारी स्वयं ही वसूली का कार्य कराते है जिसका उदाहरण है कि विभाग मे तैनात ऎसे लोग लम्बे समयों से एक ही जगह पर तैनात है। सिपाही को अपने ऊपर के अधिकारियो को खुश करने के लिए बहुत ही पापड बेलने पडते हैं। यदि कही कोई अधिकारी या उनका परिवार किसी बड़े होटल मे खाना खाकर भी चला गया तो उसका पूरा दायित्व व बिल अदायगी क्षेत्र के थानेदार के ही ऊपर होती है, किसी अधिकारी का जनरेटर,एसी, फ्रीज, टीवी, या अन्य कोई भी घरेलू उपकरण बिगड गया या नया खरीदना भी हो तो, वो भी दायित्व क्षेत्रीय थानेदार की ही होती है। बिना इस विडम्बना को बदले व विभाग के इस जंगल राज को समाप्त किये समाज को भयमुक्त व अपराध मुक्त की बाते बेमानी है।

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