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हमारे नेता अनाड़ी और घुटनेटेकू हैं…?

केंद्र सरकार ने अपनी इंटरनेट, दूर संचार और सोशल मीडिया के बारे में जो नीति पेश की थी, उसे वापस ले लिया है। इस नई नीति के तहत प्रत्येक व्यक्ति को अपने ई-मेल, व्हाट्सअप संदेश, एसएमएस, ईमेल और ट्विटर एकाउंट पर जो भी गतिविधि होती है, उसे कम से कम 90 दिन तक सुरक्षित रखना होगा और सरकार जब भी पूछे,उसे सब कुछ बताना होगा।

केंद्र सरकार ने अपनी इंटरनेट, दूर संचार और सोशल मीडिया के बारे में जो नीति पेश की थी, उसे वापस ले लिया है। इस नई नीति के तहत प्रत्येक व्यक्ति को अपने ई-मेल, व्हाट्सअप संदेश, एसएमएस, ईमेल और ट्विटर एकाउंट पर जो भी गतिविधि होती है, उसे कम से कम 90 दिन तक सुरक्षित रखना होगा और सरकार जब भी पूछे,उसे सब कुछ बताना होगा।

कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि किसी लोकतंत्र में कोई सरकार इस तरह का नीति-वक्तव्य बनाकर उसे सार्वजनिक करेगी। एक ही दिन में इस नीति-वक्तव्य पर इतनी मार पड़ी कि सरकार को माफी मांगनी पड़ी और इसे वापस लेना पड़ा। इस मुद्दे पर सरकार ने तुरंत घुटने टेक दिए, यह अच्छा किया लेकिन यह पहला मसला नहीं है। इस तरह के कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर वह साल भर में कई बार घुटने टेक चुकी है। भूमि-अधिग्रहण विधेयक पर तो उसने अपनी इज्जत ही दांव पर लगा दी थी। अश्लील वेबसाइटों के मामलों में भी वह दब्बू सिद्ध हुई है। आयकर फार्मों के सवाल पर भी यही हुआ। पाकिस्तान से वार्ता-भंग के सवाल पर हमारी सरकार भौंदू सिद्ध हुई। नेपाल के मामले में भी यही हो रहा है। सरकार ने पहली गलती यह की कि नेपाली मामलों के विशेषज्ञों और नेपाली नेताओं के भारतीय दोस्तों की बजाय विदेश सचिव को काठमांडू भेज दिया। किसी संप्रभु राष्ट्र के प्रधानमंत्री और अन्य नेता किसी पड़ोसी देश के अफसर की बात पर ध्यान क्यों देंगे? और उस अफसर को भी तब भेजा, जबकि संविधान-घोषणा की तैयारी पूरी हो चुकी थी। अब हमारी सरकार ने नेपाली संविधान में सात संशोधनों की मांग कर दी है, वह भी खुले आम। इससे बढ़कर लापरवाही क्या हो सकती है? किसी भी संप्रभु राष्ट्र का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है? एक मित्र राष्ट्र को शत्रु बनाने का इससे बढ़िया तरीका कौन-सा हो सकता है? ये सब बातें कूटनीतिक और गोपनीय ढंग से भी हो सकती थीं लेकिन अपने अनाड़ीपन से यह सरकार भारत के लिए रोज़ नए-नए सिररर्द खड़े कर रही है।
आखिर इसका कारण क्या है? ऐसा लगता है कि यह सरकार अब पूरी तरह से नौकरशाहों के हाथों में चली गई है। नेताओं का काम सिर्फ नौटंकी करना रह गया है। भाजपा और संघ में अनेक अनुभवी और विचारशील नेता और मंत्रीगण हैं लेकिन उन्हें कौन पूछता है? सिर्फ एक व्यक्ति के अहंकार को तुष्ट करने के लिए सारे नौकरशाहों ने अपनी ताकत झोंक दी है। उनकी नौकरी तो बनी रहेगी लेकिन जनता के इन सेवकों का भविष्य प्रतिदिन अंधकारमय होता जा रहा है। क्या सरकारी नौकरशाह हमारे नेताओं को अनाड़ी और घुटनेटेकू सिद्ध करने पर आमादा हैं?

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