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मुद्दतों से गैर ज़रूरी मुद्दों में उलझी राजनीति

यह लोकतंत्र राजनीतिक रूप से परिपक्व होता जायेगा। देश अपने सभी नीतिगत फैसले व अपनी समस्त राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक समस्याओं को संविधान के दायरे मे रह कर ही हल करेगा। इस तरह परिपक्व होता लोकतंत्र विकास की राह पर अग्रसर रहेगा। लेकिन आज इस राजनीतिक प्रणाली के तहत देश की जो दशा और दिशा है उसने कई गंभीर सवाल खडे कर दिये हैं। कहां तो उम्मीद की गई थी एक परिपक्व राजनीतिक परिवेश की और आज कहां सतही और गैरजरूरी मुद्दों तक सीमित रह गया है राजनीतिक चिंतन व सरोकार।

यह लोकतंत्र राजनीतिक रूप से परिपक्व होता जायेगा। देश अपने सभी नीतिगत फैसले व अपनी समस्त राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक समस्याओं को संविधान के दायरे मे रह कर ही हल करेगा। इस तरह परिपक्व होता लोकतंत्र विकास की राह पर अग्रसर रहेगा। लेकिन आज इस राजनीतिक प्रणाली के तहत देश की जो दशा और दिशा है उसने कई गंभीर सवाल खडे कर दिये हैं। कहां तो उम्मीद की गई थी एक परिपक्व राजनीतिक परिवेश की और आज कहां सतही और गैरजरूरी मुद्दों तक सीमित रह गया है राजनीतिक चिंतन व सरोकार।

 
इधर कुछ समय से संसद के अंदर और बाहर जिन मुद्दों पर बहस की जा रही है वह न सिर्फ गैर जरूरी हैं बल्कि अहितकारी भी हैं। इन अनावश्यक मुद्दों पर बहस को केन्द्रित करने का ही परिणाम है कि देश के विकास के लिए नीतिगत फैसले कहीं हाशिए पर आ गये हैं। चाहे-अनचाहे इनकी उपेक्षा हो रही है। ऐसा सिर्फ संसद के बाहर या मीडिया वाक युध्द में ही नहीं हो रहा बल्कि संसद के अंदर भी यही गैरजरूरी मुद्दे छाये हुए हैं। गौर करें तो पूरे मानसून सत्र की बलि या तो राजनीतिक हठ धर्मिता के कारण चढ़ी या फिर अनावश्यक मुद्दों पर बहस के कारण। 
इधर फिर एक और मुद्दा चर्चा का विषय बना। महाराष्ट्र सरकार ने जैन समुदाय की धार्मिक भावनाओं को देखते हुए कुछ विशेष दिनों के लिए मांस की बिक्री पर प्रतिबंध क्या लगाया कि मानो आसमान सर पर गिर गया। राजस्थान सरकार ने भी इसी तर्ज पर जैन समुदाय के पर्युषण पर्व के अवसर पर मांस बिक्री पर रोक के आदेश पारित किये। इसके विरूध्द शिवसेना ने सड़कों पर आकर विरोध दर्ज कराया। यही नहीं, इसके चलते जैन समुदाय के लिए ऐसा कुछ भी कहा गया जिसे अच्छा तो नही कहा जा सकता। 
मांस प्रतिबंध को लेकर की गई कुछ राजनीतिक दलों की यह घटिया राजनीति एक अकेला उदाहरण नही है। इसके पूर्व भी तमाम ऐसे मुद्दों पर माहौल गर्म रहा है जिनका देश के विकास से दूर-दूर तक कोई रिश्ता ही नहीं था। अधिकांश ऐसे मामलों ने सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने में ही अपनी भूमिका निभाई। आज स्थिति यह है कि किसी सामाजिक मुद्दे पर सही संदर्भ व परिप्रेक्ष्य में भी चर्चा की जाए तो जल्द ही उसका मूल चरित्र बिगाड़ कर तिल का ताड़ बनाने मे कोई विलंब नहीं होगा। ऐसी सोच ने कमोवेश प्रत्येक राजनीतिक दल को अपनी गिरफ्त मे ले लिया है।
आश्चर्य तो तब होता है जब कई बार गांव-कस्बे स्तर के मुद्दे भी राष्ट्रीय बन जाते हैं। उनमें उलझ कर हमारे राजनेता संसद का कीमती वक्त बर्बाद करते हैं। दुखद तो यह है कि यह प्रवत्ति कम होने की बजाए बढ़ती जा रही है। हमारे न्यूज चैनलों की गैरजिम्मेदार पत्रकारिता आग मे घी का काम कर रही है।
इस प्रवत्ति का ही परिणाम है कि जिन मुद्दों व समस्याओं पर चर्चा व हंगामा किया जाना चाहिए वह कहीं किनारे हाशिए पर उपेक्षित पड़े रहते हैं। अभी हाल मे दिल्ली में एक् दपंति ने इसलिए आत्महत्या कर ली कि उनका बच्चा जो डेंगू से पीडित था समय पर इलाज न मिलने के कारण असमय काल का ग्रास बना। वह उस सदमे को न सहन कर सके तथा उन्होनें अपनी भी जीवन लीला समाप्त कर दी। इस दर्दनाक हादसे ने दिल्ली के निजी अस्पतालों के जिस अमानवीय चेहरे को उजागर किया है बहस और हंगामा उस पर किया जाना चाहिए। इस तरह की यह पहली घटना नही है। इसके कुछ ही दिन पूर्व दिल्ली के ही एक निजी अस्पताल ने परिजनों को एक शव इसलिए देने से इंकार कर दिया था कि भारी भरकम बिल के एक छोटे से हिस्से का भुगतान करने में परिजन असमर्थ थे।
इसी तरह शहरों व महानगरों में बुजुर्गों की जिस तरह सरेआम हत्या कर लूट-पाट की जा रही हैं, बहस-चर्चा व हंगामा इस मुद्दे पर किया जाना चाहिए। लेकिन शायद ही कोई राजनीतिक दल इस पर शोर मचाता हो। यही नही जिस तरह बच्चों के अपहरण की घटनाएं बढ़ रही हैं तथा फिरौती के कारण उनकी ह्त्यायें की जा रही हैं, इस पर भी संसद के अंदर बहस की जानी चाहिए। आम आदमी की गाढ़ी कमाई को जिस तरह से किस्म किस्म के हथकंडों से ठगा जा रहा है यह भी चर्चा का विषय बनना चाहिए। मुद्दे तो अनेक हैं लेकिन उन पर शायद राजनीति की रोटी नहीं सेकी जा सकती इसलिए खामोशी की एक चादर पड़ी रहती है। जरूरत है ऐसे मुद्दों पर मुखर होने की, सड़क से लेकर ससंद तक। वोट बैंक और सुविधा की राजनीति के मोह से मुक्त हो ऐसी सोच कब विकसित होगी, पता नही, लेकिन होनी चाहिए ।

स्वतन्त्र टिप्पणीकार

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