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एक बार फिर सलाम न्यायपालिका! : कोर्ट के कारण ही बैकफुट पर आई माया सरकार

‘रूल ऑफ ला’ अमल में ही नहीं लाना चाहिए, बल्कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका में दिखना भी चाहिए। यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट की इलाहाबाद और लखनऊ खंडपीठों ने पश्चिमी उžत्तर प्रदेश के नोएडा सहित अन्य इलाकों में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध निर्णय नहीं दिए होते, लखनऊ के दो सीएमओ और एक डिप्टी सीएमओ की नृशंस हत्याओं का संज्ञान नहीं लिया होता, यदि शीलू निषाद बलात्कार कांड और औरैया में इंजीनियर मनोज गुप्ता हत्याकांड आदि का संज्ञान नहीं लिया होता तो न तो अधिकारियों-राजनेताओं और बिल्डरों की दुरभिसंधि से लुटे-पिटे किसानों के चेहरों पर मुस्कराहट लौटती, न ही हत्या और बलात्कार के आरोपी सत्तापक्ष के विधायकों-मंत्रियों को जेल की हवा खानी पड़ती।

‘रूल ऑफ ला’ अमल में ही नहीं लाना चाहिए, बल्कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका में दिखना भी चाहिए। यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट की इलाहाबाद और लखनऊ खंडपीठों ने पश्चिमी उžत्तर प्रदेश के नोएडा सहित अन्य इलाकों में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध निर्णय नहीं दिए होते, लखनऊ के दो सीएमओ और एक डिप्टी सीएमओ की नृशंस हत्याओं का संज्ञान नहीं लिया होता, यदि शीलू निषाद बलात्कार कांड और औरैया में इंजीनियर मनोज गुप्ता हत्याकांड आदि का संज्ञान नहीं लिया होता तो न तो अधिकारियों-राजनेताओं और बिल्डरों की दुरभिसंधि से लुटे-पिटे किसानों के चेहरों पर मुस्कराहट लौटती, न ही हत्या और बलात्कार के आरोपी सत्तापक्ष के विधायकों-मंत्रियों को जेल की हवा खानी पड़ती।

बसपा सरकार अर्जेन्सी का क्लॉज लगाकर किसानों की बहुमूल्य कृषि भूमि का औद्योगिक विकास के नाम पर औने-पौने दाम में अधिग्रहण करके भारी सुविधा शुल्क वसूल कर बड़े-बड़े बिल्डरों को सौंपने के मुद्दे पर बैकफुट पर नहीं आती। परिवार कल्याण के दो सीएमओ डॉ. विनोद आर्या व डॉ. बीपी सिंह की हत्या और इसी प्रकरण में जेल में निरुद्ध डिप्टी सीएमओ डॉ. वाईएस सचान की रहस्यमय परिस्थितियों में हत्या के साथ ही परिवार कल्याण विभाग में करोड़ों रुपए के घोटाले की जांच मजबूरन सीबीआई को सौंपने पर बसपा सरकार को बाध्य नहीं होना पड़ता। सलाम न्यायपालिका! ऐसा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एचएस कपाडिय़ा के चीफ जस्टिस बनने के बाद न्यायपालिका द्वारा कानून का शासन यानी ‘रूल ऑफ ला’ पालन कराने के लिए उठाए गए कदमों और निर्णयों / आदेशों से संभव हुआ है। जस्टिस कपाडिय़ा के नेतृत्व में जिस तरह घोटालों और कालेधन की विकराल समस्या का संज्ञान लिया गया है, उससे राजनीति में अचानक भूचाल आ गया है। जहां इसके चलते तत्कालीन कानून मंत्री बीरप्पा मोइली और सालीसीटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम को अपने पदों से हटना पड़ा है, वहीं जस्टिस निर्मल यादव पर विžत्तीय कदाचार का मुकदमा चलना संभव हुआ है और जस्टिस दिनाकरन व जस्टिस सौमित्र सेन के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो सकी है।

दरअसल, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन के लगभग तीन साल के कार्यकाल में पूरी न्यायपालिका ही व्यवस्था का अंग बनती नजर आ रही थी। वरना देश के सबसे बड़े प्रदेश के एक मुख्यमंत्री के आय से अधिक संपत्ति का मामला जस्टिस बालाकृष्णन के कार्यकाल में महज तारीख-दर-तारीख पर सिमट कर नहीं रह जाता। लेकिन जस्टिस कपाडिय़ा के मुख्य न्यायाधीश पद संभालने के बाद जहां-जहां कार्यपालिका और जनता द्वारा चुनी गई विधायिका अपने कर्तव्य निष्पादन में विफल दिख रही है, उसका संज्ञान न्यायपालिका द्वारा लेने पर आम जनमानस में यह धारणा बलवती होती जा रही है कि बिना न्यायपालिका के कार्यपालिका व विधायिका की मनमानियों, अनियमितताओं, कदाचार और भ्रष्टाचार पर अंकुश लग पाना संभव नहीं है। आम जनता को स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि देश से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर फैसला या मशविरा देने का काम न्यायापालिका कर रही है और सरकार उसके सामने सफाई देती नजर आ रही है।

जन सरोकारों के प्रति सुप्रीम कोर्ट की सकारात्मक सक्रियता के मद्ïदेनजर इलाहाबाद हाईकोर्ट के रुख में भी सकारात्मकता परिलक्षित हो रही है, वरना इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यमुना एक्सप्रेस-वे ही नहीं, बल्कि पश्चिमी उžत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर हुए अधिग्रहण को वैध ठहराया था, जिसकी पुष्टि कालांतर में सुप्रीम कोर्ट ने भी की थी। पर अब वही सुप्रीम कोर्ट है, हाईकोर्ट है, जहां अर्जेन्सी क्लॉज लगाकर कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण को निरस्त करने के आदेश पारित हो रहे हैं। लखनऊ पीठ में न्यायमूर्ति प्रदीपकांत और न्यायमूर्ति ऋतुराज अवस्थी के कड़े रुख के कारण ही दो सीएमओ हत्याकांड, एक डिप्टी सीएमओ हत्याकांड और परिवार कल्याण घोटाले की जांच सीबीआई से कराने के लिए बसपा सरकार को विवश होना पड़ा है।

टेलीकाम घोटाला यानी 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला, काला धन, गुजरात के फर्जी एनकाउंटर, सीवीसी के पद पर दागी आईएएस थॉमस की अवैधानिक नियुक्ति, अर्जेन्सी क्लॉज लगाकर औद्योगिक विकास केनाम पर कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण और फिर रातोंरात उसका भू-उपयोग बदलकर बड़े-बड़े बिल्डरों को सौंपने, पूरे देश में अवैध खनन, सार्वजनिक स्थानों पर मूर्तियां रखकर अवैध मंदिर निर्माण और डीम्ड विश्वविद्यालयों केफर्जीवाड़े का संज्ञान यदि सुप्रीम कोर्ट ने न लिया होता और समय-समय पर लैंडमार्क जजमेंट्स/आर्ड्ïर्स नहीं दिए होते तो आज ए. राजा, कनिमोझी, कलमाड़ी आदि जैसी बड़ी-बड़ी मछलियां तिहाड़ जेल की हवा न खा रही होतीं। उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार भूमि अधिग्रहण के मुद्ïदे पर बैकफुट पर न आती। भाजपा सरकार के कार्यकाल से शुरू डीम्ड विश्वविद्यालयों की फर्जी डिग्रियों का गोरखधंधा, जो यूपीए-1 की सरकार के कार्यकाल तक फला-फूला, उस पर आंशिक अंकुश भी न लग पाता। बड़े-बड़े घोटाले फाइलों में धूल खा रहे होते और कालाधन के मुद्ïदे पर केंद्र सरकार को रक्षात्मक रुख न अपनाना पड़ता।

कार्यपालिका और विधायिका दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। देश और प्रदेश में दोनों की दुरभिसंधि के दुष्परिणाम स्वरूप ही सारे घोटाले, कदाचार और भ्रष्टïाचार हुए हैं। संविधान के अनुसार सारे अधिकार विधायिका में ही निहित हैं, लेकिन कार्यपालिका की विधायिका के साथ दुरभिसंधि से दोनों मिलकर कदाचार व भ्रष्टïाचार में लिप्त हो जाते हैं, जिनसे होती है सार्वजनिक धन की जमकर लूट। कार्यपालिका पर ही रूल ऑफ ला का पालन करने और कराने की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा होती है, लेकिन विधायिका के साफ-सुथरा न होने के कारण दोनों की मिलीभगत में देर नहीं लगती। कार्यपालिका में रूल ऑफ ला का पालन करने वाले किनारे लगा दिए जाते हैं और फिर रागदरबारी से खुलेआम घपलों-घोटालों का खेल शुरू हो जाता है। ऐसे में न्यायपालिका भी यदि इन घपले-घोटालों की ओर से अनदेखी कर ले तो फिर देश-प्रदेश का भगवान ही मालिक है। नतीजतन न्यायपालिका द्वारा घपले-घोटालों का संज्ञान लेने को भले ही न्यायिक सक्रियता की संज्ञा से नवाजा जाए, मगर आम आदमी की आशा की किरण न्यायपालिका में ही बची है। इसलिए एक बार फिर सलाम न्यायपालिका!

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