2012 में जब समाजवादी पार्टी विधान सभा चुनाव बहुमत के साथ जीत कर आई उस समय सपा में मुख्यमंत्री पद का सिर्फ एक दावेदार था और वह सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव स्वयं थे। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव जिसने पार्टी को बनाया, खड़ा किया और आगे बढ़ाया था। मुलायम पहले भी सूबे की बागडोर संभाल चुके थे, इसलिये अनुभव की भी उनमें कोई कमी नहीं थी। पार्टी के छोटे-बड़े सभी नेता मुलायम की ताजपोशी का सपना देख रहे थे, लेकिन कालचक्र को कुछ और ही मंजूर था। जो बात मुलायम समझते थे वह पार्टी के अन्य नेताओं को या तो पता नहीं थी या फिर वह समझना नहीं चाहते थे। मुलायम 70 साल के हो चुके थे। भले ही उनके हौसले नहीं पस्त हुए थे लेकिन कंधे तो झुक ही गये थे। मुलायम राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं। नेताजी एक तरफ इस मौके को खोना नहीं चाहते थे दूसरी तरफ उनके मन में प्रधानमंत्री बनने का सपना भी हिलोरे मार रहा था। दो साल बाद 2014 में लोकसभा चुनाव होना था। कांगे्रस की यूपीए सरकार से जनता ऊब चुकी थी और नये विकल्प की तलाश कर रही थी। देश में माहौल ऐसा बना हुआ था मानों केन्द्र में अगली सरकार भी ‘खिचड़ी’ वाली होगी। ऐसे में लाटरी किसके नाम लग जाये कोई नहीं जानता था। सबसे अधिक सांसद देने वाले उत्तर प्रदेश के किसी नेता के पीएम की कुर्सी पर बैठने की संभावनाएं काफी अधिक लग रही थीं। मुलायम ने एक तीर से दो निशाने साधने का मन बना लिया। यह बात जगजाहिर होते ही चर्चा चल पड़ी नेताजी नहीं तो कौन? क्या आजम खान, शिवपाल, रामगोपाल यादव में से कोई सीएम बनेगा या फिर कोई पुत्रमोह में मुलायम युवा सपा नेता अखिलेश यादव को अपनी विरासत सौंप देंगे। अखिलेश सीएम बनेंगे तो मुलायम के साथ काम करने वाले उक्त तीनों नेताओं का क्या होगा जिन्हें अंकल कहकर अखिलेश बुलाते थे। क्या यह नेता अपने भतीजे के अधीनस्थ काम करने को तैयार हो जायेंगे। अखिलेश के सीएम बनने से अन्य तमाम बुजुर्ग नेताओं को भी परेशानी हो सकती थी। सपा के बुजुर्ग नेताओं ने बड़ी चालाकी के साथ अखिलेश के अनुभवहीनता का सवाल खड़ा कर दिया और कहने लगे कि अगर अखिलेश ने कामकाज सही तरीके से नहीं किया तो 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में इसका बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
सपा प्रमुख मुलायम ने बिना कोई चिंता किये एक बड़ा फैसला लेते हुए अपनी जगह अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया। मुलायम के इस फैसले की चौतरफा निंदा होने लगी। यहां तक की पार्टी के भीतर भी सवाल उठा कि इतनी जल्दी क्या थी। अखिलेश को अगर बागडोर सौंपनी ही थी तो पहले नेताजी उन्हें डिप्टी सीएम या अन्य कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपकर नेताजी अपने अधीन काम सीखने-करने का मौका देते, लेकिन पुत्र मोह में फंसे मुलायम ने किसी की नहीं सुनी। पुत्र अखिलेश को सूबे का सुल्तान बना कर मुलायम सत्ता से दूर अखिलेश सरकार के कामकाज की समीक्षा करते रहे। कई मौकों खासकर कानून व्यवस्था और नौकरशाही की लगाम नहीं कस पाने के लिये सीएम अखिलेश की फटकार भी लगाई। परंतु अखिलेश ने सीएम बनने के बाद भी न तो पिता मुलायम के खिलाफ मुंह खोला न ही मंत्रिमडल के अनुभवी अंकलों को इस बात का अहसास होने दिया कि वह सीएम हो गये हैं। अखिलेश सरकार अपने अंकलों के कामकाज में कोई दखल नहीं करती थी। हां, अंकल जरूर उन्हें हिदायत देते रहते थे। अंकल शिवपाल यादव हों अथवा आजम खां और डा. रामगोपाल यादव। सब के सब अखिलेश को ‘आइना’ दिखाते रहते थे। मानों अखिलेश सीएम और बाकी नेता सुपर सीएम हों। अंकल ही नहीं कुछ नौकरशाह भी (जो मुलायम के सीएम रहते उनके करीबी हुआ करते थे) युवा सीएम को समय-बे-समय आईना दिखा देते थे। कई मौकों पर युवा सीएम की अपरिपक्ता जगजाहिर होती रही। उन्हें अपने फैसलों पर यू टर्न लेना पड़ा। चाहें रात को मॉल्स के खुलने का समय पहले कम करने और उसके बाद दबाव में इस फैसले को वापस लेने का मामला हो या फिर दर्जा प्राप्त मंत्रियों को काम देने का मसला, कहीं भी अखिलेश की नहीं चली। सौ के करीब दर्जा प्राप्त मंत्री बने लेकिन इसमें अखिलेश के वफादारों की संख्या उंगलियों पर गिने जाने लायक भी नहीं थी। इस मामले में भी अखिलेश को मुंह की खानी पड़ी। बाद में इन्हें हटाना भी पड़ गया। इसी तरह से मुजफ्फरनगर दंगों के समय भी अखिलेश की एक नहीं चली। सीएम अखिलेश समय रहते शामली के जिलाधिकारी को हटाना चाहते थे, मगर आजम खान (जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अपनी जागीर समझते हैं) की जिद्द की वजह से वह ऐसा नहीं कर पाये। आजम तो वैसे भी कई मौकों पर सार्वजनिक रूप से अखिलेश सरकार की फजीहत कराते रहते हैं। आजम को हमेशा पार्टी और सरकार से अधिक अपनी चिंता रहती है। अगर ऐसा न होता तो आजम खान बार-बार पीएम पर व्यंग्य कसने की हिमाकत नहीं करते, जिनके साथ सपा प्रमुख मुलायम और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव संबंध बिगाड़ने के पक्ष में नहीं हैं। मुलायम और अखिलेश को पता है कि यूपीए सरकार से पंगा लेने के कारण ही मायावती सरकार को केन्द्र की यूपीए सरकार का सहयोग नहीं मिला था, जिससे प्रदेश के विकास कार्य प्रभावित हुए और इसका खामियाजा मायावती को सत्ता गंवा कर भुगतना पड़ा। अखिलेश जब विकास पर पूरा ध्यान दे रहे हैं तब उनके लिये यह जरूरी हो जाता है कि न चाहते हुए भी वह केन्द्र से अच्छे संबंध बनाये रखें।
खैर,यह वह समय था जब सपा के बुजुर्ग नेताओं के कारण अखिलेश की युवा छवि धूमिल होती जा रही थी। विधान सभा चुनाव के समय आगे बढ़कर समाजवादी पार्टी का नेतृत्व करने वाले अखिलेश की लाचारी देखकर चर्चा यह छिड़ गई कि अखिलेश में मुलायम की विरासत संभालने की कूबत नहीं है। इसके कारण भी थे। अखिलेश सरकार के मंत्री बेलगाम होकर घूम रहे थे तो उसके नेता तबादला-पोस्टिंग,ठेकेदारी,गुंडागर्दी, अवैध-वसूली, जमीन कब्जाने, खनन कार्यो आदि के धंधों में लगे हुए थे। कानून व्यवस्था बद से बदत्तर होती जा रही थी। महिलाओं के खिलाफ अपराध, रंजिश की घटनाएं, सड़क पर लूटपाट, घरों में बुजुर्गो की हत्या आम बात हो गई थी। पूरे प्रदेश में विकास का पहिया थमा हुआ था। उद्योगपति उत्तर प्रदेश में कारोबार करने के लिये किसी तरह हामी नहीं भर रहे थे। बिजली, पानी जैसी मूलभूत समस्याएं भी जनता का मुहैया नहीं हो पा रही थीं। कहीं नौकरशाही निरकुंश हो गई थी तो कहीं ईमानदार नौकरशाहों को सपा नेताओं के इशारे पर दबाया जा रहा था। नेताजी अपनी ही सरकार को नसीहत पर नसीहत दे रहे थे। लोकसभा चुनाव सिर पर आ गया था। भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी उत्तर प्रदेश में ‘बाप-बेटे’ की सरकार को विकास नहीं होने और अपराध बढ़ने के लिये कोस रहे थे। स्थितियां विषम होती जा रहीं थी। लोकसभा चुनाव के नतीजे आये तो कांग्रेस के साथ-साथ समाजवादी पार्टी भी परिवार तक ही सिमट कर रह गई। समाजवादी पार्टी में एक-दूसरे के खिलाफ सिर फुटव्वल शुरू हो गया।
उधर, दिल्ली चुनाव नतीजे आने के बाद उत्तर प्रदेश की समाजवादी राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिलने लगा। लोकसभा चुनाव के नतीजे आते ही सुपर सीएम जैसा व्यवहार करने वाले सपा नेताओं ने हाथ खड़े कर दिये तो अखिलेश को भी इस बात का अहसास हो गया कि राजनीति के मैदान में कभी किसी पर आंख मूंद कर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए चाहें वह चाचा-ताऊ ही क्यों न हो। इस बात का अहसास होते ही अखिलेश यादव ने सभी जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। दर्जा प्राप्त मंत्रियों की छुट्टी, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन सैय्यद जावेद अब्बास ,जिन पर आजम खान का वरदहस्त था उनकी बोर्ड से विदाई। इसी तरह से आजम खान के लाख चाहने के बाद भी मुजफ्फरनगर दंगों के समय आजम खान से जुड़े स्टिंग आपरेशन की रिपोर्ट विधान सभा पटल पर नहीं रखी गई। इस स्टिंग में आजम खान पर उंगली उठी थी। एक न्यूज चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में कुछ पुलिस वालों को कहते सुनाया गया था कि आजम खान के कहने पर उन लोगों ने कुछ लोगों को छोड़ा था। आजम ने यह मामला विधान सभा में उठाया। आजम खान संसदीय कार्य मंत्री तो थे ही इसके साथ-साथ सपा की बहुमत की सरकार थी, ने इस स्टिंग की जांच कराने के लिये एक प्रस्ताव पारित कर दिया। सपा विधायक सतीश कुमार निगम की अध्यक्षता में बनी 5 सदस्यीय कमेटी ने जांच के बाद स्टिंग में आजम को क्लीन चिट् देते हुए इसके लिये पत्रकारों को दोषी करार दिया था। इस रिपोर्ट को 24 अगस्त 2015 को विधान सभा के पटल पर रखने के लिये कार्यसूची में शामिल भी कर दिया गया था, लेकिन अखिलेश ने इसे सदन पटल पर नहीं रखने दिया। आजम खान की नाराजगी की परवाह न करते हुए सपा आलाकमान अमर सिंह से भी नजदीकी बढ़ाने में लगा है। वही आजम के कट्टर विरोधी प्रमुख शिया धर्मगुरू कल्बे जब्बाद के साथ भी सपा हाईकमान साफ्ट कार्नर लेकर चल रहा है। इसी प्रकार से सपा के दिग्गज नेता और अखिलेश यादव के चचेरे भाई (सपा सांसद और महासचिव राम गोपाल यादव के पुत्र) अक्षय प्रताप का नाम यादव सिंह प्रकरण में सामने आया तो अखिलेश ने सबको हद में रहने की नसीहत देने में जरा भी देरी नहीं की। इससे उनके चाचा शिवपाल यादव भी अछूते नहीं रहे। हाल ही में लखनऊ में सिंचाई विभाग के 1020 नलकूपों के लोकार्पण के कार्यक्रम में दोनों के बीच शब्दों के खूब तीखे तीर चले। चाचा शिवपाल के मुंह से निकल गया था, ‘कुछ लोगों ने मुख्यमंत्री के कान भर दिए। इससे योजना में विलंब हुआ।’ भतीजे अखिलेश भी पीछे नहीं रहे। कुछ-कुछ तंज जैसी भाषा में कहा था, ‘चाचा ने पूरे मूड में भाषण दिया है।’
आश्चर्यजनक रूप से मुलायम परिवार के बीच भी दूरियां दिखाईं दे रही हैं। कभी एक सुर में बोलने वाला नेताजी का परिवार अब बेसुरा हो गया है। परिवार के लोगों की तमाम मुद्दों पर अलग-अलग बयानबाजी, नौकरशाही को लेकर परस्पर विरोधाभास, सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे की टांग खिंचाई, अधिकारों को लेकर कलह -कलेश की वजह से यूपी का सबसे ताकतवर राजनैतिक परिवार समझा जाने वाला मुलायम कुनबा बिखरने सा लगा है। हालांकि अभी परिवार के सदस्यों के बीच मर्यादा की लक्ष्मण रेखा नहीं टूटी है, लेकिन पारिवार के ताकतवर सदस्य इशारों-इशारों में एक-दूसरे को आईना दिखा रहे हैं। यहां तक की सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को भी नहीं छोड़ा जा रहा है।इसकी बानगी तब देखने को मिली जब बिहार चुनाव के लिये मुलायम लालू-नितीश के सहारे जनता परिवार का महागठबंधन बनाने के बाद मुलायम यह तय कर रहे थे कि चुनाव चिन्ह क्या होगा। उसी समय सपा महासचिव राम गोपाल यादव का बयान आ जाता है कि महागठबंधन बनाना अपने ही ‘डेथ वारेंट’ पर हस्ताक्षर करने जैसा होगा। इसके बाद सारे समीकरण ही बदल गये। मुलायम की इस पहल का बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक की समाजवादी पार्टी में विरोध होने लगा। यह तो बानगी भर है। ऐसे नजारे बार-बार देखने को मिल रहे हैं।
बात परिवार में मनमुटाव से हट के की जाये तो दो वर्ष के भीतर ही युवा सीएम को यह भी समझ में आ गया था कि जातिवादी राजनीति के दिन पूरी तरह से भले ही न लदे हो लेकिन इसकी अहमियत तो कम हो ही गई हैं। सीएम समझते हैं अगर अगला चुनाव जीतना है तो भले ही उसमें थोड़ा-बहुत जातिवादी राजनीति का तड़का लगा दिया जाये, मगर डंका विकास का ही बजाना होगा। इसीलिये लोकसभा चुनाव के बाद अखिलेश इधर-उधर की बातों की बजाये सिर्फ काम की बात कर रहे हैं। सीएम अखिलेश यादव जो उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष भी हैं, 2017 का लक्ष्य हासिल करने के लिये समाजवादी राजनीति को दो हिस्सों में बांट कर चल रहे हैं। एक ओर जहां विकास के मोर्चे पर ताकत आजमाई जा रही है वहीं दूसरी तरफ और वोट बैंक को कैसे मजबूत किया जाये इसका भी ख्याल रखा जा रहा है। विकास का एजेंडा आगे बढ़ाकर अखिलेश यादव 2017 के लिये खतरा बनते जा रही नरेन्द्र मोदी और केजरीवाल सरकार की धार को राज्य में कुंद करना चाहते हैं। विकास के मुद्दे पर यूपी सरकार केन्द्र से पूरी मदद ले और दे रही है। वहीं सपा के वोट बैंक मजबूत करने के लिये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और अन्य हिन्दू संगठनों द्वारा फैलाये जा रहे धर्मांतरण,लव जेहाद जैसे मुद्दों को लगातार गरमाये रखकर सीएम अखिलेश मुस्लिम वोटरों को साधने में लगे हैं।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव विकास के साथ-साथ सामाजिक दायरा भी बढ़ा रहे हैं। वह वाट्स अप और फेसबुक पर भी सक्रिय हैं। उनसे कोई भी अपनी बात सोशल साइट्स पर शेयर कर सकता है। नोयडा का रहने वाला 13 वर्ष का हरेन्द्र, जो सड़क किनारे वजन नापने की मशीन से पैसा कमा कर अपनी पढ़ाई पूरा कर रहा था उसे वह पांच लाख की आर्थिक मदद देते हैं। लखनऊ में वृद्ध टाइपिस्ट कृष्ण कुमार पर पुलिस के कहर का वीडिया फेसबुक पर देखकर सीएम अखिलेश यादव ने आधी रात में दो टाइपराइटर तोहफे में उनके घर भिजवाए थे। उन्हें घर बुलाकर एक लाख रुपये दिए और पुलिस की हरकत के लिए उनसे माफी मांगी। सीएम के बंगले पर मजदूरों तक का सम्मान होता है। जिला बलिया के जिस गांव में यह मजदूर रहते थे वहां की झील में मगरमच्छ आ गया था, जो कुछ गांव वालों को खा भी गया था। उसे पकड़ने में वन विभाग नाकामयाब रहा। इसके बाद इन 5 मजदूरों ने उसे खुद जिंदा पकड़ लिया। मगरमच्छ कंधे पर उठाए हुए इन मजदूरों की फोटो अखिलेश यादव ने किसी अखबार में देखी थी। उन्हें उनकी बहादुरी के लिए पांच लाख रुपये का इनाम दिया गया। इसी तरह मिर्जापुर में नाव पलटने से डूब रहीं 10 बच्चियों को बचने वाले रंजीत यादव को भी पांच लाख का इनाम मिला। पंद्रह साल की सुषमा को भी रिसर्च में मदद के लिए सीएम ने पांच लाख रुपये दिए। सुषमा ने 15 साल की उम्र में एमएससी कर ली है और अब वह पीएचडी कर रही हैं। ऐसे तमाम मामले हैं। अखिलेश यादव कहते हैं कि कभी लोहिया जी कहते थे कि दुनिया से बुराई खत्म करने के लिए जरूरी है कि लोग बुरे को पहचानें। मैं कहता हूं कि दुनिया में अच्छाई बढ़ाने के लिए जरूरी है कि हम अच्छे लोगों को पहचानें, उन्हें इज्जत दें, उनका सम्मान करें।
उत्तर प्रदेश सरकार के एक बड़े अधिकारी के रिश्वत मांगने का वीडियो सोशल साइट्स के माध्यम से उनके पास आता है तो वह इसे छिपाते नहीं हैं। सार्वजनिक रूप से इस पर चिंता व्यक्त करते हैं। मुख्यमंत्री की सक्रियता से बरेली पुलिस ने हरिद्वार से लखनऊ आ रही लालबत्ती लगी एक स्कॉर्पियो कार में करोड़ों रुपयों से भरे तीन बैग जब्त किये जाते हैं। सीएम को वॉट्सएप पर खबर मिली थी कि कार में भारी मात्रा में कैश लाया जा रहा है। स्कॉर्पियो हरिद्वार की जिला पंचायत अध्यक्ष अंजुम बेगम की थी जिसमें उनके जेठ पूर्व विधायक मोहम्मद शहजाद गनर के साथ बैठे थे।
अखिलेश का सामाजिक दायरा बढ़ता जा रहा है। सीमा पर मरने वाले जवानों का सम्मान, खिलाडि़यों को प्रोत्साहन सब उनके एजेंडे में है। अगर कानून व्यवस्था के मोर्चे पर अखिलेश सरकार कुछ बेहतर हो जाये तो समाजवादी सियासत के लिये यह महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। बात जब कानून व्यवस्था की चलती है तो मायावती का शासन याद आता है। अयोध्या कांड पर हाईकोर्ट का फैसला आने वाले दिन प्रदेश की यादें ताजा हो जाती हैं। यह मानकर चला जा रहा था कि फैसला जिसके भी खिलाफ जायेगा, वह वर्ग उत्तेजित हो सकता है। कानून व्यवस्था न बिगड़े इसके लिये मायावती ने पुलिस अधिकारियों को सख्त निर्देश दिये, जिसका असर यह हुआ कि कहीं किसी प्रकार की कोई वारदात नहीं हुई। हाईकोर्ट ने क्या फैसले सुनाया इसको लेकर गलत अफवाह न फैले इसके लिये मायावती सरकार ने फैसला आते ही उसे ऑनलाइन कर दिया, जो चाहे उसे पढ़ सकता था। कहीं कोई अफवाह नहीं फैली। सब कुछ शांति से निपट गया। अखिलेश का जिस तरह से पार्टी में कद बढ़ रहा है, उससे सुपर सीएम समझने वाले कुछ नेताओं का कद बौना हो गया है।


