दैनिक भास्कर के एमडी सुधीर अग्रवाल खुद को टाइम्स ऑफ इंडिया का विनीत जैन बनाना चाहते हैं। भास्कर में टीओआई की नकल तो वर्षों से धड़ल्ले हो रही है। कई अंग्रेंजीदां गोलबाजों की भी चांदी रही। मगर, हर बार मरते हैं अंतिम पायदान पर खड़े रिपोर्टर और डेस्क के सहकर्मी।
सपने संजोकर खड़ा किया गया दैनिक भास्कर का कभी बेहद कम समय में बेहद चर्चित रहा राष्ट्रीय संस्करण अस्त हो गया। समूची टीम को पहले ट्रांसफर के नाम पर राई-छिती किया गया। फिर नेशनल ब्यूरो के चंद रिपोर्टरर्स को आईएनएस भेजकर राजेंद्र प्लेस वाले दफ्तर में कत्ल-ए-आम मचा दिया। एक साथ 15 लोगों के इस्तीफे लिखवा लिए गए। कुछ लोगों का कॉन्ट्रेक्ट दिसंबर में खत्म हो रहा था, उन्होंने इस्तीफा देने से अक्टूबर में मना किया तो उन्हें टर्मिनेशन-लेटर थमा दिया गया। डिप्टी एडीटर आनंद नायक से भी इस्तीफा ले लिया गया। समूचा डेस्क ही साफ कर दिया गया। कुछ रिपोर्टर्स लोकल के कुछ नेशनल ब्यूरो के बचे हैं। भास्कर वाले जिस दरख्त पर बैठकर सरकारी मलाई चाभ रहे हैं, उसे ही कांट-छांट कर गिरा दिया। दब कर मर गए दो जून की रोटी कमा रहे गुमनाम पत्रकार। राष्ट्रीय संस्करण का पेज अब भोपाल बनने लगा है। नेशनल ब्यूरो के रिपोर्टर्स को भी एक तरह से चलता कर दिया गया है। अब उन पर गाज गिरने वाली है। बिठाया जा रहा है आईएनएस में, मगर वह कोई हार्ड स्टोरी नहीं लिख सकते। सिर्फ एक्सक्लूसिव और विशेष खबरें संडे के भास्कर के लिए। रिपोर्ट करनी है इंदौर में बैठे कल्पेश याज्ञनिक को। मतलब साफ है कि डेस्क का सूपड़ा साफ करने के बाद अब रिपोर्टर्स की शामत आने वाली है। सवाल यह है कि आखिर अपने ही चेहरे (राष्ट्रीय संस्करण को मैनेजमेंट ऑफ भास्कर मानता रहा है) इतना कुरूप क्यों बनाने पर तुले हैं सुधीर अग्रवाल ?


