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दरभा के कुल तीन में से दो पत्रकार नक्सली मामले में जेल में, दोनों पत्रकार पत्रिका से

दो साल से अधिक समय से बार-बार दरभा थाना तो कभी जगदलपुर बुलाकर पूछ-ताछ करने के बहाने प्रताड़ित और अब नक्सली बता कर गिरफ्तार किये गए संतोष यादव के बारे में यह पुष्टि हो गयी है कि वह पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से आंचलिक पत्रकार के रूप में काम कर रहे थे। नवभारत और दैनिक छत्तीसगढ़ को तो दरभा क्षेत्र में काफी समय से वितरण व इनके लिए गांवों की ख़बरें भेज ही रहे थे। पिछले दो माह से उसे दैनिक पत्रिका ने भी अपना प्रतिनिधि बना लिया था। यह तब हुआ जब दरभा में संतोष से पहले पत्रिका चला रहे सोमारू नाग को पुलिस ने दो माह पहले ही नक्सली बताकर जेल भेज दिया था, जो अभी भी सलाखों के पीछे है। इस तरह से दरभा में कुल तीन आंचलिक पत्रकार जो पूरे प्रदेश स्तरीय अख़बारों के वितरण और उन्हें आस-पास के गांवों की खबर दे रहे थे, उनमें से अब दो जेल चले गए हैं।

दो साल से अधिक समय से बार-बार दरभा थाना तो कभी जगदलपुर बुलाकर पूछ-ताछ करने के बहाने प्रताड़ित और अब नक्सली बता कर गिरफ्तार किये गए संतोष यादव के बारे में यह पुष्टि हो गयी है कि वह पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से आंचलिक पत्रकार के रूप में काम कर रहे थे। नवभारत और दैनिक छत्तीसगढ़ को तो दरभा क्षेत्र में काफी समय से वितरण व इनके लिए गांवों की ख़बरें भेज ही रहे थे। पिछले दो माह से उसे दैनिक पत्रिका ने भी अपना प्रतिनिधि बना लिया था। यह तब हुआ जब दरभा में संतोष से पहले पत्रिका चला रहे सोमारू नाग को पुलिस ने दो माह पहले ही नक्सली बताकर जेल भेज दिया था, जो अभी भी सलाखों के पीछे है। इस तरह से दरभा में कुल तीन आंचलिक पत्रकार जो पूरे प्रदेश स्तरीय अख़बारों के वितरण और उन्हें आस-पास के गांवों की खबर दे रहे थे, उनमें से अब दो जेल चले गए हैं।

नियम विरुद्ध 48 घंटों बाद पेश किया कोर्ट में, कोरे कागजों में कराए दस्तखत

संतोष यादव को पुलिस ने जब एक अक्तूबर को न्यायालय में पेश किया तो उसने माननीय न्यायालय को बताया कि उसे काफी धमकाया गया और कई कोरे कागज पर उसके दस्तखत लिए गए। उसने कुछ माह पहले भी प्रदेश के जिम्मेदार अधिकारीयों को विधिवत शिकायत की थी कि उसे प्रताड़ित किया जा रहा है। संतोष के मित्रों और उसकी पत्नी के अनुसार दरभा पुलिस ने कई तथा कथित नक्सलियों को गिरफ्तार करने के बाद आस-पास के क्षेत्रों में योजनाबद्ध रूप से यह अफवाह भी फैला रखी थी कि उन सबकी गिरफ्तारी के लिए संतोष ने ही मुखबिरी की थी। जिससे संतोष की जान को अब नक्सलियों से भी खतरा उत्पन्न हो गया है। इस पूरे षड्यंत्र में संभाग का पुलिस मुखिया कल्लूरी शामिल था, इस बात की पुष्टि स्वयं संतोष ने अपनी गिरफ्तारी के दो माह पूर्व जगदलपुर के कुछ पत्रकार मित्रों से की थी।

भटरीमऊ के ग्रामीणों के संकल्प का सच उजागर होने के डर से उठाया था संतोष को

दरभा ब्लॉक के भटरीमऊ के ग्रामीणों से पूछताछ और कल्लूरी की नक्सली उन्मूलन की नीति से असंतुष्ट जगदलपुर के ही एक पुलिस अधिकारी द्वारा नाम ना उजागर करने की शर्त पर दी गई जानकारी से जो कहानी सामने आ रही है उसके अनुसार संतोष की गिफ्तारी की असली कहानी इस समाचार से जुडी है http://naidunia.jagran.com/…/jagdalpur-maoists-bhatrimu-mao… इस समाचार की रचना बाकायदा कल्लूरी की जानकारी और निर्देश पर पिछले महीने भर से चल रही थी। इस योजना के तहत भारी संख्या में पुलिस दल पैरामिलिट्री फ़ोर्स के साथ घोर नक्सल प्रभावित गांव भटरीमऊ गाँव का तीन चक्कर सर्चिंग के नाम पर लगा चुकी थी। इस दौरान ग्रामीणों की ना केवल निर्मम पिटाई की गयी बल्कि कुछ को नक्सली बता पकड़ कर दरभा थाना लाकर भी कई दिन तक पीटा गया। ग्रामीणों के अनुसार जब ग्राम के कुछ लोग अपने साथियों का पता करने दरभा थाना आये तो एडिशनल एसपी विजय पाण्डेय ने उन्हें धमकाया कि एक साथ सभी ग्रामीण 29 सितम्बर दिन मंगलवार को 11 बजे तक थाना आ जाओ तभी गिफ्तार ग्रामीणों को छोड़ेंगे।
ग्रामीणों को समझाने के लिए संतोष यादव पर भी दबाव बनाया गया था। तब ग्रामीणों को बताया ही नहीं गया था कि उन्हें नक्सलपंथ से किनारे करने तथा नक्सलियों को मार भगाने का संकल्प करने के आयोजन के लिए बुलाया गया है। इधर पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत जिला मुख्यालय के कुछ पत्रकारों के साथ बस्तर आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी, एसपी अजय यादव तथा एडिशनल एसपी विजय पांडेय दरभा में 11 बजे पंहुच चुके थे। मगर साथ गए पत्रकारों ने भी जो देखा वह नहीं छापकर पुलिस विभाग द्वारा परम्परागत जारी बिना हस्ताक्षर कि विज्ञप्ति को ही प्रकाशित कर दिया।
संतोष को उस दिन उठाने (गिफ्तार करने) की कोई योजना पुलिस की नहीं थी। यह स्थिति अचानक तब आई जब ग्रामीणों ने अपने गिरफ्तार साथियों को छुडाने के लिए संतोष से बात शुरू की और वादे के अनुसार छुडवाने के लिए संतोष पर दबाव बनाया। संतोष ने दरभा थानेदार से बात की, उनके द्वारा ग्रामीणों को छोड़ने से मना करने पर उसने खुद सच लिखने और जगदलपुर के पत्रकारों को सच बताने की बात कर घर चला गया। इसके बाद जब इस बात की जानकारी पुलिस के उच्च अधिकारियों को हुई तो तुरंत उसे कल्लूरी साहब बुला रहे हैं कहकर थाना बुला लिया गया। तब भी पुलिस की योजना उसे गिरफ्तार करने की नहीं बस डरा-धमकाकर छोड़ देने की थी।

सोशल मीडिया और प्रदेश से सैकड़ों फोन की वजह से मजबूरी में कोर्ट में पेश करना पड़ा

लेकिन पूरी रात संतोष के घर वापस नहीं पहुँचने और दरभा थाना द्वारा उसके वहां नहीं होने कि जानकारी देने से घबराए संतोष के मित्रों और पत्नी ने दक्षिण बस्तर के पत्रकारों को फोन करना शुरू कर दिया। 30 सितम्बर की संध्या तक मामला सोशल मीडिया में भी छा गया जिससे कल्लूरी, यादव व पाण्डेय सहित दरभा थानेदार तक रायपुर और कई स्थानों से फोन आने शुरू हो गए। जिसके बाद मज़बूरी में पुलिस ने एक अक्तूबर को हड़बड़ी में कोर्ट में पेशकर उस पर झीरम घाटी हमले में शामिल रहने और नक्सलियों को पुलिस की गतिविधियों की सूचनाएं लीक करने का आरोप लगाया। न्यायालय ने साक्ष्य इकट्ठा करने और पूछताछ करने के लिए संतोष को दो दिन के रिमांड पर फिर से पुलिस को सौंप दिया है। जगदलपुर के पत्रकारों को एडिशनल एसपी विजय पांडेय ने बताया कि 21 सितम्बर को झीरम घाटी में एसटीएफ पार्टी पर नक्सलियों द्वारा किए गए हमले तथा सड़क व पेड़ काटने के मामले में अन्य नक्सलियों के समेत संतोष यादव के विरूद्ध दरभा थाने में नामजद एफआईआर दर्ज किया गया था। पड़ताल में यह भी जानकारी मिली कि संतोष यादव माचकोट एलओएस कमांडर शंकर से निरंतर संपर्क में रहता है। उसके द्वारा पुलिस की गतिविधियों की जानकारी नक्सलियों तक भेजी जाती थी। उसके विरूद्ध महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलने के उपरांत गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने संतोष यादव के विरूद्ध आईपीसी की धारा 147, 148, 149, 341, 120 बी, 431, 307, 302 समेत छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम के तहत अपराध दर्ज किया है।

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