उत्तर प्रदेश की शासन प्रणाली में छेद ही छेद हैं। न्यायपालिका इसमें सेंध लगाने के लिए अधिकार सम्पन्न है, लेकिन इसके पहले नौकरशाही को चेतावनी दिया जाना जरूरी है- ‘अपने को सुधार लो’। कोर्ट में कोर्ट की सहायता के दौरान गलतबयानी, गलत हलफनामा, अभिलेखों के विपरीत जानकारी दिया जाना, सही तथ्यों को छिपाना मानो सरकारी पक्ष का रवैया हो गया है। इससे सरकार की विश्वसनीयता पर गहरा प्रश्नचिन्ह लग रहा है। हाईकोर्ट पहले ही देख चुका है कि प्रदेश में खाद्यान्न घोटाले में सरकारी अधिकारी ने किस तरह राजकीय खजाने से गबन किया और गरीबों को मिलने वाला खाद्यान्न राज्य से बाहर भेज दिया (विश्वनाथ चतुर्वेदी बनाम भारत सरकार- 2010 एडीजे 504)। यही नहीं, उत्तर प्रदेश में अवैध व अनियंत्रित खनन के द्वारा नदियों के जलप्रवाह को गंभीर क्षति पहुंचाई जा रही है और पर्यावरण को बिगाड़ा जा रहा है (कौसर बनाम केंद्र एवं अन्य 9416/2010)। उत्तर प्रदेश में कुशासन के चलते स्थिति अत्यंत गंभीर है।
यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने की है। लखनऊ खंडपीठ केन्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह एवं न्यायमूर्ति एससी चौरसिया की खंडपीठ ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम के तहत नियुक्तियों में धांधली और भेदभाव के विरुद्ध तीन दर्जन से अधिक याचिकाओं को स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की है। यानी न केवल एनआरएचएम के फंड का गबन किया गया है, बल्कि उसमें नियुक्ति केमामले में भी भारी धांधली और अनियमितताएं की गई हैं। जहां तक एनआरएचएम के फंड में गबन का सवाल है तो केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त विभागीय जांच टीम ने प्रथम दृष्टया 3700 करोड़ रुपए से अधिक का घोटाला पकड़ा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इस घोटाले में दो सीएमओ और एक डिप्टी सीएमओ की हत्या का संज्ञान लेने से रक्षात्मक मुद्रा में आई उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार फिलवक्त ईमानदार दिखने की कवायद में जुटी है। सरकार ने एनआरएचएम बजट का विशेष ऑडिट भारत सरकार के सीएजी से कराने के लिए अनौपचारिक अनुरोध पत्र केंद्र को भेजा है। एनआरएचएम की समीक्षा के लिए आई केंद्रीय टीम ने घोटाले-घपले में कई मामले सिर्फ खाते-बही देखकर ही पकड़ लिए हैं। खातों से पता चला है कि राज्य में ज्यादातर मामलों में ठेका पाने वाली एजेंसियों को सरकारी नियमों को धता-बता कर अग्रिम भुगतान जारी कर दिया गया। खास बात यह है कि इसके बावजूद अधिकांश मामलों में ये एजेंसियां काम पूरा नहीं कर सकीं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि सिर्फ सामान खरीद के नाम पर 250.24 करोड़ रुपए एडवांस में जारी किए गए। इसमें से चार एजेंसियों के पास 67.50 करोड़ रुपए लंबे समय तक बिना खर्च के पड़े रहे। इसमें सबसे ऊपर है उत्तर प्रदेश लघु उद्योग निगम यानी यूपीएसआईसी, कानपुर। इसे सिर्फ अस्पतालों में साफ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए ही 39.63 करोड़ रुपए एडवांस में जारी किए गए। इसने 11 ठेकों में से सिर्फ दो में ही 19.32 करोड़ रुपए का खर्च दिखा दिया और बाकी रकम नौ महीने तक इसी के पास पड़ी रही। इसी तरह यूपी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड को जारी किए गए 5.16 करोड़ रुपए के एडवांस में से उसने सिर्फ 4.32 करोड़ रुपए के काम करवाए। रिपोर्ट के मुताबिक, जननी सुरक्षा योजना से लेकर अंधता निवारण के लिए उपकरणों की खरीद, संविदा पर कर्मचारियों को रखने, हॉस्पिटल वेस्ट मैनेजमेंट, हास्पिटल क्लीनिंग एंड गार्डेनिंग और सेफ ड्रिंकिंग वाटर मुहैया कराने तक में गड़बडिय़ां पाई गई हैं। गौरतलब है कि केंद्र की विशेष ऑडिट टीम ने गत मई में मिशन के कामों की जांच की थी। 13 से 15 मई के बीच 20 सदस्यीय इस टीम ने फैजाबाद, रायबरेली, उन्नाव, हरदोई, मिर्जापुर, चंदौली, सोनभद्र, सीतापुर, बाराबंकी, कानपुर देहात, सुल्तानपुर सहित 11 जिलों में मिशन के कामों की पड़ताल की थी। 400 पेज की इस ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि पिछले तीन सालों में प्रदेश सरकार को 5100 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि दी गई, जिसमें 50 फीसदी से अधिक रकम की बंदरबांट कर ली गई।
प्रदेश में एनआरएचएम के तहत पिछले दो साल के दौरान सिर्फ चार एजेंसियों को छोटे-मोटे निर्माण कार्य के नाम पर लगभग एक हजार करोड़ रुपए के ठेके दिए गए। राज्य सरकार ने इसके लिए न तो खुले टेंडर की व्यवस्था को अपनाया और न ही काम की कोई निगरानी की। राज्य सरकार के परिवार कल्याण महानिदेशक ने अपनी जिम्मेदारी सिर्फ इन कंपनियों को 965 करोड़ से अधिक के ठेके की रकम जारी करने तक सीमित कर ली। इसमें से 566 करोड़ रुपए का ठेका सिर्फ यूपी प्रोसेसिंग एंड कंस्ट्रक्शन कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड यानी पैकफेड को दिया गया। इसी तरह 301 करोड़ रुपए का ठेका यूपी प्रोजेक्ट्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) को, 53 करोड़ का कंस्ट्रक्शन एंड डिजाइन सर्विसेज (सीडीएस) को और 45 करोड़ का यूपी लेबर एंड कंस्ट्रक्शन कोऑपरेटिव एसोसिएशन लिमिटेड (लैकपेड) को दिया गया। खुले टेंडर या कम लागत वाली नीलामी के बजाय मनमाने ढंग से ठेके दिए गए हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में जनता को बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के लिए केंद्र द्वारा चलाई जा रही राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना के तहत राज्य सरकार को वित्तीय वर्ष 2010-11 में 2928 करोड़ रुपए की राशि आबंटित की गई थी। इसमें से 529 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं हो सके। चालू वित्तीय वर्ष 2011-12 में 2320 करोड़ रुपए अभी राज्य सरकार को मिलने हैं। इसके अलावा वर्ष 2010-11 की खर्च न हो सकी 529 करोड़ रुपए की राशि भी राज्य सरकार को व्यय के लिए दी गई है।
जहां तक प्रदेश में जर्जर स्वास्थ्य सेवा की बात है तो इसे इतने से ही समझा जा सकता है कि देश में प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर है तो यूपी में पांच हजार से अधिक जनसंख्या पर सिर्फ एक चिकित्सक उपलब्ध है। सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों के चार हजार पद खाली हैं। चाहे एक्सरे हो या वक्ष रोग विशेषज्ञ हों, हृदय रोग विशेषज्ञ हों या पैथालॉजिस्ट हों, सर्जन हों या एनस्थेटिस्ट, विशेषज्ञ डाक्टर तो सरकार को ढूंढ़े नहीं मिल रहे। बच्चों के डाक्टरों के करीब 200 पद रिक्त हैं। करीब 150 एनस्थेटिस्ट कम होने से चंद सरकारी अस्पतालों में ही जटिल ऑपरेशन हो पाते हैं। ऐसा नहीं कि नियुक्ति प्रक्रिया शुरू न की गई हो, मगर सरकारी सेवाओं के प्रति आकर्षण न होने के कारण मात्र 353 चिकित्सकों की तैनाती हो सकी। यही हाल पैरा मेडिकल स्टाफ का भी है। फार्मासिस्टों के 5222 स्वीकृत पदों में से करीब तीन हजार, लैब टेक्नीशियन के 2150 स्वीकृत पदों में से चार सौ पद खाली हैं। नियुक्ति की प्रक्रिया हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से लंबित है।
इसके अलावा मानकों के मुताबिक लगभग 18 हजार प्रशिक्षित नर्सों की तैनाती होनी चाहिए, लेकिन स्वीकृत पद 4982 में भी साढ़े तीन सौ रिक्त हैं। वर्ष 2010-11 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की विभिन्न योजनाओं को स्वीकृत करीब 3700 करोड़ रुपए में अनियमितताओं और घोटालों के आरोपों के बावजूद 521 करोड़ रुपए खर्च नहीं हो सके। रिश्ते सामान्य न होने के कारण इस बार केंद्र ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के सालाना बजट में करीब 694 करोड़ की कटौती कर दी। प्रदेश सरकार के 3309 करोड़ रुपए के प्रस्ताव में केंद्र ने 2615 करोड़ रुपए की ही मंजूरी दी। जबकि प्रदेश सरकार की शिकायत है कि केंद्र ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में अपने हिस्से का बकाया 295.51 करोड़ रुपया नहीं दिया।
एनआरएचएम योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में त्वरित स्वास्थ्य सेवा देने के लिए प्रदेश के सभी 820 ब्लाकों में 988 एम्बुलेंस चलवाने की योजना बनी थी। एम्बुलेंस की खरीद, उनके संचालन, ड्राइवरों के वेतन व अन्य मदों में पांच वर्ष तक खर्च के लिए कुल 1043.40 करोड़ की राशि की व्यवस्था केंद्र सरकार ने की थी। राज्य सरकार ने 71.23 करोड़ रुपए से 988 एम्बुलेंस खरीद भी लिए। मगर इन एम्बुलेंस को कौन संचालित करेगा, यह निर्णय न होने से सभी एम्बुलेंस अभी भी निर्माता कंपनी के शो-रूम में खड़ी हैं।
साभार : डेली न्यूज एक्टिविस्ट


