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मेक इन इंडिया पर पुत रही रोजाना कालिख… दाल-दाल छोड़ो… बीफ-बीफ बोलो…

जुर्रत से हर नतीजे की परवाह किए बगैर… दरबार छोड़ आया हूं सजदा किए बगैर… ये शहरे एहतिजाज है खामोश मत रहो… हक भी नहीं मिलेगा तकाजा किए बगैर… ये शेर है मुनव्वर राणा का, जो उन लेखकों, कवि-साहित्यकारों व शायरों में शुमार हैं, जिन्होंने मौजूदा हालात को देखते हुए अपने पुरस्कार लौटा दिए हैं, जिसको लेकर फुर्सतिया न्यूज चैनलों में बहस भी जारी है। कौन कहता है कि हम 21वीं सदी में रह रहे हैं। कल तक तमाम विदेशी भारत को सांप-सपेरों के देश के रूप में ही जानते थे और ऐसा लगता है कि स्थिति अभी भी कमोबेश वही बनी हुई है। एक तरफ हम मेक इन इंडिया के साथ-साथ डिजीटल इंडिया की बात करते हुए अमेरिका के सिलीकॉन वेली में बड़ी शान से फेसबुक, गुगल और माइक्रोसॉफ्ट के दफ्तरों में काबिज भारतीय टेलेंट का बिगुल बजाते हैं, तो दूसरी तरफ दादरी से लेकर देशभर में हो रही साम्प्रदायिक घटनाओं पर शर्मसार भी होते हैं।

जुर्रत से हर नतीजे की परवाह किए बगैर… दरबार छोड़ आया हूं सजदा किए बगैर… ये शहरे एहतिजाज है खामोश मत रहो… हक भी नहीं मिलेगा तकाजा किए बगैर… ये शेर है मुनव्वर राणा का, जो उन लेखकों, कवि-साहित्यकारों व शायरों में शुमार हैं, जिन्होंने मौजूदा हालात को देखते हुए अपने पुरस्कार लौटा दिए हैं, जिसको लेकर फुर्सतिया न्यूज चैनलों में बहस भी जारी है। कौन कहता है कि हम 21वीं सदी में रह रहे हैं। कल तक तमाम विदेशी भारत को सांप-सपेरों के देश के रूप में ही जानते थे और ऐसा लगता है कि स्थिति अभी भी कमोबेश वही बनी हुई है। एक तरफ हम मेक इन इंडिया के साथ-साथ डिजीटल इंडिया की बात करते हुए अमेरिका के सिलीकॉन वेली में बड़ी शान से फेसबुक, गुगल और माइक्रोसॉफ्ट के दफ्तरों में काबिज भारतीय टेलेंट का बिगुल बजाते हैं, तो दूसरी तरफ दादरी से लेकर देशभर में हो रही साम्प्रदायिक घटनाओं पर शर्मसार भी होते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने मेक इन इंडिया के सपने को साकार करना चाहते हैं और देश के साथ-साथ दुनियाभर में वे दौरे भी इसीलिए कर रहे हैं, मगर क्या मौजूदा हालात को देखते हुए ये सपने पूरे होंगे? एकाएक देश में असहनशीलता, असहिष्णुता और अभद्रता बढ़ती जा रही है। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को एक बार फिर पूछना पड़ा कि समाज में विरोध को स्वीकार करने और सहन करने की क्षमता क्यों हो रही है? अभी पिछले दिनों ही राष्ट्रपति की इन्हीं बातों को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री ने दादरी सहित ऐसी घटनाओं का विरोध किया था, लेकिन उनके भाषण देने मात्र से ही ये समस्या सुलझेगी नहीं, बल्कि उन्हें कठोर कदम ऐसे तत्वों के खिलाफ उठाना भी होंगे। फिलहाल तो मेक इन इंडिया के चेहरे पर रोजाना कालिख ही पुत रही है।

अगर प्रधानमंत्री के साथ-साथ उनकी पूरी पार्टी चाहती है कि मेक इन इंडिया का सपना पूरा हो तो अब इसमें बाधा डालने वालों के साथ सख्ती से निपटने की दृढ़ इच्छाशक्ति भी दिखाना होगी। इसकी शुरुआत भले ही उन्हें अपने घर-परिवार से ही क्यों ना करना पड़े। जब तक इस तरह की कार्रवाई हकीकत में नजर नहीं आएगी तब तक बिगड़े मौजूदा हालात सुधरेंगे नहीं, क्योंकि भाषणों से कुछ नहीं होता। इधर देश की जनता अपनी ही समस्याओं से त्रस्त है, जिनमें गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई प्रमुख है। आम आदमी को दाल-रोटी भी अब मयस्सर नहीं है, क्योंकि दाल के भाव ही आसमान पर पहुंच गए हैं। यह भी संभव है कि यह आम आदमी अपनी दाल-रोटी को लेकर फिर सवाल ना पूछने लगे इसलिए बड़ी चतुराई से उसकी समस्याओं को साम्प्रदायिक रंग देने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि वह एक बार फिर धर्म, जाति, सम्प्रदाय के खानों में बटकर अपनी मूल समस्याएं भूल जाए। दाल-दाल छोड़ो… और बीफ-बीफ बोलो… की मौजूदा सियासत पूरे देश को उजाले की बजाय एक बार फिर अंधेरे की ओर ही ले जा रही है… अब तो जागो…

लेखक राजेश ज्वेल हिन्दी पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं. सम्पर्क – 098270-20830 Email : [email protected]

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