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बिहार… अहंकार और मुगालतों की फिर हुई हार….

देश की जनता ने अधिकांश चुनावों में किसी भी दल या उसके नेता को सबक सिखाने के लिए नकारात्मक मतदान जिसे हम नेगेटिव वोटिंग कहते हैं, ही ज्यादा किया है। जैसे पिछले लोकसभा चुनाव में देश की जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार और उसके कुकर्मों से आजिज आ चुकी थी और उन्हें नरेन्द्र मोदी के रूप में सशक्त विकल्प मिला, लिहाजा कांग्रेस के खिलाफ लोगों ने जमकर मतदान किया। नतीजे में भारतीय जनता पार्टी को उसके इतिहास की सर्वाधिक सीटें मिलीं और जननायक के रूप में नरेन्द्र मोदी देश की राजनीति पर छा गए।

देश की जनता ने अधिकांश चुनावों में किसी भी दल या उसके नेता को सबक सिखाने के लिए नकारात्मक मतदान जिसे हम नेगेटिव वोटिंग कहते हैं, ही ज्यादा किया है। जैसे पिछले लोकसभा चुनाव में देश की जनता कांग्रेस के भ्रष्टाचार और उसके कुकर्मों से आजिज आ चुकी थी और उन्हें नरेन्द्र मोदी के रूप में सशक्त विकल्प मिला, लिहाजा कांग्रेस के खिलाफ लोगों ने जमकर मतदान किया। नतीजे में भारतीय जनता पार्टी को उसके इतिहास की सर्वाधिक सीटें मिलीं और जननायक के रूप में नरेन्द्र मोदी देश की राजनीति पर छा गए।

इसमें कोई शक नहीं कि श्री मोदी में विकास करने की ललक और एक स्पष्ट दूरदृष्टि यानि विजन भी है। मैं खुद प्रशंसक रहा हूं, लेकिन अंधभक्त कतई नहीं हूं… पहले दिल्ली के चुनाव में और उसके बाद अभी बिहार के चुनाव में श्री मोदी ने जिन निम्न स्तरों के भाषण दिए वे वाकई आलोचना के काबिल हैं। देश के प्रधानमंत्री से जनता इस तरह के भाषण की उम्मीद नहीं कर सकती। यही कारण है कि नई दिल्ली में शानदार तरीके से अरविन्द केजरीवाल ने टीम मोदी को पटकनी दी और अब यही परिणाम बिहार में भी आए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि बिहार की जनता ने नीतीश और लालू के साथ-साथ कांग्रेस को भी वोट दिए और महागठबंधन ने ऐतिहासिक जीत हासिल करते हुए 178 सीटें हासिल कर लीं, जबकि भाजपा और उनके गठबंधन एनडीए को मात्र 58 सीटें ही मिली। इसमें भी भाजपा की 53 सीटें शामिल हैं।

भले ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में भाजपा बिहार चुनाव में सबसे आगे रही हो, मगर यह समझना भी जरूरी है कि बिहार की जनता ने नीतीश-लालू को तो जिताया ही, मगर उससे अधिक भाजपा तथा खासकर नरेन्द्र मोदी को हराया है। इतनी अधिक संख्या में महागठबंधन को सीटें मिलने की उम्मीद किसी को नहीं थी और यह साफ-साफ आक्रोश का वोट है। जब भी जनता इस तरह आक्रोशित होकर वोट देती है तो ऐसे चौंकाने वाले एकतरफा परिणाम आते हैं। नई दिल्ली में भी भाजपा का सूपड़ा साफ हुआ और मात्र 3 सीटें मिलीं और यही हाल बिहार में भी हुआ। जनता ने तबियत से भाजपा और श्री मोदी की धुलाई की है और इस सच्चाई को अब तुरंत मोदी जी जैसे होशियार राजनेता को समझ लेना चाहिए। आश्चर्य तो इस बात का है कि नई दिल्ली में जो गलतियां भाजपा और श्री मोदी ने की लगभग वही गलतियां बिहार चुनाव में भी दोहराई गई।

अपनी पूरी ताकत, साधन-संसाधन और मीडिया मैनेजमेंट के बावजूद बिहार में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। अगर यह हार-जीत नेक-टू-नेक यानि कम सीटों से होती तो भी भाजपा के लिए गनीमत रहती, मगर यहां तो सीधे-सीधे जनता ने भाजपा और खासकर श्री मोदी के 18 माह के केन्द्र के कार्यकाल को नकार दिया है। आप मार्केटिंग की बदौलत अपनी विदेश यात्राओं का टीवी चैनलों के माध्यम से भरपूर कवरेज करवाओ और समाज के चंद लोगों को आकर्षित कर लो अथवा डिजीटल इंडिया या मेक इन इंडिया के शगूफे छोड़ो, जबकि पूर्व में भी भाजपा शाइनिंग इंडिया और फिल गुड में गच्चा खा चुकी है। देश की जनता को गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी से राहत दिलवाने के जो दावे अपने जोशीले भाषणों में मोदी जी ने किए थे उसके अते-पते नहीं हैं। दाल-रोटी तक खाने को जनता मोहताज हो गई।

विदेशी कालाधन या आतंकवाद जैसे तमाम मुद्दों पर तो मोदीजी असफल हुए ही हैं, रही-सही कसर बीफ – पाकिस्तान जैसी बातों ने पूरी कर दी। इसमें कोई शक नहीं कि असहिष्णुता का माहौल बना है और इसे नकारा नहीं जा सकता। अभी भी वक्त है मोदी जी संभल जाओ और चुनावी भाषण चिल्ला-चिल्लाकर देना बंद करो और जनता को मैदानी राहत पहुंचाओ… वरना अहंकार और मुगालतों की हार का ये सिलसिला इसी तरह जारी रहेगा… जनता चुनावी घोषणा और वायदों को पूरा करवाने के लिए इसी तरह के परिणाम देती रही है। आज श्री मोदी को भाषण देते सुनना वाकई किसी कोफ्त से कम नहीं रहता।

जब वे चिल्ला-चिल्लाकर बिहार की चुनावी सभाओं में जनता से ये पूछ रहे थे कि नीतीश कुमार ने उनसे वायदा किया था कि अगर वे बिजली नहीं दे पाए तो उनका वोट मांगने भी नहीं आएंगे… क्या नीतीश बाबू ने बिजली दी… इस तरह के भाषण देने वाले श्री मोदी खुद यह कैसे भूल गए कि उन्होंने तो नीतीश कुमार से कई गुना अधिक चमकीले वायदे देश की जनता से किए थे, जिनमें विदेशों में जमा कालाधन लाकर 15-15 लाख रुपए व्यक्तिगत खातों में जमा करवा देने जैसा आजाद भारत का सबसे बड़ा और लुभावना चुनावी वायदा किया, जिसे बाद में उन्हीं की पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने चुनावी जुमला करार दे दिया। मैं देश नहीं झुकने दूंगा – मैं शीश नहीं झुकने दूंगा जैसे जोशीले गीत भी श्री मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में खूब गाए और सुनाए और यह प्रचार-प्रसार भी खूब हुआ कि चायना और पाकिस्तान तो घुटने टैक देगा और अमेरिका भी मोदी जी नेतृत्व में भारत की गुलामी करने लगेगा। देश से महंगाई तो ऐसे गायब हो जाएगी जैसे गधे के सिर से सिंग।

जनता को पेट्रोल-डीजल 30-40 रुपए लीटर मिलने लगेगा और कांग्रेस के राज में जो 55 रुपए किलो दाल मिल रही थी, जिसे लेकर हेमा मालिनी तक को सड़क पर उतरना पड़ा था। दाल के भाव मोदी के राज में 25-30 रुपए किलो या अधिक से अधिक 40-50 रुपए किलो तक ही रहना थे, लेकिन उसके दाम बढ़कर 200 रुपए किलो तक पहुंच गए और मोदीजी की पार्टी और उससे जुड़े संगठन दाल को छोड़ बीफ-बीफ का राग अलापते रहे। देश के नौजवानों को मोदीजी ने मेक इन इंडिया का सपना दिखाया और भरपूर रोजगार उपलब्ध कराने के दावे भी किए। बिहार के चुनाव में ये मुद्दा भी भाजपा ने जोर-शोर से उठाया कि बिहारी युवाओं को अब कामकाज की तलाश में दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में नहीं जाना पड़ेगा, मगर हकीकत यह है कि इन 18 महीनों में बिहार के साथ-साथ देश में भी रोजगार के अवसर नहीं बढ़ सके और जो बेरोजगार तथा युवा वर्ग बड़ी संख्या में मोदी जी से जुड़ा था उसका मोह भंग भी हो गया। रही-सही कसर मध्यप्रदेश के व्यापमं घोटाले और मोदी गेट जैसे घोटालों ने पूरी कर दी।

मोदी  जी जहां कांग्रेस से तो भ्रष्टाचार का हिसाब मांगते हुए जमाई राजा यानि रॉबर्ट वाड्रा को जेल भेजने की बात करते रहे, मगर अपने कार्यकाल के 18 महीनों में वाड्रा को जेल भेजना तो दूर, अभी तक लगाए गए आरोप ही प्रमाणित नहीं करवा पाए। व्यापमं और मोदी गेट के साथ-साथ अन्य घपलों घोटालों पर भी मोदीजी ने मौन धारण कर रखा। अभी भी बिहार के अलावा अपने अन्य भाषणों में मोदी जी देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने, महंगाई और गरीबी घटाने के साथ-साथ देश की तरक्की के बोगस आंकड़े परोसते हैं। हेरान-परेशान जनता यही पूछ रही है कि मोदी जी ने ये कैसा अदृश्य विकास और तरक्की करवाई है जो किसी को दिखाई या महसूस ही नहीं होती। और तो और चायना से आगे निकलने के दावे तक भाषणों में किए जा रहे हैं। एक तरफ मोदीजी इन तमाम मोर्चों पर असफल रहे तो दूसरी तरफ अपने सहयोगी संगठनों के भड़ाऊ और आपत्तिजनक बयानों पर भी रोक नहीं लगा सके। उनके खास सिपहसालार और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तो घनघोर अहंकार और मुगालते में रहते हैं और भाषणों के अलावा मीडिया में उनके इंटरव्यू देखे और सुने जाएं तो ऐसा लगता है कि सारे ज्ञान का ठेका सिर्फ अकेले उन्हीं के पास है।

पहले दिल्ली चुनाव के वक्त भी उन्होंने जीत के दावे बढ़-चढ़कर किए थे और अभी बिहार चुनाव के वक्त परिणाम आने के 24 घंटे पहले तक वे एकतरफा जीत के दावे करते नजर आए। उन्होंने तो यहां तक कहा कि 8 नवंबर को सुबह से परिणाम आना शुरू होंगे और 11-12 बजने तक भाजपा स्पष्ट बहुमत हासिल कर लेगी और दोपहर 2 बजे तक दो तिहाई सीटें भाजपा को मिल जाएगी और तब नीतीश कुमार अपना इस्तिफा लेकर राजभवन की ओर बढ़ जाएंगे। अब पहली फुर्सत में अमित शाह को भी अपना ऐसा अहंकार और मुगालता दूर कर लेना चाहिए। अपनी टीम में भी उन्होंने ऐसे पदाधिकारियों खासकर महासचिव की नियुक्ति की है जो कल तक गली-मोहल्ले या किसी एक विधानसभा के नेता हुआ करते थे और उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाकर पहले दिल्ली और फिर बिहार में कमान सौंपी और ऐसे बड़बोले नेता भी चुनाव हरवाने में मददगार साबित हुए और उनके शाहरुख खान सहित अन्य बयान पार्टी के लिए शर्म का कारण भी बने। अभी भी वक्त है मोदी जी के साथ-साथ पूरी भाजपा इन चुनाव परिणामों से सबक सीखे और जनता को मैदानी राहत दिलवाएं।

लेखक राजेश ज्वेल इंदौर के पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक है. संपर्क 9827020830

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