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उत्तर प्रदेश की उल्टी चाल (चार) : भ्रष्‍टाचार की आबोहवा में हजारों करोड़ का आबकारी घोटाला

लखनऊ : माया सरकार के चार साल से अधिक के कार्यकाल में तीन बार बदली गई आबकारी नीति : उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार के चार वर्षों से अधिक के कार्यकाल में तीन बार तो आबकारी नीति बदली गई और इस दौरान हजारों करोड़ का आबकारी घोटाला हुआ। आज स्थिति यह है कि पूरे प्रदेश के आबकारी कारोबार पर शराब माफिया पोंटी चड्ढा का कब्जा है। माया सरकार के पहले वित्त वर्ष से ही यह घोटाला चल रहा है। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गई, मगर संबंधित वित्त वर्ष समाप्त हो गया और सुप्रीम कोर्ट में न तो पोंटी चड्ढा की ब्लू वाटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड की ओर से कोई हाजिर हुआ और न ही उप्र सहकारी चीनी मिल फेडरेशन की ओर से।

लखनऊ : माया सरकार के चार साल से अधिक के कार्यकाल में तीन बार बदली गई आबकारी नीति : उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार के चार वर्षों से अधिक के कार्यकाल में तीन बार तो आबकारी नीति बदली गई और इस दौरान हजारों करोड़ का आबकारी घोटाला हुआ। आज स्थिति यह है कि पूरे प्रदेश के आबकारी कारोबार पर शराब माफिया पोंटी चड्ढा का कब्जा है। माया सरकार के पहले वित्त वर्ष से ही यह घोटाला चल रहा है। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गई, मगर संबंधित वित्त वर्ष समाप्त हो गया और सुप्रीम कोर्ट में न तो पोंटी चड्ढा की ब्लू वाटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड की ओर से कोई हाजिर हुआ और न ही उप्र सहकारी चीनी मिल फेडरेशन की ओर से।

नतीजतन, वित्त वर्ष समाप्त होने के साथ ही याचिका निरर्थक हो गई। याचिका में पहले ही वित्त वर्ष में 4000 करोड़ रुपए के आबकारी राजस्व घोटाले का आरोप लगाया गया था। वर्तमान समय में मेरठ व बरेली जोन का पूरा थोक व फुटकर व्यवसाय पोंटी चड्ढा की कंपनियों के कब्जे में है। प्रदेश भर में देसी और विदेशी मदिरा के थोक व्यापार पर भी चड्ढा ग्रुप का कब्जा है। आबकारी विभाग ने 2007-08 के लिए नई आबकारी नीति बनाई, जिसका लक्ष्य 3850 करोड़ रुपए राजस्व वसूलना था। हालांकि शासन का लक्ष्य 4,100 करोड़ का था, जो बाद में 4,192 किया गया, फिर दिसम्बर 2007 में यह लक्ष्य बढ़ाकर 4592 करोड़ कर दिया गया। पर बीते वर्ष में कुल 3947 करोड़ रुपए की ही आय विभाग को हो पाई। अधिकारी कहते हैं कि शराब की सप्लाई टाइम पर न मिलना, कच्ची शराब व दूसरे प्रदेशों की चोरी-छिपे बिकने वाली शराब इसका मुख्य कारण है, पर हकीकत नई कंपनी को दिया गया ठेका रहा।

आबकारी विभाग में कर चोरी रोकने के नाम पर बसपा सरकार गठन के बाद आबकारी नीति में परिवर्तन करके निर्णय लिया गया कि देसी-विदेशी मदिरा को लाइसेंसियों तक पहुंचाने का काम शीर्ष सहकारी संस्था/सरकारी निगम, जिन्हें इस कार्य का अनुभव हो, उन्हें दिया जाए। 30 जून, 2007 को नई नीति घोषित की गई। लेकिन पिछले दरवाजे से सरकार ने अपनी ही आबकारी नीति को तोडक़र शीर्ष सहकारी संस्था के बजाय बगैर किसी टेंडर के प्रदेश के चार हजार करोड़ रुपए के सरकारी राजस्व की वसूली का ठेका ब्लू वाटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड को दे दिया, जबकि इस कंपनी का रजिस्ट्रेशन जालंधर (पंजाब) में 5 जून, 2007 को कंपनी रजिस्ट्रार, पंजाब, हिमाचल प्रदेश एवं चंडीगढ़ के समक्ष हुआ। सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद के एक पत्रकार विनय मिश्र ने विशेष अनुमति याचिका दाखिल करके इस घोटाले को चुनौती दी है।

मालूम हो कि शराब कंपनियों द्वारा उत्पादित सभी तरह की शराब-बीयर थोक-फुटकर धारक विक्रेताओं तक आबकारी विभाग के अधिकारियों की निगरानी में पहुंचाने व राजस्व वसूली का काम किसी शीर्ष संस्था या सरकारी निगम को सौंपने का आदेश बसपा सरकार ने 30 जून को जारी किया था। शर्त यह थी कि संबंधित सहकारी संस्था अथवा निगम के पास इस काम का तजुर्बा हो और उसमें सरकार की 51 फीसदी हिस्सेदारी हो। सरकार ने शराब के दामों में वृद्धि नहीं करने का भी फैसला किया था, लेकिन मेसर्स ब्लू वॉटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड को लाभ पहुंचाने के लिए रातोंरात अपनी ही बनाई आबकारी नीति की सरकार ने अनदेखी की और 4000 करोड़ रुपए के आबकारी कर की वसूली का ठेका इस कंपनी को दे दिया, जबकि यह कंपनी किसी भी तरह सरकार के मानदंडों को पूरा नहीं करती थी। कंपनी के पास इस काम का कोई अनुभव नहीं था।

महज 10 लाख रुपए की लागत से मेसर्स ब्लू वॉटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड 5 जून, 2007 को पंजीकृत हुई। कंपनी केपंजीकरण प्रमाणपत्र पर रजिस्ट्रार के रूप में मनमोहन जुनेजा (पंजाब, हिमाचल प्रदेश एवं चंडीगढ़) के दस्तखत हैं। कंपनी का मुख्यालय जालंधर (मकान संख्या- 15, मॉडर्न कालोनी) में है। स्थापना के सिर्फ एक माह बाद यानी 7 जुलाई, 2007 से मेसर्स ब्लू वॉटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड आबकारी कर वसूलने का काम करने लगी। आरोप है कि मायावती सरकार के पहले वित्तीय वर्ष में लगभग 4000 करोड़ रुपए के आबकारी राजस्व वसूली के घोटाले में शामिल ब्लू वाटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट के कोप से बचने केलिए अपना नाम बदलकर रायल ब्रेवरिजेज लिमिटेड कर लिया। गौरतलब है कि 5 जून 2007 को कंपनीज एक्ट 1956 के तहत पंजीकृत इस कंपनी ने अबतक अपने पंजीकृत कार्यालय का पता भी तीन बार बदला है। जालंधर के पते पर पंजीकृत इस कंपनी का नया पता लुधियाना का है।

इधर 7 जुलाई, 2007 को ब्लू वॉटर इंडस्ट्रीज को यूपी में आबकारी कर वसूलने का ठेका मिला और उधर भारत सरकार के कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार 10 जुलाई, 2007 को ही कंपनी बोर्ड ने विशेष प्रस्ताव पारित करके कंपनी का पंजीकृत कार्यालय मकान नं. 15, मॉडर्न कालोनी, जालंधर, पंजाब से बदलकर मकान नं. 972 फेस 3 बी-2 मोहाली, पंजाब कर दिया। फिर जनवरी, 2009 को कंपनी बोर्ड ने विशेष प्रस्ताव पारित करके कंपनी का नाम ब्लू वॉटर प्राइवेट लिमिटेड से बदलकर रायल बेवरिजेज प्राइवेट लिमिटेड कर दिया। इसके बाद पुन: इसके पंजीकृत कार्यालय का पता बदलकर 62-1, भाई रणधीर सिंह नगर, लुधियाना, पंजाब कर दिया गया। यह सारा खेल सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका से बचने के लिए खेला गया, ताकि कोर्ट वादी ब्लू वॉटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड का पता ही खोजता रहे और अंतत: सारा मामला टांय-टांय फिस्स हो जाए।

आबकारी राजस्व की वसूली का ठेका सरकारी नियमों के मुताबिक दिया जाता है। इसके लिए बकायदा निविदाएं आमंत्रित की जाती हैं, लेकिन मेसर्स ब्लू वॉटर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड को ठेका आवंटित करने में कोई निविदा आमंत्रित नहीं की गई थी। वर्ष 2007-08 में जब सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से राज्य में 4000 करोड़ रुपए के आबकारी राजस्व को चुनौती दी गई और कोर्ट ने इसका संज्ञान लेते हुए उप्र शासन सहित सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया तो शासन ने 4 मार्च 2008 को वर्ष 2008-09 की आबकारी नीति घोषित कर दिया। इसमें दुकानों के व्यवस्थापन के बिंदु-6 के मुताबिक आबकारी विभाग द्वारा राजस्व की चोरी रोकने हेतु जुलाई 2007 से थोक विक्रेताओं को दसी/विदेशी मदिरा व बीयर की आपूर्ति निर्माता आसवनियों/यवासनियों से सीधे न कराके उप्र सहकारी चीनी मिल संघ के माध्यम से कराने की व्यवस्था की गई, किंतु इस व्यवस्था से राजस्व प्राप्ति में अपेक्षित वृद्धि तो हुई ही नहीं, बल्कि मदिरा की आपूर्ति में कतिपय कठिनाइयां भी आईं। सो यह व्यवस्था वर्ष 2008-09 के लिए समाप्त करते हुए देसी/विदेशी मदिरा व बीयर की आपूर्ति पूर्व (जुलाई 2007 से पूर्व) की भांति कराए जाने का निर्णय लिया गया। तदनुसार संबंधित नियमावली में तत्काल प्रभाव से संशोधन भी कर दिया गया।

एक बार फिर सरकार ने 11 फरवरी, 2009 को नई आबकारी नीति की घोषणा की। इसमें पूरे प्रदेश को दो भागों में बांट दिया गया। आगरा, वाराणसी व लखनऊ (बरेली प्रभार को छोडक़र) जोन में देसी शराब, विदेशी मदिरा व बीयर की फुटकर दुकानों व मॉडल शॉप का व्यवस्थापन लॉटरी पद्धति से बरकरार रखा गया, जबकि मेरठ जोन (बरेली प्रभार सहित) को विशिष्ट जोन घोषित करते हुए इसके व्यवस्थापन का दायित्व एक बार फिर उत्तर प्रदेश सहकारी चीनी मिल संघ लखनऊ को सौंप दिया गया। सरकार ने 12 फरवरी 2009 के शासनादेश से मेरठ जोन को विशिष्ट जोन बनाते हुए इसके अंतर्गत मेरठ प्रभार, सहारनपुर प्रभार, मुरादाबाद प्रभार व बरेली प्रभार को सम्मिलित किया, जिसमें 17 जिले हैं।

नई आबकारी नीति लागू होने के बाद उप्र सहकारी चीनी मिल संघ ने शराब माफिया पोंटी चड्ढा की बेनामी कंपनियों को हैंडलिंग एजेंट बनाकर विदेशी और देसी मदिरा का थोक व्यापार सौंप दिया। आज की तारीख में विदेशी मदिरा की थोक वितरक एफएल-2 सनराइज डिस्ट्रीब्यूटर-नोएडा, राज एसोसिएट, चड्ढा ग्रुप-नई दिल्ली, इंप्रेक्स फूड-शकरपुर दिल्ली, रायल ब्रेवरीज लुधियाना, पटियाला किंग्स-नई दिल्ली व पटियाला किंग्स लिकर्स- नई दिल्ली और देसी शराब का थोक व्यापार सीएल-2 रायल ब्रेवरीज प्रा.लि. लुधियाना, विनी वाइन्स एवं ब्रेवरीज नई दिल्ली, फ्लोरा एंड फौना, दिल्ली व पटियाला किंग्स लिकर्स दिल्ली के हाथों में है। आरोप है कि ये सभी पोंटी चड्ढा की नामी-बेनामी कंपनियां हैं।

मालूम हो कि शराब बनाने का कच्चा माल शीरा है, जिसकी खरीद और बिक्री पर भी सरकारी नियंत्रण है। जबसे पेट्रोल में एथेनाल मिलाना अनिवार्य हुआ है, तबसे शीरे का मूल्य भी बहुत बढ़ गया है। बसपा सरकार ने नई शीरा नीति लागू करते हुए शीरा का मूल्य 50 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। इस समझौते ने सरकारी चीनी मिलों की कमर तोड़ दी है। कहते हैं कि यह भी शराब माफिया पोंटी चड्ढा के फायदे के लिए किया गया है।

लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और डेली न्यूज एक्टिविस्ट, इलाहाबाद के संपादक हैं.

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