Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सोशल मीडिया

सोशल मीडिया में बदजुबान होती अभिव्यक्ति की आजादी

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप्प सरीखे सोशल साइट्स ने वैश्विक स्तर पर लोगों को करीब आने का मौका दिया है तथा एक-दूसरे के विचारों और संस्कृति से परिचित भी कराया है। संचार का सदव्यवहार संवाद और संस्कृतियों के प्रसार का हमेशा से आधार रहा है। जिस तरह से सोशल मीडिया का विस्तार हुआ है, लोगों के विचारों में खुलापन आ गया है। सोशल मीडिया ने पूरे विश्व में लोगों को आन्दोलित सा कर दिया है।  राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक मुद्दे सोशल मीडिया पर अक्सर बहस के विषय बनते रहते हैं। राजनेता, खिलाड़ी, सिनेजगत के कलाकार सहित युवा वर्ग में सोशल मीडिया के प्रति काफी रूझान है। हर छोटे व बड़े मुद्दों पर अपनी बात या राय जाहिर करने का यह बेहतर मंच साबित हुआ है मगर वैचारिक अतिवाद की वजह से इसका बेजां इस्तेमाल भी खूब हो रहा है। इस वैचारिक अतिक्रमण ने अभिव्यक्ति की आजादी को कुछ हद तक बदजुबान बना दिया है।

फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप्प सरीखे सोशल साइट्स ने वैश्विक स्तर पर लोगों को करीब आने का मौका दिया है तथा एक-दूसरे के विचारों और संस्कृति से परिचित भी कराया है। संचार का सदव्यवहार संवाद और संस्कृतियों के प्रसार का हमेशा से आधार रहा है। जिस तरह से सोशल मीडिया का विस्तार हुआ है, लोगों के विचारों में खुलापन आ गया है। सोशल मीडिया ने पूरे विश्व में लोगों को आन्दोलित सा कर दिया है।  राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक मुद्दे सोशल मीडिया पर अक्सर बहस के विषय बनते रहते हैं। राजनेता, खिलाड़ी, सिनेजगत के कलाकार सहित युवा वर्ग में सोशल मीडिया के प्रति काफी रूझान है। हर छोटे व बड़े मुद्दों पर अपनी बात या राय जाहिर करने का यह बेहतर मंच साबित हुआ है मगर वैचारिक अतिवाद की वजह से इसका बेजां इस्तेमाल भी खूब हो रहा है। इस वैचारिक अतिक्रमण ने अभिव्यक्ति की आजादी को कुछ हद तक बदजुबान बना दिया है।

सोशल मीडिया का उपयोग संवाद के माध्यम के रूप में किया जा रहा था तो कुछ हद तक ठीक था मगर राजनीति के अखाड़ा में तब्दील होने के बाद यह आरोप-आपेक्ष का माध्यम तो बना ही इसके जरिए राजनीतिक दलों के समर्थक गाली-गलौज भी करते नजर आ रहे हैं। गुजरात में पटेल आन्दोलन और नोएडा के दादरी की घटना सहित विभिन्न संजीदा घटनाओं के बाद तनाव के लिए सोशल मीडिया पर सवाल खड़ा किया जाना लाजमी है। यह सवाल सोशल मीडिया पर नहीं बल्कि उसके इस्तेमाल करने वालों पर है। हाल के दिनों सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर धर्म विशेष, पार्टी विशेष और व्यक्ति विशेष के खिलाफ मर्यादा विहीन पोस्ट और कमेंट ने इस बड़े माध्यम को आचरण विहीन जुबानी जंग का मैदान सरीखा बना दिया है।

देश के बड़े सियासी नेताओं को सहित हर मुद्दों पर बेहूदा पोस्ट कर केे उसका मखौल उड़ाना निंदनीय है। असहमती का अधिकार लोकतंत्र में सभी को है मगर संवैधानिक दायरे में रह कर। हमें किस मुद्दे पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए इसका ख्याल रखना बेहद जरूरी है। इसके इस्तेमाल करते समय सभी को काफी जागरूक और संवेदनशील रहने की जरूरत है। आज कल सोशल मीडिया पर राजनेताओं का मखौल उड़ाना आम बात बन गया है। इसके लिए राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता समेत समर्थक और विरोधी जिम्मेदार हैं। सियायी दल के नुमाइन्दों सतिह प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व मंत्रियों के खिलाफ मर्यादा विहीन पोस्ट और प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर आसानी से देखने को मिल जाती हैं, जो कि हमारे अभिव्यक्ति के आजादी का बेजां इस्तेमाल के सिवा कुछ नहीं। इस चलन से सभी को बचने की जरूरत है। असहमती की दशा में हमें सहनशील हो कर अपने विचार रखने की जरूरत है। विरोध और समर्थन का तरीका सभ्य होना चाहिए।

धार्मिक विषयों पर कुछ लिखने या अपनी राय रखते समय यह ध्यान रखने की जरूरत है कि हमारे पोस्ट से समाज का कोई तबका आहत न हो। धर्म आचरण का विषय है समाज का हर व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार है कि वह खुद के धर्म का सम्मान जरूर करे मगर दूसरे धर्म के खिलाफ गलत टिप्पणी ना करे। ऐसी दशा में विरोधाभास कम देखने को मिलेगी। हमें यह सोचना होगा कि सोशल मीडिया एक बन्द खिड़की नहीं है वरन खुला आसमान सरीखा है।

हमारी बात चन्द लोगों तक जरूर पहुंचती है मगर उसका दायरा नदी के उस बहाव की तरह है जिसे चाह कर नहीं रोका जा सकता। ऐसी दशा में कभी-कभी कुछ गलत और समाज के किसी खास तबके को आहत करने वाले पोस्ट वायरल हो जाते हैं, जो दो समुदायों, दो समाजों के बीच नफरत फैलाने के लिए काफी होते हैं। ऐसे पोस्टों पर शाब्दिक हिंसा जोरों से होने लगती है। जो कि बहुत ही खतरनाक दौर तक पहुंच जाती है। गाय और दादरी का मुद्दा इसके चन्द उदाहरण भर हैं।

सोशल मीडिया ने सूचना और संचार के क्षेत्र में क्रान्ति ला दिया है। इस माध्यम ने न केवल लोगों को एक-दूसरे को जोड़ने का काम किया है बल्कि स्वतंत्र प्रतिक्रिया देने का सशक्त प्लेटफार्म मुहैया कराया है। हमें अपनी बातों को समाज के बीच बिना सेंसर के रखने का जरिया है सोशल मीडिया, इसका यह मतलब कत्तई नहीं की हम कुछ भी लिख और बोल दें। संवाद के इस सशक्त माध्यम के जरिये हमें शाब्दिक हिंसा फैलाने से बचने की सख्त जरूरत तो है ही साथ दूसरों की मर्यादा और निजता का भी ध्यान रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी के खिलाफ आरोप-आक्षेप लगा कर हम इस बड़े माध्यम का अपमान न कर खुद के संस्कारों को प्रदर्शित करते हैं।

इस माध्यम का उपयोग करते समय हमें यह सोचने की जरूरत है कि अपनी सभ्यता और मर्यादा का ध्यान रख कर समाजहित की बातों और बेहतर सूचनाओं को फैलाएं। राष्ट्रीय एकता और विकास के मुद्दों पर सार्थक बहस से इस माध्यम का बेहतर सदुपयोग किया जा सकता है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर युवा वर्ग की संख्या ज्यादा है, ऐसे में युवाओं को चाहिए कि आतंकवाद और कट्टरता के खिलाफ व्यापक बहस कर लोगों जाकरूक करने का प्रयास करें। समाज में सद्भाव और समरस्ता को बढ़ावा देने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। सोशल मीडिया को गाली-गलौज और आरोप-आपेक्ष का माध्यम बनाने वालों को सोचने की जरूर है कि डिजिटल इण्डिया मुहीम को स्वच्छ भारत अभियान के तहत लाकर इस बड़े माध्यम का सार्थक इस्तेमाल किया जा सके और समाज को बेहतर संदेश दिया जाये। 

लेखक एम. अफसर खां सागर स्वतंत्र पत्रकार / स्तम्भकार हैं. समसामयिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं. संपर्क: [email protected]

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...