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उत्तर प्रदेश की उल्टी चाल( पांच) : नोएडा भूमि घोटाले का खेल और अधिग्रहण का घालमेल

: ग्रेटर नोएडा व नोएडा में लगभग एक लाख करोड़ का हुआ घोटाला : ग्रेटर नोएडा और नोएडा में लगभग एक लाख करोड़ रुपए का भूमि घोटाला माया सरकार द्वारा किया गया है, जिसमें अकेले फार्महाउस घोटाला ही लगभग पांच हजार करोड़ रुपए का है। वैसे तो यह आरोप भाजपा ने मायावती सरकार के 100 घोटाले पर जारी अपनी पुस्तक में लगाया है। लेकिन ये वही फार्महाउस हैं, जिनमें से दस-दस हजार वर्गमीटर के दो फार्महाउस पूर्व कानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता व जनलोकपाल बिल के सबसे बड़े पैरवीकार शांतिभूषण और उनके अधिवक्ता पुत्र जयंत भूषण को माया सरकार ने बिना किसी नियम का पालन करते हुए आबंटित किया है।

: ग्रेटर नोएडा व नोएडा में लगभग एक लाख करोड़ का हुआ घोटाला : ग्रेटर नोएडा और नोएडा में लगभग एक लाख करोड़ रुपए का भूमि घोटाला माया सरकार द्वारा किया गया है, जिसमें अकेले फार्महाउस घोटाला ही लगभग पांच हजार करोड़ रुपए का है। वैसे तो यह आरोप भाजपा ने मायावती सरकार के 100 घोटाले पर जारी अपनी पुस्तक में लगाया है। लेकिन ये वही फार्महाउस हैं, जिनमें से दस-दस हजार वर्गमीटर के दो फार्महाउस पूर्व कानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता व जनलोकपाल बिल के सबसे बड़े पैरवीकार शांतिभूषण और उनके अधिवक्ता पुत्र जयंत भूषण को माया सरकार ने बिना किसी नियम का पालन करते हुए आबंटित किया है।
इस बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट में ग्रेटर नोएडा और नोएडा में किसानों की कृषि योग्य भूमि को औद्योगिक विकास के नाम पर अर्जेन्सी क्लॉज में अधिग्रहण करके रातोंरात उसका भू-उपयोग बदलकर बड़े-बड़े बिल्डरों को हाउसिंग केलिए सौंपे जाने का खेल उजागर हो गया है। हाईकोर्ट ने एक ओर जहां इन मामलों से संबंधित दर्जनों याचिकाओं को वृहदपीठ को सुनवाई के लिए संदर्भित कर दिया है, वहीं हाईकोर्ट ने कहा है कि हम देखते हैं कि राज्य सरकार ने क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण के लिए बार-बार आपात प्रावधान का इस्तेमाल किया। न्यायालय यह जानना चाहेगा कि ऐसा करने के पीछे क्या वजह रही।

न्यायालय ने आश्चर्य जताते हुए कहा, ‘क्यों राज्य सरकार को अधिग्रहीत भूमि पर काम शुरू करने में महीनों और कभी-कभी सालों लग जाते हैं, जबकि आपात स्थिति बताकर भूमि का अधिग्रहण करती है और भूमि मालिकों को आपत्ति उठाने का मौका तक नहीं दिया जाता।’  इसके अलावा, न्यायालय ने भूमि के इस्तेमाल के उद्देश्य में बदलाव पर भी राज्य सरकार से जवाब मांगा है। औद्योगिक विकास के उद्देश्य से किसानों की भूमि का अधिग्रहण करने केबाद भूमि की प्रकृति बदलकर उसे बिल्डरों को क्यों सौंप दिया जाता है। न्यायालय ने कहा, ‘राज्य सरकार को मामले की अगली सुनवाई के दौरान इन दो बिंदुओं पर संतोषजनक जवाब देना होगा।’  इसके अलावा वर्ष 2005 से अब तक नोएडा व नोएडा एक्सटेंशन में यूपी शासन द्वारा अर्जेन्सी क्लॉज लगाकर अधिग्रहित की गई हजारों एकड़ कृषि भूमि की सीबीआई जांच संबंधी याचिका पर भी आगामी 1 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अमिताव लाला व न्यायमूर्ति अशोक श्रीवास्तव की खंडपीठ सुनवाई करेगी।

गौतमबुद्ध नगर के इंद्रजीत सिंह की ओर से दाखिल याचिका में मांग की गई है कि सुनियोजित औद्योगिक विकास के नाम पर किसानों की कृषि भूमि को अर्जेन्सी क्लॉज लगाकर उत्तर प्रदेश शासन द्वारा अधिग्रहीत करके उसे रातोंरात आवासीय योजना में बदलने और बिल्डरों को देने केमामले में सीबीआई जांच का आदेश पारित किया जाए। याचिका में भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के अलावा प्रमुख सचिव गृह, डीजीपी, यमुना एक्सप्रेस वे प्राधिकरण, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण आदि को पक्षकार बनाया गया है।

केंद्र सरकार के प्रवर्तन निदेशालय ने भी इसकी जांच शुरू कर दी है। भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय के पत्रांक ईसीआईआर/54/डीजेड/2010/एडी (आरएस)-एसडीएस/403 से नोएडा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को यह सूचित किया गया कि निदेशालय न्यू ओखला इंडस्ट्रीयल अथॉरिटी के कुछ अधिकारियों के खिलाफ जांच कर रहा है। मामला प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट-2002 के तहत है। प्रवर्तन निदेशालय ने उन लोगों या फर्म की लिस्ट, जिनके पक्ष में व्यवसायिक प्लाट आबंटित किए गए हैं, साथ ही उनका नाम और उनका वर्तमान पता आबंटित प्लाट की पूरी जानकारी जिसमें खसरा खतौनी संख्या समेत पूरी विस्तृत जानकारी हो, आवंटित भूमि की वर्तमान स्थिति व भूखंड के विक्रय का मूल्य तथा उसी भूखंड का आबंटन केसमय के बाजार मूल्य की जानकारी अधिकारियों से मांगी है।

प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले में नोएडा के अधिकारियों से जल्दी जवाब देने का भी आग्रह किया है। इस पत्र पर सहायक निदेशक प्रवर्तन निदेशालय का हस्ताक्षर है। इस पर विशेष कार्याधिकारी (एलएम) समेत यूपी सरकार के कई अधिकारियों ने टिप्पणी की है और ‘कृपया नियमानुसार कार्यवाही कर अवगत करा दें’  जैसी टिप्पणी करके इस फाइल को टहलाया जा रहा है।

मालूम हो कि नोएडा में फार्म हाउसों के लिए वर्ष 2009-10 में अर्जेन्सी क्लॉज लगाकर किसानों की कृषि योग्य भूमि अधिग्रहित की गई और उन्हें 888 रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा दिया गया। जबकि इस जमीन का बाजारी मूल्य 15 से 20 हजार रुपए प्रति वर्गमीटर है। इस भूमि में दस-दस हजार वर्गमीटर के प्लाटों को मनमाने ढंग से अपने चहेतों को बांट दिया गया, जिसमें जमकर अवैध धन उगाही भी की गई। शांति भूषण के बेटे जयंत भूषण ने नोएडा पार्क वाले मुद्दे पर माया सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ा था। आरोप है कि मायावती सरकार ने उन्हें अनुग्रहीत करने के लिए बिना किसी निर्धारित मापदंड के दस-दस हजार वर्ग मीटर के दो प्लाट कौडिय़ों के मोल आबंटित कर दिए।

राज्य सरकार ने साल 2009 में गौतम बुद्ध नगर-नोएडा में योजनागत औद्योगिक विकास के नाम पर सैकड़ों एकड़ जमीन के अधिग्रहण का फैसला किया था। न्यू ओखला इंडस्ट्रीयल अथॉरिटी यानी नोएडा को यह काम सौंपा गया, जिसका ऑफिस सेक्टर-6 नोएडा में है। जनहित के नाम पर भूमि अधिग्रहण की कई अधिसूचनाएं मायावती सरकार ने जारी की। सेक्टर 162, 164, 165, 167 की करोड़ों स्क्वायर फुट किसानों की भूमि का तथाकथित तौर पर भू-उपयोग बदलकर उसे औद्योगिक भूमि में तब्दील कर दिया गया। इसके बाद इसी भूमि को रसूखदारों के फार्म हाउस के लिए आबंटित कर दिया गया। इसी तरह दोस्तपुर मंगरौली बांगर की जमीन का जबरन अधिग्रहण करके उसे योजनागत विकसित क्षेत्र की भूमि का सेक्टर 162, 164, 165, 167 बना दिया गया।

दोस्तपुर मंगरौली बांगर गांव की यह जमीन अब सेक्टर 162, 164, 165, 167 बन गई है। पूरी जमीन की छोटे टुकड़ों में प्लाटिंग करके करीब 10 हजार स्क्वायर फुट के फार्म हाउसों में बांट दिया गया। इन फार्म हाउसों का आबंटन भी अपारदर्शी तरीके से किया गया। यहां तक कि बेनामी आबंटन भी किए गए। गौरतलब है कि भूमि का वर्ष 2009 में अधिग्रहण किया गया और वर्ष 2010 में इसे तुरंत आबंटित कर दिया गया। औद्योगिक विकास के लिए आबंटित भूमि को फार्म हाउसों में तब्दील कर दिया गया।

आरोप है कि मायावती सरकार ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा में बड़ी-बड़ी बिल्डर कंपनियों को ग्रुप हाउसिंग की बेशकीमती जमीन कौडिय़ों के भाव देकर करीब एक लाख करोड़ रुपए का घोटाला किया है। नोएडा सिटी सेंटर के सेक्टर 25ए और 32 में 162 एकड़ जमीन एक कंपनी को 85 हजार वर्ग मीटर की दर से आबंटित की गई। साथ ही उसे कई मंजिला भवन बनाने की मंजूरी भी दी गई। व्यावसायिक भूखंड आबंटन में अगर नियमानुसार टेंडर की प्रक्रिया अपनाई जाती तो यह जमीन लगभग सात से आठ लाख रुपए प्रति वर्गमीटर की दर से आबंटित होती, लेकिन इस सौदे में एक लाख रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से कमीशन लिए जाने का आरोप है। इसी तरह नोएडा और ग्रेटर नोएडा की नोएडा विस्तार योजना में कई बड़ी कंपनियों को हजारों एकड़ जमीन आबंटित कर दी गई है। यमुना एक्सप्रेस वे पर भी टाउनशिप बनाने के लिए पांच हजार एकड़ भूमि आबंटित की जा रही है। वैशाली गाजियाबाद के रहने वाले कंपनी मालिक को सेक्टर-26 में प्लॉट दिलाने के नाम पर डीलरों ने करीब डेढ़ करोड़ की धांधली की। फर्जी रजिस्ट्री कागज और स्थानांतरण पत्र भी दिया गया। वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत के बाद किसी तरह यह मामला दर्ज हुआ।

नोएडा भूमि विकास प्राधिकरण के गठन का उद्देश्य ऐसे बिजनेस हब का निर्माण करना था, जहां एमएनसी और अन्य बिजनेस व ज्ञान के लिए एक ही जगह बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित उपलब्ध हों। नई इंडस्ट्री के विकास के लिए नोएडा को आधार बिंदु बनाना इसका उद्देश्य था। लेकिन थोड़े ही समय में यह देखा गया कि अनेक उद्योग समूह नोएडा से कारोबार समेट कर दूसरे शहरों में चले गए हैं। ये सभी योजनाएं आम जन, उद्योग समूह, कृषकों, बिल्डरों के खिलाफ हैं, फिर भी बदस्तूर जारी हैं, बोली लगाई जा रही है, स्वीकार की जा रही है।

लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और डेली न्यूज एक्टिविस्ट, इलाहाबाद के संपादक हैं.

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