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दुख-सुख

महाकवि देवेन्द्र कुमार बंगाली : सच से गुजरते हुए….

उन दिनों मैं गोरखपुर के एक साप्ताहिक अखबार का तथाकथित संपादक हुआ करता था। यह बात 1977 की है। अखबार का नाम था पर्यवेक्षक। इसके मालिक थे भारतीय जनता पार्टी के एक जाने-माने नेता के छोटे भाई। यह अखबार बख्शीपुर से निकलता था। अखबार मालिक को पता था कि मैं कम्युनिस्ट विचारों का हूं। मैं अखबार में वही छापता था, जो चाहता था। वह कभी एतराज नहीं करते थे। अखबार के दफ्तर में उस समय के सारे गोरखपुरिया वामपंथी विचरण करते थे। चाय-नाश्ता आफिस के खर्चे से होता था। खैर, प्रसंग कुछ और है।

उन दिनों मैं गोरखपुर के एक साप्ताहिक अखबार का तथाकथित संपादक हुआ करता था। यह बात 1977 की है। अखबार का नाम था पर्यवेक्षक। इसके मालिक थे भारतीय जनता पार्टी के एक जाने-माने नेता के छोटे भाई। यह अखबार बख्शीपुर से निकलता था। अखबार मालिक को पता था कि मैं कम्युनिस्ट विचारों का हूं। मैं अखबार में वही छापता था, जो चाहता था। वह कभी एतराज नहीं करते थे। अखबार के दफ्तर में उस समय के सारे गोरखपुरिया वामपंथी विचरण करते थे। चाय-नाश्ता आफिस के खर्चे से होता था। खैर, प्रसंग कुछ और है।

उन्हीं दिनों की बात है, गोरखपुर के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों से मेरा परिचय होना शुरू हुआ। पत्रकारों से भी। उनमें से कुछ नाम जो याद हैं, वे ये हैं— शशि प्रकाश, रामेश्वर पाण्डेय, जयप्रकाश शाही, मनीष मोहन, विजयप्रताप सिंह, उपेन्द्र मिश्र, महेश अश्क, आनन्द नारायण पाण्डेय, सुरेन्द्र काले, सुधांशु उपाध्याय, गोपाल रंजन और अन्य बहुत से लोग।  उन्हीं दिनों एक बार महेश अश्क ने मेरा परिचय देवेन्द्र कुमार बंगाली नाम के जीव से कराया। हम लोग किसी के घर में बैठे थे। बंगाली जी ने अपनी कई कविताएं सुनायीं। वह दिन आज भी मेरे लिए यादगार है। 1978 में मैंने गोरखपुर छोड़ दिया और लखनऊ चला गया। वहां मुझे स्वर्गीय राजेश शर्मा ने सूचना विभाग में नौकरी दिलवा दी। लखनऊ में वीरेन्द्र यादव, कौशल किशोर, शकील सिद्दीकी, राजेश शर्मा, बैंक वाले अर्जुन बाबू, के के चतुर्वेदी जैसे कई मित्रों के साथ उठने-बैठने के कारण मुझे पहले ही लिखने-पढ़ने की लत पड़ चुकी थी। खैर, प्रसंग यह भी नहीं है।

अगस्त 1979 में मैं सूचना विभाग की नौकरी छोड़कर फिर गोरखपुर पहुंच गया। दैनिक जागरण में नौकरी करने लगा। जागरण अखबार बेतियाहाता में नाले के पास से निकलता था। मैं भी बेतियाहाता में ही रहता था। उसी जमाने की बात है, एक रोज मैं महेश अश्क के साथ बंगाली जी के बेतियाहाता में ही स्थित आवास विकास कालोनी वाले घर गया। हम लोग कई घेटे तक साथ रहे। एक-दूसरे को सुनने सुनाने के क्रम से बोर होकर हम अपने-अपने ठिकाने को लौटे।

बंगाली जी छठे और सातवें दशक में नवगीत के अग्रणी कवियों में हुआ करते थे। उन दिनों धूमिल भी नवगीत ही लिखते थे। मैंने पुराने ज्ञानोदय के कई अंकों में इन दोनों महापुरुषों के नवगीत पढ़े हैं। बाद में आठवां दशक आते-आते बंगाली जी को लगा कि वह छंदबद्ध होकर अपनी भावनाओं और बातों को ठीक तरह से व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। और फिर, अतुकांत कविताएं रचने लगे।
हिन्दी के दिग्गज कवि धूमिल को दो कवि बहुत पसंद थे–  राजकमल चौधरी और देवेन्द्र कुमार बंगाली। ये दोनों धूमिल के एक तरह से आदर्श थे। यह मुझे धूमिल जी ने खुद लखनऊ मेडिकल कालेज में इलाज के दिनों बताया था। लेकिन एक बात सालती है। धूमिल को हिन्दी कविता वाले सब जानते-मानते हैं। बंगाली जी का कहीं जिक्र नहीं आता। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि बंगाली जी धूमिल से कहीं ज्यादा बड़े कवि थे। बंगाली जी की एक कविता देखिए–

कोठ का बाँस

कल तक का गुस्सा
जो रात एक जगह जम गया था
सुबह होते ही पिघल कर चारों तरफ फैलने लगा

देखते देखते आसमान लाल हो उठा
उसने मुड़कर देखा
वह अकेला नहीं था और न निहत्था
हवा के तेज झोंके से
शाख और पत्तियों में ठन गयी थी
पौधे अगल–बगल खड़े थे
कमर की सीध में बन्दूक की तरह तने हुए
झाड़ियाँ तरकस के तीर की तरह
गर्दन निकाल कर झाँक रही थीं मौके की ताक में

एक इशारे पर बाहर निकलने के लिए
किनारे की कोठ का बाँस झुक आया था
नीचे जमीन तक
गोया कह रहा हो कि देखो मुझमें
कितनी लाठियाँ निकल सकती हैं ?

मैं खत्म होने को नहीं
कटने के बाद अगली बरसात में फिर कोंपल फूटेगी
नये नये बाँस होंगे मुझसे भी ऊँचे
मजबूत और सलीके के
आने वाले सूरज का स्वागत करने के लिए

मेरी पैदाइश ही है जुर्म के विरोध में

लेखक Vinay Shrikar वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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