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जानिए, कोई स्त्री किसी पुरुष के पीछे क्यों नहीं भागती

तुमने खयाल किया, कोई स्त्री किसी पुरुष के पीछे नहीं भागती। और अगर भागे तो पुरुष फिर बिलकुल ही भाग खड़ा होगा। उस स्त्री से कोई भी पुरुष बचेगा, जो उसका पीछा करे। स्त्री कभी किसी पुरुष से प्रेम का निवेदन भी नहीं करती। पूरी मनुष्य—जाति के इतिहास में किसी स्त्री ने कभी किसी पुरुष से प्रेम—निवेदन नहीं किया। ऐसा नहीं कि स्त्री को प्रेम अनुभव नहीं होता; पुरुष से ज्यादा अनुभव होता है। पुरुष का अनुभव प्रेम का बहुत छोटा है, आंशिक है। स्त्री का अनुभव प्रेम का बहुत बड़ा है और बहुत समग्र है। मगर निवेदन नहीं करती, क्योंकि निवदेन में थोड़ा आक्रमण है।’मैं तुमसे प्रेम करता हूं —यह बात कहना भी आक्रमण है। यह एक तरह का आरोपण है। यह एक तरह की जबरदस्ती है। यह काम पुरुष ही कर सकता है। यह पुरुष को ही करना पड़ता है। यह पुरुष को ही करना पड़ता है।

तुमने खयाल किया, कोई स्त्री किसी पुरुष के पीछे नहीं भागती। और अगर भागे तो पुरुष फिर बिलकुल ही भाग खड़ा होगा। उस स्त्री से कोई भी पुरुष बचेगा, जो उसका पीछा करे। स्त्री कभी किसी पुरुष से प्रेम का निवेदन भी नहीं करती। पूरी मनुष्य—जाति के इतिहास में किसी स्त्री ने कभी किसी पुरुष से प्रेम—निवेदन नहीं किया। ऐसा नहीं कि स्त्री को प्रेम अनुभव नहीं होता; पुरुष से ज्यादा अनुभव होता है। पुरुष का अनुभव प्रेम का बहुत छोटा है, आंशिक है। स्त्री का अनुभव प्रेम का बहुत बड़ा है और बहुत समग्र है। मगर निवेदन नहीं करती, क्योंकि निवदेन में थोड़ा आक्रमण है।’मैं तुमसे प्रेम करता हूं —यह बात कहना भी आक्रमण है। यह एक तरह का आरोपण है। यह एक तरह की जबरदस्ती है। यह काम पुरुष ही कर सकता है। यह पुरुष को ही करना पड़ता है। यह पुरुष को ही करना पड़ता है।

इसलिए हर स्त्री अपने पति को कहती सुनी जाती है कि ‘कोई मैं तुम्हारे पीछे नहीं पड़ी थी, तुम ही मेरे पीछे पड़े थे। तुम्हीं लिखते थे प्रेम—पत्र।’ वह सम्हालकर रखती है प्रेम—पत्र, वक्त आने पर दिखा देती है कि ये देख लो, क्या—क्या तुमने लिखा था। और तुम ही मेरे बाप के चरण छूते थे आ—आकर। और तुमने ही चाहा था, कोई मैं तुम्हारे पीछे नहीं पड़ी थी।

ऐसे मुल्ला नसरुद्दीन से उसकी पत्नी एक सुबह—ही—सुबह कह रही थी। बस चाय की टेबल पर शुरू हो जाती है कथा। चाय क्या है—श्रीगणेशाय नम :! बस फिर कथा शुरू। वही से झगड़ा शुरू हो गया। और मुल्ला के मुंह से निकल गया कि तूने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। बस स्त्री तुनक गयी। उसने कहा कि मैं तुम्हारे पीछे नहीं पड़ी थी। मैं तुम्हारे घर नहीं आयी थी। मैंने तुम्हारे बाप की खुशामद नहीं की थी। तुम्हीं मेरे बाप के पास आए थे। तुम्हीं हाथ जोड़े फिरते थे। तुम्ही चिट्ठियां लिखते थे। तुम्हीं संदेश भेजते थे। तुम्ही रास्ते में खड़े होकर सीटियां बजाते थे। किसने गाये थे वे गीत मेरी खिड़की के पास?

मुल्ला ने कहा, ‘ठीक है। मैं भी स्वीकार करता हूं कि यह बात सच है। मगर यह उसी तरह सच है जैसे कि चूहे को पकडने के लिए चूहेदानी तो बैठी रहती है, कोई चूहों के पीछे नहीं दौड़ती। चूहे खुद ही मूरख उसमें फंस जाते हैं। मैं ही फंसा, यह सच है।’

मगर चूहेदानी बैठी रहती है, रस्ता देखती रहती है कि आओ ‘ इंतजाम सब कर देती है चूहादानी। रोटी के टुकडे पडे हैं, मक्खन पड़ा है, चीज पड़ा है, मिठाई रखी है। सब इंतजाम है। आओ। और तुमने देखा, चूहेदानी की एक खूबी होती है, उसमें भीतर आने का उपाय होता है, बाहर जाने का उपाय नहीं होता है। आ गए कि आ गए। आए तो आए ही क्यों? अब वह जो भीतर आ गया, इस खयाल में था कि बाहर जाने का रास्ता भी होगा। बाहर जाने का रास्ता ही नहीं होता।

मजाक एक तरफ, लेकिन पुरुष आक्रामक होता है, वह हमला करता है। प्रेम भी करे तो भी उस प्रेम में उसकी आक्रामकता होती है। यह पुरुष का स्वभाव है। इसमें कुछ कसूर नहीं है। स्त्री अनाक्रामक होती है और ग्रहणशील होती है, स्वागत करती है, अंगीकार करती है। लेकिन उसका बुलावा भी आवाज में नहीं दिया जाता है—चुपचाप, मौन में, इशारों में। सच तो यह है कि वह नहीं—नहीं ही कहे चली जाती है।

सारी दुनिया के प्रेमियों का अनुभव है कि स्त्री के ‘नहीं’ पर भरोसा मत करना। उसकी ‘नहीं’ में ‘हां’ छिपी होती है। जरा गौर से खोदना, कुरेदना। तुम उसकी ‘नहीं’ में ‘हां’ पाओगे।

मेरा स्वर्णिम भारत, प्रवचन-12, ओशो

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