लखनऊ। भूमि अधिग्रहण के सवाल पर केंद्र सरकार ने देश के किसानों को फिर दांव दे दिया है। केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर बीती २९ जुलाई को अपनी वेबसाइट पर राष्ट्रीय स्तर की रायशुमारी के लिए ‘ भूमि अधिग्रहण तथा पुनर्वास एवं पुनः स्थापना विधेयक २०११ मसौदा’ शीर्षक से यह मसौदा जारी किया है। इस मसौदे पर ३१ अगस्त तक लोगों से राय मांगी गई है। जाहिर है राय मिलने के बाद उस पर मंथन होगा। इस प्रक्रिया में डेढ़ महीने से ज्यादा समय लग सकता है और संसद का मौजूदा सत्र करीब पांच हफ्ते का है। यह तब जब राहुल गाँधी ने खुद किसानों से संसद के मानसून सत्र में नया भूमि अधिग्रहण बिल लाने का वादा किया था। हालांकि कांग्रेस का अभी भी दावा है कि संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल इस सत्र में ही आएगा।
सबसे रोचक बात यह है कि पोलियो से लेकर तरह-तरह के कार्यक्रमों पर करोड़ों का विज्ञापन देने वाली सरकार ने इस मसौदे को विज्ञापन के जरिए आम किसानों, राजनैतिक दलों और जन संगठनों तक पहुंचाने का प्रयास तक नहीं किया है। कई जगहों पर आज भी मुनादी पिटवा कर किसानों को सूचना दी जाती है। देश के कितने किसान लैपटाप लेकर चलते हैं जो इस मसौदे को इंटरनेट पर देख पाएंगे। किसान तो बाद में देखेंगे पहले राजनैतिक दलों की बात हो जाए। किसानों की राजनीति करने वाले लोकदल के प्रवक्ता अनिल दुबे ने कहा – हमने तो अभी सरकार का प्रस्तावित मसौदा देखा नहीं है इसलिए कुछ कह नहीं सकते। पर सात अगस्त को जेवर में बड़ी किसान पंचायत कर चौधरी अजित सिंह भूमि अधिग्रहण नीति के खिलाफ किसानों को लामबंद करने जा रहे हैं।
भाकपा के वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने कहा – हमने भी सुना है कि कोई मसौदा इंटरनेट पर आया है पर अभी हमारा कार्यालय इतना अत्याधुनिक नहीं हो पाया कि इसे देख पाए। पर सरकार की नीयत इस बिल को पास करने की नहीं लग रही है। जब चार हफ्ते तक लोग सुझाव देंगे तो पांच हफ्ते के इस सत्र में यह बिल पास कैसे होगा। साफ़ है कांग्रेस सरकार फिर झांसा देने जा रही है। बेहतर होता इस मसौदे को आम किसान और राजनैतिक दलों तक पहुँचाया जाता जो काम सरकार चाहती टीवी, अख़बारों में विज्ञापन देकर कर सकती है।
राष्ट्रीय किसान मंच के अध्यक्ष विनोद सिंह ने कहा – कांग्रेस सरकार ही किसानों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है और अंग्रेजों के कानून को किसी न किसी तरह घसीटना चाहती है, जिसके खिलाफ पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के नेतृत्व में बड़ा आंदोलन चलाया जा चुका है। पर कांग्रेस आज भी झांसा दे रही है। इसीलिए गांवों में रहने वाले किसानों को इंटरनेट से सूचना दी जा रही है। उत्तर प्रदेश में शहरों में तो बिजली है नहीं तो गांवों में कौन किसान इंटरनेट से यह मसौदा डाऊनलोड कर चौपाल में पढ़ेगा। राहुल गांधी को अभी गांवों के बारे में बहुत कुछ जानना बाकी है। पर किसानों ने भी तय कर लिया है कि इस मुद्दे पर अब आरपार की लड़ाई लड़ी जाएगी।
हालांकि कांग्रेस का दावा है कि इसी सत्र में भूमि अधिग्रहण कानून का नया मसौदा संसद में पेश कर दिया जाएगा। कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा – इसी सत्र में भूमि अधिग्रहण संशोधित बिल पेश किया जाएगा। विपक्ष के लोग तो बिल के मसौदे को देख भी नहीं रहे हैं क्योंकि उन्हें किसानों की चिंता ही नहीं है। पर जिस मसौदे पर ३१ अगस्त तक राय मांगी जा रही है वह कैसे दस दिन में संसद में पेश हो जाएगा यह किसी को समझ नहीं आ रहा।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा – कैसे यह नए मसौदे वाला बिल पेश हो जाएगा जिसे अभी देश के ज्यादातर राजनैतिक दलों के नेताओं ने देखा तक नहीं है और इसके प्रावधानों पर चर्चा तक नहीं हुई है। कांग्रेस की मंशा तो इसे लटकाने की नजर आ रही है। इसे लेकर राजनैतिक दल धरना-प्रदर्शन की भी तैयारी कर रहे है, जिन में भाजपा भी शामिल है। भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा – सरकार भूमि अधिग्रहण के पुराने कानून को किसी न किसी बहाने चलाए रखना चाहती है। किसानों के सवाल पर जब सरकार इंटरनेट पर सुझाव मांगे तो उसकी नीयत साफ़ हो जाती है। किसानों के सवाल पर अब तीन अगस्त को पार्टी दिल्ली में प्रदर्शन करने जा रही है।
इस बीच देश के कई अन्य संगठनों ने भी किसानो के सवाल पर दिल्ली में विरोध का एलान किया है। जिन में नर्मदा बचाओ आंदोलन-खंड़वा, लोक संघर्ष मंच-गुजरात व महाराष्ट्र, जनसंघर्ष समन्वय समिति, किसान संघर्ष समिति-उत्तरप्रदेश, पास्को प्रतिरोध समिति, समाजवादी जन परिषद आदि शामिल हैं। ये संगठन दिल्ली में जंतर-मंतर पर तीन से पांच अगस्त तक धरना देंगे। भूमि अधिग्रहण कानून को खारिज करने और उसके खिलाफ एक समग्र कानून बनाने की मांग को मुख्य रूप से रखते हुए यह धरना कुछ अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों को भी उठायेगा। जैसे बड़े बांध (नर्मदा घाटी, उत्तरपूर्वी भारत, हिमाचल प्रदेश और मध्य भारत), कोयला व परमाणु आधारित उर्जा परियोजना, शहरी विस्थापन, वनाधिकार व सामुदायिक स्वशासन, बड़ी कम्पनियों (पास्को, वेदांत, जेपी, अडानी, टाटा, कोकाकोला, मित्तल, रिलायंस, आरपीजी, जिंदल, एस कुमार आदि) के खिलाफ संघर्ष, ग्रामीण व शहरी समुदायों की आजीविका के अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए कानूनी सरकारी हक़दारी और सभी के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली, बीपीएल सदस्यों के लिए संपूर्ण अधिकार व इसके बदले में नकदी भुगतान के खिलाफ विरोध शामिल है। साभार : जनसत्ता
लेखक अंबरीश कुमार वरिष्ठ पत्रकार एवं यूपी में जनसत्ता के ब्यूरोचीफ हैं.


