हमने जिस धरती पर जन्म लिया है वो हमारी धरती मां है, जिसकी गोद में खेलते-कूदते हम कब बड़े हो जाते है, हमें इसका अंदाजा भी नहीं होता। अगर बात किसानों की हो तो धरती मां से बढ़कर उनके लिए और कुछ भी नहीं होता। वहीं जब बात देश के विकास की आती है तो वो मजबूर हो जाते हैं और उस धरती मां को विकास नाम पर बलि चढ़ा देते हैं। हमें देश के विकास से गुरेज नहीं है, पर सिस्टम से गुरेज जरूर है। अक्सर देखा गया है कि विकास के नाम पर ज्यादातर बढ़े शहरों में ही विकास होता है। फिर आस-पास बसे गांवों का अधिग्रहण किया जाता है। चाहे वो केन्द्र सरकार हो या प्रदेश सरकार इस बात पर ध्यान ही नहीं देती कि विकास चन्द महानगरों के अलावा गांवों में भी करना चाहिए।
विकास के नाम पर किसान की उपजाऊ जमीनों को फैक्ट्ररी, गोदाम, संस्थान, कम्पनियां और सड़कें बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है। जबकि देश के कई हिस्से ऐसे हैं जिन पर पैदावार अच्छी नहीं होती। अगर यह अधिग्रहण उन जमीनों पर किया गया हो तो कुछ हद तक बात समझ में भी आती है। लेकिन जब किसी किसान की उपजाऊ जमीन जो धन-धान्य से हरी-भरी रहती हो उस पर सरकार कब्जा कर विभिन्न प्रकार के निर्माण करती है और किसानों को पर्याप्त मुआवजा भी नही मिलता तो उनका रोष लाजमी हैं। एक किसान अपनी जमीन पर हल चलाकर अपने परिवार की रोजी रोटी चलाता है। वहीं जमीन अधिग्रहित हो जाने के बाद वो बेरोजगार हो जाता है। माना कि मुआवजे के नाम पर चंद सिक्के उनके हाथ में लग जाते है। पर उससे तो किसी का जीवन नहीं कटता। फिर वही गांव का किसान किसी बड़े शहर में जाकर मेहनत-मजदूरी के लिए भटकता है। वो अमीर लोग जो उन किसानों की जमीन पर बने रियासी मकानों, विशालकाय इमारतों और संस्थानों में कार्यरत है उन्हें उपेक्षा की नजर से देखते हैं।
देश की सबसे बड़ी बिडम्बना है कि यहां शहर दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे है और गांव दिन प्रतिदिन खाली होते जा रहे हैं। गांव के किसान फसलों की पैदावार न होने के कारण गांव छोड़कर शहरों में रोजगार तलाशते हैं। शहरों में जनसंख्या का बढ़ना और गांवों का खाली होना ही हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है।
किसानों के पलायन को रोकने के लिए सरकार ने ग्रामीण रोजगार योजना के तहल नरेगा का शुभारंभ किया था। लेकिन उसका उद्देश्य भी पूरा होता नजर नहीं आ रहा। फिर उसी योजना का नाम बदल कर मनरेगा कर दिया गया जिसमें ‘म’ शब्द महात्मा गांधी के नाम से पहचाना जाता है। नरेगा हो या मनरेगा, योजना के नाम पर केवल खानापूर्ति ही की जा रही है। वहीं जमीन अधिग्रहरण से रूष्ट भट्टा पारसौल के किसानों ने जब राज्य सरकार का विरोध किया तो कइयों को अपनी जान गंवानी पड़ी। लेकिन इस बलिदान का असर सरकार पर हुआ और भूमि अधिग्रहण कानून में कुछ फेरबदल किये गये।
सरकार ने नया भूमि अधिग्रहण बिल तैयार कर ड्राफ्ट में साफ कहा गया है कि भूमि अधिग्रहण का अधिकार निजी कंपनियों को नहीं होगा। ड्राफ्ट के मुताबिक निजी कंपनियां सीधे किसानों से जमीन नहीं खरीद पाएंगी। अधिग्रहण का अधिकार राज्य सरकार के पास होगा (लेकिन रक्षा और आपदा प्रबंधन को छोड़ कर)। इसके अलावा पुनर्वास और पुनर्स्थापना कानून को भी इसी बिल में जोड़ दिया गया है। जिसकी जमीन अधिग्रहण में जाएगी उसे सरकारी भाव का 6 गुना मुआवजे के तौर पर दिया जाएगा। सरकारी भाव जमीन की रजिस्टर्ड सेल प्राइस से तय किया जाएगा। भूमि मालिक को अगले 20 साल तक 2000 रुपए महीने के हिसाब से मुआवजा दिया जाएगा। पुनर्वास कॉलोनी में आधारभूत सुविधाएं पहले के मुकाबले कहीं अच्छी होंगी।
सरकार ने उपरोक्त शर्तों को मान लिया है। पर अब सवाल उठता है क्या इन शर्तों को मान लेने से भी किसानों की समस्याएं खत्म हो जाएंगी? किसानों को मिली मुआवजे की रकम उनके जीवन यापन करने के लिए पर्याप्त होगी? क्या इस कानून से किसानों का रोष कम हो जाएगा? शायद नहीं! ड्राफ्ट के मुताबिक अभी भी जीमन अधिग्रहण पर राज्य सरकार का ही सिक्का चलता दिख रहा है। सरकार के तय हुए रेटों पर जमीन का अधिग्रहण होगा। जमीन का मुआवजा तय सुदा जमीनी भाव से छह गुना होगा और सरकार उन्हें बीस साल तक दो हजार रुपये प्रति मास के हिसाब से मुआवजा देती रहेगी। पर इन नियमों से किसान का कोई भला नहीं होने वाला। वो बेरोजगार का बेरोजगार ही रह जाएगा। इससे बेहतर होता कि किसान परिवार में किसी एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी दे दी जाती तो उनके परिवार का गुजारा हो जाता। पर ऐसा नहीं होता न तो उनके हित में कोई बात सोची गई है और न कभी सोची जाएगी।
जमीन अधिग्रहण से जहां एक तरफ किसान रोष जता रहा है वहीं कुछ हिस्से ऐसे हैं जो अच्छी पैदावार न होने के कारण अपनी जमीनों को बेचना ज्यादा लाभकारी समझते हैं। सरकार को इस बात का ध्यान देना होगा कि जिस क्षेत्र की जमीन अधिक उपजाऊ है वहां अधिग्रहण कम से कम ही किया जाए। वहां केवल सड़क या जरूरी सरकारी संस्थान के लिए ही जमीनों का अधिग्रहण किया जाना चाहिए। वहीं दूसरी ओर जहां जमीनें बंजर है, फसल की पैदावार अच्छी नहीं होती ऐसी जमीन को अधिग्रण कर उन पर कंपनियां, फैक्ट्ररियां व इमारतें बनाई जाएं। अब सवाल आता है कि अगर बंजर जमीन किसी महानगर से अत्याधिक दूरी पर है तो वहां बनी हुई इमारतों में कौन आयेगा और कंपनियों को माल भी शहरों तक कैसे पहुंचेगा? तब सरकार को उन स्थानों तक पहुंचने के लिए यातायात की व्यवस्था को दुरूस्त करना होगा। सड़क मार्गों को चौड़ा करना होगा। इस प्रकार जो जमीन का अधिग्रहण होगा वह कम होगा और जरूरत के हिसाब से ही होगा। जब कृषि के लिए अनुपयोगी जमीन को सरकार अधिग्रहित करेगी तो किसानों को भी कोई समस्या नहीं होगी। तब सरकार और किसानों दोनों ही खुश रह सकेंगे।
लेखक जितेंद्र कुमार नामदेव गाजियाबाद में पत्रकार हैं.


