अन्ना के साथ सियासत करना और बाबा रामदेव समझने की भूल अब सरकार के ही गले की फांस बन गई है. अन्ना तिहाड़ जेल में हैं लेकिन केंद्र सरकार खुद को कैद में महसूस कर रही है. अन्ना से तिहाड़ से बाहर निकलने से इनकार कर दिया है. उन्होंने अपनी मांग रख दी है कि जब तक उन्हें अनशन के लिए बिना शर्त स्थान उपलब्ध नहीं कराया जाता है तब तक वह तिहाड़ के अंदर ही अपना अनशन जारी रखेंगे. अन्ना के समर्थन में देश भर में ही नहीं विदेशों में बसे भारतवंशी भी खड़े हो गए हैं.
चार अप्रैल को बाबा रामदेव के अनशन को लाठियों के बल पर समाप्त करवा कर सरकार अंदर ही अंदर अपनी ताकत पर आत्ममुग्ध थी. उसने रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्ण को सत्ता के दबाव में बैकफुट पर ला दिया था. उनकी कंपनियों के खिलाफ जांच करवाकर रामदेव को गलत साबित करने में जुट गई है. सरकार ने अनुमान लगाया था कि रामदेव की तरह अन्ना को भी सत्ता के बल पर बैकफुट पर ढकेल दिया जाएगा. सरकार से यहीं गलती हो गई.
पहले तो सरकार ने दिल्ली पुलिस के कंधे पर बंदूक रखकर धारा 144 लागू करवाया तथा उसके बाद उन्हें अनशन के लिए स्थान देने के नाम पर यहां वहां दौड़ाया गया. सरकार के दबाव में पुलिस ने जेपी पार्क में जगह से देने से पहले कई शर्तें भी रख दीं, जो कहीं से भी व्यवहारिक नहीं थी. सत्ता के नशे में चूर कपिल सिब्बल जैसे मंत्री भी चुनाव लड़ने और तमाम तरह की चुनौती अन्ना एवं उनकी टीम के सदस्यों को देने लगे. मनीष तिवारी ने अन्ना के खिलाफ सड़क छाप भाषा का भी इस्तेमाल किया. कांग्रेस ने अन्ना को रोकने के लिए हर वार अपनाया.
पर अन्ना सरकार के लिए बाबा रामदेव नहीं बल्कि अब छीला हुआ गन्ना बन गए हैं. अन्ना भले ही तिहाड़ जेल में हो परन्तु केंद्र सरकार अपने ही बुने जाल में कैद होकर रह गई है. जेल से ही अन्ना का आंदोलन जारी है और तिहाड़ के बाहर समेत देश के सभी भागों में उनके समर्थक शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. आम लोगों के भीतर भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोश देखकर अब केंद्र सरकार भी परेशान है. अब उसे बीच का रास्त भी नहीं सूझ रहा है. सरकार की तरफ से केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने कहा है कि अन्ना स्वतंत्र हैं कहीं भी जाने के लिए लेकिन अनशन स्थल का फैसला दिल्ली पुलिस करेगी.


