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किस मुंह से जनलोकपाल पर देरी की बात कर रही है दोगली कांग्रेस नीत सरकार?

14वीं लोकसभा में काग्रेस नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार बनने पर काग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष मनोनीत हुई,  जिसमें बतौर सदस्य अरुणा राय भी मनोनीत की गई। जबकि सोनिया गांधी पूर्व से ही राजीव गांधी फाउन्डेशन, इन्दिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट, जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल फंड, स्वराज भवन ट्रस्ट, कमला नेहरू मेमोरियल हास्पिटल सोसाइटी, जालियांवाला बाग नेशनल मेमोरियल ट्रस्ट, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एण्ड लाइब्रेरी आदि की अध्यक्ष रही,  जो निश्चित रूप से लाभ के पद की श्रेणी में आते हैं।

14वीं लोकसभा में काग्रेस नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार बनने पर काग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष मनोनीत हुई,  जिसमें बतौर सदस्य अरुणा राय भी मनोनीत की गई। जबकि सोनिया गांधी पूर्व से ही राजीव गांधी फाउन्डेशन, इन्दिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट, जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल फंड, स्वराज भवन ट्रस्ट, कमला नेहरू मेमोरियल हास्पिटल सोसाइटी, जालियांवाला बाग नेशनल मेमोरियल ट्रस्ट, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एण्ड लाइब्रेरी आदि की अध्यक्ष रही,  जो निश्चित रूप से लाभ के पद की श्रेणी में आते हैं।
संविधान तथा पार्लियामेंट (डिस्क्वालिफिकेशन) एक्ट 1959 के मुताबिक ऐसा कोई भी व्यक्ति सांसद नहीं हो सकता, उसकी संसद सदस्यता स्वतः समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन मामला सोनिया गांधी का था आखिर विरोध कौन करता? फिर भी 2006 में मामला कुछ अन्य संसद सदस्यों के लाभ के पद पर रहते हुए सांसद बने रहने के औचित्य पर सवाल उठा तो उसके लपेटे में सोनिया गांधी भी आ गईं। कानूनी सजा से बचने के लिए सोनिया गांधी ने संसद की सदस्यता 23 मार्च 2006 को छोड़ दिया तथा तत्काल आनन-फानन में सम्बन्धित कानून पार्लियामेंट (डिस्क्वालिफिकेशन ) एक्ट 1959 में आवश्यक संशोधन कर न केवल अपने लाभ के तमाम पदों को वैध बनवा लिया बल्कि संविधान की मूल मंशा को ही उलट-पुलट कर रख दिया। इस प्रकरण में गौर करने वाली बात यह रही कि सोनिया गांधी का स्वार्थी, देश और देश की जनता के प्रति उनका असली चेहरा सामने खुल कर आ गया। उन्हों ने उन तमाम ट्रस्टों को नहीं छोड़ा था,  क्योकि उन्हें अन्य किसी पर कतई भरोसा नहीं था। वे ट्रस्टों की सर्वेसर्वा बनी रही और अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली से तीन महीने के अंदर ही चुनाव करा कर दिनांक 16 मई 2006 को पुनः संसद में आ गई।

आश्चर्य की बात यह भी रहा कि उक्त संशोधन कानून तो बना 18 अगस्त 2006 को लेकिन उसे प्रभावी तब से बनाया गया जबसे वह कानून (1959) बना था। पार्लियामेंट (डिस्क्वालिफिकेशन) एक्ट 1959 की धारा 3 में न केवल राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का नाम जोड़ा गया बल्कि सोसाइटी एक्ट में पंजीकृत, गैर पंजीकृत 55 संगठनों का नाम शामिल कर दिया गया। साथ ही संगठनों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, ट्रस्ट के सदस्यों को भी शामिल कर दिया गया। जब उक्त अधिनियम में रातों-रात संशोधन यही मनमोहन सिंह की सरकार कर सकती हैं तो फिर जन लोकपाल बिल क्यों नहीं पास कराया जा सकता हैं। इसी के साथ यह भी बताना जरूरी हैं कि संसद सदस्यों के वेतन, भत्ते आदि के सम्बन्धी बिल संविधान लागू से लेकर अब तक सात बार पारित किया गया हैं बिना किसी देरी के ध्वनिमत से ही सभी बिल पास हुए हैं। 

सोनिया गांधी के स्वार्थी मनोवृत्ति की जहॉ तक बात हैं तो उन्होने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए देश की जनता का करोड़ों रुपया लोकसभा का उप चुनाव कराने में बर्बाद करा दिया। तो यह हैं सोनिया गांधी के त्याग की मूर्ति वाले चेहरे की असलियत। इसी सन्दर्भ में यहॉ यह उल्लेखित कर देना भी आवश्यक हैं कि 2004 में चुनाव जीतने के बाद उन्हों ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर स्वंय ही बैठने का पूरा मन बना लिया था,  लेकिन वह तो भला हो कि उस समय राष्ट्रपति की कुर्सी पर डा. कलाम थे, जिनकी निष्पक्षता और ईमानदारी पर संदेह करने का सवाल ही नहीं हो सकता। चूंकि डा. कलाम को देश-विदेश के कानूनों की बहुत जानकारी थी, सो उन्हों ने तत्काल सोनिया गांधी को बुला कर स्पष्ट शब्दों में स्वयं के लिए प्रधानमंत्री का प्रस्ताव लेकर आने से मना कर दिया था,  क्योंकि सोनिया गांधी जो इटली की मूल निवासिनी हैं,  उन्हों ने आज तक इटली की नागरिकता को छोड़ा नहीं तथा भारत की नागरिकता भी कन्डीशनल ली हैं।

इटली के कानून के मुताबिक उस देश का नागरिक किसी भी अन्य देश में कोई संवैधानिक पद नहीं ग्रहण कर सकता हैं, ऐसा करने पर उसकी इटली की नागरिकता समाप्त हो जायेगी तथा उस देश में उसकी सम्पत्ति जब्त हो जायेगी। जबकि सोनिया गांधी के नाम से इटली में भी काफी सम्पत्ति हैं। डा. कलाम द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए मना कर देने पर सोनिया गांधी ने अत्यधिक वफादार की तलाश की और इस प्रकार डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गये। पार्टी के नेता लोग सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री नहीं बनने को उनका त्याग बता कर उनकी पूजा करने लगे। क्यों कि व्यक्ति पूजा ही कांग्रेस की संस्कृति हैं,  जिसका एक नमूना आज कल भी देखने को मिला। देश की उथल-पुथल की चल रही राजनीति के बीच अचानक एक दिन टीवी चैनलों और अखबारों में समाचार आया कि सोनिया का अमेरिका में सर्जरी हुआ हैं तथा वे दो-तीन हफ्ते तक देश के बाहर रहेंगी इस दरम्यान पार्टी का काम राहुल गांधी सहित अन्य तीन निकट विश्वासी लोग संभालेंगे जबकि राहुल गांधी, प्रियका गांधी सभी उनके साथ अमेरिका गये हुए थे। कांग्रेस तथा सरकार के लोगों ने यह खुलासा नहीं किया कि उनकी किस चीज की सर्जरी हुई और अमेरिका के किस शहर-किस अस्पताल में?

लेखक महेंद्र अग्रवाल सोनभद्र जिले के अनपरा के निवासी हैं.

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