अन्ना हजारे को असंवैधानिक और गैरकानूनी रूप से उनके आवास से अनशन करने से पूर्व ही गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजने वाली मास्टरमाइण्ड मनमोहन सरकार अनतत्वोगत्वा एक दिन के आन्दोलन पर ही मजबूत पैरों से घुटने के बल आ गई और रामलीला मैदान पर रामदेव की गिरफ्तारी और उनके सहयोगियों को आतंकियों जैसे व्यवहार से टेरराइज करने वाली सरकार के जरूरत से ज्यादा काबिल, कपिल सिब्बल, पी.चिदम्बरम, दिग्विजय, अभिषेक सिंघवी जैसों की पीठ थपाथपाने लगी। उसे यह गलतफहमी हो गई कि जनता को अथवा जनता से जुड़े मुद्दों को उठाने वाले किसी भी व्यक्ति को सत्ता की शक्ति से आसानी से कुचला जा सकता है।
मनमोहन सरकार को बाबा रामदेव का आन्दोलन भी भारी पड़ता यदि बाबा रामदेव लेडीज सलवार-कमीज पहनकर भागे न होते! अनशन करने आये थे, तो अनशन के हिसाब से चलते। करना था अनशन और इजाजत मांगी योग शिविर लगाने की। जब योग शिविर लगाने की इजाजत ही दो दिन की मिली, एवं लिखकर पहले ही दे आये कि दो दिन में रामलीला मैदान खाली कर देंगे तो फिर उस पर अनशन का आसन क्यों लगा लिया? योग कराने के बहाने अनशन स्थल पर जम जाने और फिर नंगी पुलिसिया कार्रवाई से भयभीत होने की उनकी कार्यशैली ने ही उन्हें कमजोर करके नेपथ्य में छोड़ दिया। रामदेव की डरपोक कार्य शैली से ही केन्द्र सरकार के इरादे आक्रामक हो गये। अपनी इस उपलब्धि पर पगलाई सरकार को यह गुमान हो गया कि वह इस देश में जो चाहे, जैसा चाहे कर सकती है। वकालती दिमाग पर सरदारी दिमाग मात खा गया। वह भूल गया कि अंग्रेज बहादुर उससे बड़ा गुण्डा था, लेकिन सभी प्रकार के दमन में महारत हासिल रखने वाला भी महात्मा गॉंधी को गोली नहीं मार पाया। दुर्भाग्य देखिए इस देश का कि उन्हें अपने ही देश के काले हिन्दुस्तानी ने गोली मार दी। गोली मारी अथवा मरवा दी गई, अभी भी यह खोज का ही विषय है।
लगभग ऐसी ही मानसिकता के बहुत से लोग मीडिया में भी हैं जो एनआरएचएम के डा. सचान के साथ घटी घटना को अण्णा के साथ दोहराने की बात कर रहे थे। आठवॉं और दसवॉं पास अपने ही समाचार-पत्र के स्वयंभू ब्यूरो प्रमुख बनने के बाद, ऐसे तथाकथित पत्रकारों को यह भ्रम हो गया कि वे भी बुद्धिजीवी हैं। वे संविधान और संसद की व्याखा करने लगे और पागलों की तरह कहने लगे कि अण्णा संसद से उपर नहीं हैं। क्या अण्णा को किसी ने कहते सुना कि उन्होंने कहा हो कि वे संसद से ऊपर हैं? जब ऐसा कहा ही नहीं गया तो फर्जी नगाड़ा पीटने का क्या औचित्य? संसद में अपने प्रधानमंत्री ने भी रिजर्व बैंक के पूर्व अनुभव के आधार पर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की अपनी पुरानी शैली का प्रयोग करते हुए कहा कि संविधान और संसद से बड़ा कोई नहीं। अरे आज पूरा हिन्दुस्तान देख रहा है कि संसद से ऊपर उनके कपिल सिब्बल और संविधान से ऊपर स्वंय मनमोहन सिंह और उनकी सरकार ही है।
क्या समय आ गया है कि भ्रष्टाचार पर बहस वह कर रहा है, जिसका दाना-पानी भ्रष्टाचार के दम पर टिका है। जनता की आकस्मिक और आपातकालीन जरुरतों के लिए बनाये गये मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से लाखों करोड़ों पी जाने वाले व्यक्ति अण्णा के खिलाफ आग उगल रहे हैं। भूतपूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से करोड़ों रुपया पाये महोदय उनका साथ छोड़कर अब कांग्रेस के यहॉं हाजिरी लगा रहे हैं और दिखावा ऐसा कि गोया सारी केन्द्र सरकार उनकी मर्जी से चल रही है। बाकी फिर कभी.
अहंकार और नशे में धुत्त सरकार को अण्णा के आन्दोलन की जो रफ्तार दिखाई दी उससे उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। उसे एक नहीं लाखों अण्णा हजारे दिखाई देने लगे। ठीक रामदेव के विपरीत हुआ। तब पुलिसिया कार्रवाई से रामदेव हदस में आये थे, लेकिन अबकी बार पूरी की पूरी सरकार ही हदस में आ गई। जनता की ताकत सरकारों को तब दिखाई देती है, जब वह मुंह के बल गिरने के कगार पर होती है। भारत के प्रधानमंत्री पद पर बैठा जो सरदार लाल किले की प्राचीर से एवं संसद में अपने हेकड़ी भरे अन्दाज में यह कह रहा था कि कोई भी व्यक्ति संविधान और संसद से बड़ा नहीं है, उसी सरदार ने अण्णा की गिरफ्तारी से लेकर उनकी रिहाई तक के बीच की गई कार्रवाई से संवैधानिक व्यवस्था का ऐसा चीर हरण किया कि उसे इतिहास में दर्ज कर लिया गया है।
सुबह-सुबह गिरफ्तारी, फिर तिहाड़ जेल, तदउपरान्त रात्रि को रिहाई ने सिद्ध कर दिया कि संविधान के एक मात्र ज्ञाता कपिल सिब्बल, पी चिदम्बरम और सरदार जी ही हैं। इस देश में खुशवन्त सिंह के बाप शोभा सिंह जैसे लोगों की तादाद बहुत बढ़ गई है। भ्रष्टाचार की असली देन कांग्रेस पार्टी ही है। अंग्रेज ऐसे लोगों के हाथ भारत की सत्ता सौंप कर गए जो स्वंय भारतीय मानसिकता के नहीं थे। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान उसी मानसिकता की देन है। भारत के सिर पर जबरदस्ती बैठे प्रधानमंत्री सरदार जी का यह स्पष्टीकरण किसके गले उतरने वाला था कि अण्णा के खिलाफ दिल्ली पुलिस की कार्रवाई से केन्द्र सरकार का लेना-देना नहीं। अब कहॉं नेपथ्य में चली गई दिल्ली सरकार और जान बचाने सामने आ गई केन्द्र सरकार! अब तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का सांसद बेटा ही कह रहा है कि सरकार ने केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण ही देखा, इसे राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से नहीं देखा तथा अण्णा हजारे को गिरफ्तार करने की भूल की गई। अण्णा के पत्र का भारत का प्रधानमंत्री जवाब देता है कि अण्णा दिल्ली पुलिस के पास जायें। प्रधानमंत्री कार्यालय का इससे कोई लेना-देना नहीं। अब क्यों केन्द्रीय मंत्रियों को दिल्ली पुलिस का प्रवक्ता बनना पड़ रहा है?
यह वही सरकार है जो दिल्ली पुलिस को आगे करके पीछे से सारे नाटक का मंचन कर रही थी। यह वही मनमोहन की सरकार है जिसकी नाक के नीचे प्रदर्शनकारी रेलवे ट्रैक पर कब्जा जमाये बैठे थे, और वह चैन की बंसी बजा रही थी। जनता की परेशानियों को देखते हुए जब सुप्रीम कोर्ट ने अपना चाबुक चलाया तब जाकर सरकार हरकत में आई थी। तमाम और खास लोगों को अण्णा की गिरफ्तारी से आपातकाल का एहसास हुआ तो कोई गलत नहीं है। अण्णा हजारे से निपटने या निपटाने की रणनीति कांग्रेस को सरकार से जिन्दगी भर के लिए दूर करने वास्ते काफी है। बहुत से अपरिपक्व लोगों का कहना है कि यह कार्पोरेट घरानों का खेल है। लेकिन क्या कार्पोरेट घराना कांग्रेस के साथ नहीं है? अण्णा हजारे के साथ है!
लेखक सतीश प्रधान पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


