भ्रष्टाचार के दौर में लोगों की संवेदनाएं किस कदर दम तोड़ चुकी हैं, इसका उदाहरण मध्य प्रदेश के छतरपुर में देखने को मिला. जीते जी तो इस गरीब परिवार को किसी ने अन्न का एक दाना तक नहीं दिया, मरने के बाद भी चैन की मौत नसीब नहीं हो पाई. पर्याप्त लकड़ी उपलब्ध नहीं हो पाने के चलते विधवा पत्नी ने अपने पति का अंतिम संस्कार साइकिल के टायरों के सहारे किया.
छत्तरपुर की निवासिनी सीमा देवी (बदला नाम) के पति की मौत गरीबी और बीमारी के चलते हो गई. इस महिला के घर में खाने के लिए एक दाना नहीं था, ऐसे में कफन और लकड़ी का इंतजाम भला कहां से करती. उसने अपने आसपास के लोगों से सहयोग मांगा पर कोई सामने नहीं आया. जीते जी जब इन लोगों ने मदद नहीं की तो मरने के बाद कौन सामने आता. शासन-प्रशासन से भी उसने मदद की गुहार लगाई पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई. किसी की संवेदना तक नहीं जागी कि छोटी-छोटी मदद करके कम से कम उसके पति का अंतिम संस्कार करवाने में तो मदद कर दे.
चारो तरफ से थकहार कर सीमा देवी ने पति के अंतिम संस्कार के लिए अपने घर के टाठ को तोड़कर लकडि़यों का इंतजाम किया, परन्तु ये पर्याप्त नहीं हुआ. इसके बाद उसने यहां वहां पड़े साइकिल के टायर इकट्ठा किया तथा अपने पति की चिता को आग दी. हां इस दौरान उसके साथ के नाम पर आसपास के लोग खड़े जरूर हो गए थे. इस संवेदनहीनता की चर्चा पूरे शहर में जोर शोर से होती रही.
एक तरफ तो शासन की तरफ से गरीबों के लिए कई योजनाएं चलाई जाती हैं पर उन योजनाओं का कितना लाभ गरीबों और वास्तविक हकदारों को मिल पाता है ये किसी से छुपा नहीं हैं. सारी योजनाएं कागजों पर ही निगल ली जाती हैं, जो बचती हैं उसे दलाल खा जाते हैं. इसी भ्रष्टाचार को लेकर तरफ तो लाखों लोग अन्ना का साथ दे रहे है तो दूसरी तरफ लोगों की संवेदनाएं इस कदर मर चुकी हैं कि लोग अब अपने आसपास के लोगों की भी मदद नहीं कर रहे हैं.
छत्तरपुर से राजेश चौरसिया की रिपोर्ट.


