लोकपाल बिल पर चर्चा के दौरान संसद की स्थायी समिति यानी स्टैंडिंग कमेटी का बार बार उल्लेख हुआ. किसी ने कहा कि स्थायी समिति के पास कोई पावर नहीं होता . इसलिए बिल पर चर्चा लोक सभा में ही होनी चाहिए. अजीब बात है कि सरकार की तरफ से भी इस बात को बहुत ही साफ़ तरीके से लोगों को नहीं बताया गया कि स्थायी समिति के पास किसी भी बिल के बारे में चर्चा करने के असीमित पावर होते हैं. यहाँ तक कि अगर स्थायी समिति चाहे तो सरकार की तरफ से भेजे गए बिल के हर शब्द को बदल सकती है और बिलकुल नया बिल सदन के विचार के लिए पेश कर सकती है. वह बिल को सम्बंधित मंत्रालय के पास यह कह कर लौटा भी सकती है कि बिल में कोई दम नहीं है इसलिए उसे संसद के विचार के लिए नहीं पेश किया जा सकता.
सत्ताधारी पार्टी का एक बहुत ही प्रिय बिल सूचना के अधिकार के सम्बन्ध में था. नेशनल एडवाइज़री काउन्सिल वालों ने बहुत ही मेहनत करके बिल बनाया था. कांग्रेस उस बिल का श्रेय लेते नहीं अघाती लेकिन जो बात बहुत कम लोगों को मालूम है वह यह कि सरकार ने जिस बिल का मसौदा संसद की स्थायी समिति के पास भेजा था उसमें १५० संशोधन किये गए थे और जो बिल संसद में विचार के लिए स्थायी समिति ने भेजा वह मूल मौसदे से बहुत ही अलग और अच्छा था. इसी तरह के और भी बहुत सारे उदाहरण हैं. इसलिए अन्ना की टीम के सदस्यों ने कानून मंत्रालय की स्थायी समिति के बारे में जो पावर न होने की बात कही थी उस बात में कोई दम नहीं है. दुर्भाग्य की बात है कि सरकार और कांग्रेस पार्टी की तरफ से भी सही बात जोर देकर नहीं कही गयी और जनता को इस बारे में कई भ्रांतियों के शिकार होने के लिए मजबूर होना पड़ा.
संसद की स्थायी समितियों का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. १९८० के दशक में यह अनुभव किया गया कि संसद के प्रति सरकार की जवाबदेही के बुनियादी सिद्धांत को मुकम्मल तरीके से नहीं लागू किया जा रहा था. संसद के प्रति सरकार की ज्यादा जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से संसद में कमेटी सिस्टम की व्यवस्था लागू की गयी. १९८९ में पहली बार तीन कमेटियां बनायी गयीं. मकसद यह था कि किसी भी बिल के संसद में पेश होने से पहले उसकी विधिवत विवेचना की जाये और जब सभी पार्टियों की सदस्यता वाली समिति उसे मंजूरी दे तब संसद के सामने मामले को विचार के लिए प्रस्तुत किया जाए. १९८९ में केवल तीन कमेटियां बनायी गयी थी, एक कृषि के लिए, दूसरी विज्ञान और टेक्नालोजी के लिए और तीसरी पर्यावरण और वन विभाग के लिए थी. इन कमेटियों की सफलता के बाद ही भारतीय संसद में कमेटी सिस्टम को विधायी कार्य के लिए एक प्रभावी संस्था के रूप में स्वीकार किया गया. १९९३ में १७ मंत्रालयों और विभागों की स्थायी समितियां बनायी गयीं. इन में ६ कमेटियां राज्यसभा के अध्यक्ष की निगरानी में थीं जबकि ११ कमेटियां लोकसभा के अध्यक्ष की निगरानी में काम कर रही थीं. २००४ में कमेटियों की संख्या बढ़ाकर २४ कर दी गयी.
इन कमेटियों का मुख्य काम सरकार के कामकाज की गंभीर विवेचना करना और संसद के प्रति सम्बंधित मंत्रालय को पूरी तरह से जवाबदेह बनाना है. सम्बंधित मंत्रालय या विभाग की बजट मांगों पर पहले स्थायी समिति में चर्चा होती है और वहां पर जानकारों की राय तक ली जा सकती है. उस विभाग से सम्बंधित बिल भी सबसे पहले उस मंत्रालय की स्थायी समिति के पास जाता है. लोकपाल बिल कानून मंत्रालय की स्थायी समिति के पास भेजा गया है. इस कमेटियों में जब चर्चा के लिए को बिल लाया जाता है तो उसकी बाकायदा जांच करके उसे संसद में प्रस्तुत किया जाता है. कमेटी का लाभ यह है कि सदन में पेश होने के पहले बिल का नीर क्षीर विवेक हो चुका होता है और हर पार्टी उसमें अपना राजनीतिक योगदान कर चुकी होती है. ऐसा नहीं हो सकता कि सरकार वहां मनमानी कर ले क्योंकि कमेटी का गठन ही सरकार को ज्यादा ज़िम्मेदार ठहराने के लिए किया जाता है. सभी पार्टियों के सदस्य इन कमेटियों के सदस्य होते हैं इसलिए सरकार के कामकाज की इनकी बैठकों में बाकायदा जांच की जाती है. आम तौर पर यहाँ पर फैसले आम सहमति से होते हैं लेकिन अगर कोई सदस्य चाहे तो नोट आफ डिसेंट लगा सकता है.
इन कमेटियों के गठन के भी संसद ने नियम बना रखे हैं. हर स्थायी समित के पास कई बार एक से ज्यादा मंत्रालय भी हो सकते हैं. हर स्थायी समिति में ३१ सदस्य होते हैं. २१ लोक सभा के सदस्य होते हैं जबकि १० राज्यसभा के. कोई भी मंत्री इन समितियों का सदस्य नहीं बन सकता क्योंकि सरकार के कामकाज की जांच के लिए ही तो कमेटी का गठन होता है. कमेटी की सदस्यता केवल एक साल के लिए होती है. अपने नियंत्रण वाली कमेटियों के अध्यक्षों की नियुक्ति राज्य सभा और लोक सभा के अध्यक्ष खुद करते हैं. जन लोक पाल बिल जिस कमेटी के हवाले किया गया है उसके अध्यक्ष कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी हैं. अलग अलग कमेटियों की अध्यक्षत अलग अलग पार्टी के सदस्यों के पास होती है. इसलिए संसद की स्थायी समिति को कम पावर वाली कहना बिलकुल भ्रामक है.
लेखक शेष नारायण सिंह जाने-माने पत्रकार हैं. लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स के नेशनल ब्यूरो चीफ हैं.


