Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

ये दुनिया

पहली पुण्‍यतिथि पर याद किए गए गिर्दा, पर चुभन छोड़ गया आयोजन

उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति आंदोलन सहित चिपको, नशा नहीं रोजगार दो आदि आंदोलनों को अपने जनगीतों से मुखर स्वर प्रदान करने वाले गायक और कलाकार गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’  को उनकी प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर दिल्ली सहित उत्तराखंड के अनेक नगरों में स्मरण किया गया। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर दिल्ली स्थित गढ़वाल भवन के सभागार में भी एक कार्यक्रम आयोजित किया गया।

उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति आंदोलन सहित चिपको, नशा नहीं रोजगार दो आदि आंदोलनों को अपने जनगीतों से मुखर स्वर प्रदान करने वाले गायक और कलाकार गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’  को उनकी प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर दिल्ली सहित उत्तराखंड के अनेक नगरों में स्मरण किया गया। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर दिल्ली स्थित गढ़वाल भवन के सभागार में भी एक कार्यक्रम आयोजित किया गया।
गिरीश तिवारी गिर्दा उत्तराखंड के प्रत्येक जनपक्षधर आंदोलन में न सिर्फ एक आंदोलनकारी के तौर पर शामिल होते थे। अपितु आंदोलन की भावना को गीतों में रचकर उसे मुखरता प्रदान करते थे। गीतों के माध्यम से जनता में जागृति और साहस जगाने वाले लोक कलाकार गिर्दा जिस तरह खामोशी के साथ लखनउ में इस जहां से रूखसत हुए उसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। अल्मोड़ा में जन्मे गिर्दा ने नैनीताल को अपनी कर्मभूमि बनाया। उन्होंने अपने जीवन के आरंभिक संर्घषमय दिनों में लखनउ में साइकिल, रिक्शा तक चलाने का कार्य किया। उत्तराखंड के प्रत्येक जनपक्षधर आंदोलन में गिर्दा अपने सरल सौम्य व्यक्तित्व के साथ, कन्धे में उत्तराखंड का पारंपरिक वाद्य हुड़का लेकर जब जन गित गाते थे आगे आगे चलते थे, तो आंदोलनकारियों का हुजूम उनके पीछे चल पड़ता था। राजनैतिक उठापटक कूटनीतिक चालबाजियों से दूर रहने वाले इस कलाकार को दिल्ली में जब उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर स्मरण किया गया तो, आयोजकों में कुछ नाम चौंकाने वाले थे।

सर्वविदित ही है कि गिर्दा आजीवन उत्तराखंड की संस्कृति और अस्मिता के लिए संर्घष करते रहे। जल-जंगल-जमीन के सवालों पर अपनी कला के माध्यम से मुखर रहे। हक हुकूकों की लड़ाई अपने गीतों के माध्यम से लड़ते रहे। गिर्दा अपने गीतों से ही आंदोलन कारियों को प्रेरित करते रहे। दरअसल उनकी पुण्यतिथि का आयोजन पहाड़ को ही बेचेने वाले बिल्डर द्वारा संचालित प्रकाशन घराने द्वारा किया जाना बड़ा अटपटा सा लगा। वह प्रकाशन घराना जो अपनी मैगजीन के मुखपृष्ठों पर माफिया सरगनाओं को जगह देना उचित समझता हो, वह गिरदा जैसे विराट जनपक्षधर व्यक्तित्व की पुण्यतिथि को आयोजित करे यह उत्तराखंड की अस्मिता पर ही एक प्रश्‍न चिन्‍ह खड़ा करता है। उनकी पुण्यतिथि में सत्ता प्रतिष्‍ठान से जुड़े लोगों का शामिल होना और उस दल के प्रतिनिधियों का मंचासीन होना,  जिस राजनैतिक दल ने उत्तराखंड आंदोलन को अलगाव वादियों का आंदोलन कहा था और गिर्दा की आत्मा को भी नागवार गुजरा होगा।

अभी गिर्दा को हमारे बीच से गये वर्ष भर भी नहीं हुआ है और पुण्यतिथि के बहाने भू माफिया टाइप के प्रकाशक घराने मंच सजाने लगे हैं। गिर्दा वामपंथी विचारों के समर्थक थे। उनकी पुण्यतिथि पर धुर दक्षिणपंथी राजनीतिक दल के लोगों का मंचासीन होना कहीं से भी औचित्यपूर्ण नही ठहराया जा सकता। आयोजकों में ऐसे प्रकाशन घराने का शामिल होना,  जिस पर अपने ही कर्मियों की आजीविका को बिना कारण छीनने का आरोप लग रहा हो शायद किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता।

गणेशचंद्र पांडेय की रिपोर्ट.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...