आज अंग्रेजी के एक प्रतिष्ठित अखबार में खबर है कि कांग्रेस अब कुलदीप बिश्नोई की वापसी चाहती है. और वो इस लिए कि भजन लाल के समय से गैर जाटों में उनके आधार को देखते हुए कांग्रेस उस वर्ग मैं अपनी पैठ पाना चाहती है. कभी खुद भी इस कंपनी में अपने काम के अनुभव से मैं मान के चलता हूँ कि ये खबर है तो इसमें कुछ दम ज़रूर होगा. पिछले विधानसभा चुनावों के नतीजे (नब्बे में से कुल चालीस सीटें) अगर इसके प्रमाण हैं तो भजन लाल के साथ बिगाड़ के बाद से कुलदीप ने कुछ पाया हो, न पाया हो. मगर कांग्रेस ने खोया बहुत है. उसने विधानसभा में अपने बूते बहुमत खोया है.
निर्दलीयों को अपना ईमान बेचा है. मंत्री वाली कार लौटा देने वालों के चरण पकड़े हैं. जनहित कांग्रेस के विधायकों के दलबदल वाले मामले में हाई कोर्ट की लताड़ झेली है. और अगर लोकसभा चुनाव तक कहीं वे विधायकी से जाते रहे तो न सिर्फ राहुल गाँधी को प्रधानमन्त्री बना सकने वाले अगले लोकसभा चुनाव में किरकिरी होगी, हरियाणा की सत्ता और शायद उसमें बची खुची अस्मिता भी साथ जाएगी. तो ये मान के चलें कि कुलदीप को पार्टी में लाकर कांग्रेस दलबदल केस से भी छुटकारा पा लेने की फिराक में होगी. कम से कम उनके सियासी बैरी हुड्डा को समझाने के लिए उसका ये एक तर्क तो हो ही सकता है. ऐसा होता है तो ज़ाहिर है दलबदल वाला केस जाएगा.निर्दलीयों की धौंस भी. सरकार की गर्दन पे लटकी तलवार भी.
लेकिन इस अखबार और इस खबर के प्रति पूरे सम्मान के साथ मुझे ये सब हो पाने में शक है. इसलिए कि इस मामले में ‘मेरा कातिल ही मेरा दुश्मन है, वो मेरे हक़ में क्या फैसला देगा’ वाली स्थिति है. कांग्रेस ने भजन लाल, उनकी राजनीति, उनके वोट बैंक या उनके परिवार को भाव देना ही होता तो सन 2000 में तीन चौथाई बहुमत ला के देने वाले भजन लाल को दरकिनार करती ही क्यों? कुलदीप गैर जाटों के भजन लाल जितने बड़े लीडर तो नहीं हैं कि कांग्रेस को उनकी उनके पिता से ज्यादा ज़रूरत महसूस होने लगी!
कांग्रेस ने भजन लाल के साथ वो किया क्योंकि वो ऐसा ही करती आई है. भजन लाल तो फिर छोटे नेता थे.कांग्रेस ने जो उन के साथ किया वो उन से बहुत पहले स्वर्ण सिंह, वाई.बी.चव्हाण,जगजीवन राम और वी.पी. सिंह जैसों के साथ कर चुकी. इस बात की क्या गारंटी है कि कांग्रेस में आ ही गए कुलदीप तो कल को वो सब उनके साथ भी नहीं करेगी. क्या गारंटी है कि उस से भी पहले हरियाणा कांग्रेस में उनकी हालत संपत सिंह जैसी हो कर नहीं रह जाएगी?
कांग्रेस में लोगों को नेता बनाने और उनकी नेतागिरी मिटाने वालों की कमी नहीं है. वे समझ रहे हैं कि पथिक कभी दोराहे तो कभी चौराहे पे होता है. कांग्रेस सोचती है कि कुलदीप आज दसराहे पे हैं. भजन लाल जी आज हैं नहीं, न उनका करिश्मा, न उनके लिहाज़ से साथ जुड़ जाने वाले लोग.उनके रहते बमुश्किल सात हज़ार के बहुमत से आई हिसार सीट निकालना कुलदीप के लिए बहुत आसान नहीं होगा. और इस बार ये गई तो फिर सब गया. पूरा भविष्य. अजय चौटाला को लाकर इनेलो भी उसी ताक में है. वो सोचती है कि इस एक उपचुनाव में कुलदीप को पछाड़ा तो फिर हरियाणा में कांग्रेस के साथ उसकी लड़ाई सीधी है. भाजपा वही होने से बचाने को कुलदीप के साथ आने को तैयार है. तो… हालात बड़े दिलचस्प हो चले हैं. कांग्रेस कुलदीप को ये समझाना चाह रही होगी कि भैया तुम आराम से एसी कोच में बैठो, तुम्हारे समेत गाड़ी तो कांग्रेस के ड्राइवर अपने आप चलाते रहेंगे.
अपना ये मानना है कि कुलदीप ने भयंकर भूलें की हैं. उन राजनीति या पार्टी किसी बड़े मुद्दे या आन्दोलन की उपज नहीं है. इसी लिए उनके प्रति वैसा कोई जूनून या उस से अभिभूत उनकी कोई बहुत बड़ी फैन फौलोविंग नहीं है. इसी लिए न कोई बहुत कमिटेड संगठन. यही वो वजह है कि काडर की तलाश में वे कभी मायावती तो कभी भाजपा के तलुवे सहलाते रहे हैं. मायावती कीचौखट पे पिता का माथा रगड़वाने वे तब भी चले गए थे कि जब पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा उन्हें हरियाणा में अपना मुख्यमंत्री-उम्मीदवार प्रोजेक्ट करने को तैयार थी. वे राजनीति मेंऔर उन्हें इतना नहीं पता कि मायावती ने (सिवाय आधी बार के भाजपा के साथ यूपी में) कभी कहीं किसी भी राज्य में किसी पार्टी के साथ कोई समझौता किया नहीं है. ज़रा सोच के देखिये कि अगर पिछला विधानसभा चुनाव वे ऐन मौके पर छोड़ के चली जाने वाली बीएसपी की बजाय भाजपा के साथ लड़े होते तो क्या होता. दोनों की दो दो सीटें भी बढ़ गई होतीं तो कांग्रेस का तो सूपड़ा साफ़ हो ही गया होता. वे तब की सरकार या उसके बाहर जहां भी होते आज से बहुत बेहतर हालत में होते.
राजनीति में गलती की गुंजायश बहुत कम होती है. कुलदीप के पास तो अब वो और भी कम है. उन्हें अब अंतिम तौर पर तय करना पड़ेगा कि उन्हें करना क्या है. अपनी समझ से मुकाबला तो हिसार में वो भाजपा के साथ चले तो जनहित-भाजपा गठबंधन और इनेलो के बीच है. मिर्चपुर, भ्रष्टाचार और इधर
लोकल एंटी-इन्कम्बैंसी को छोड़ भी दें तो वैसे भी कांग्रेस के पास कोई बहुत मज़बूत उम्मीदवार है नहीं. है भी तो उसकी टांगें खुद कांग्रेसी खीचेंगे. पहले जिंदल और अब भजनलाल से वंचित हुए हिसार पे अपना खूंटा हर कोई गाड़ना चाहेगा. अपन को ये भी लगता है कि अगर जीते कुलदीप तो भाजपा के साथ दूर तक जाएंगे. और अगर हारे तो कांग्रेस को उनकी ज़रूरत आज जितनी तो फिर भी रहेगी. राहुल को प्रधानमन्त्री बनाने के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जाएगी.
लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों वेब मीडिया की दुनिया में सक्रिय हैं.


