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निशंक उत्तराखंड के सबसे खराब सीएम साबित हुए

: कभी खंडूड़ी के खास हुआ करते थे निशंक : उत्तराखंड में भ्रष्टाचार से मुक्ति की खंडूड़ी से है आस : ऐसा प्रतीत होता है कि यह लालू प्रसाद का असर है। मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद का कामकाज बहुत असरदार नहीं रहा था लेकिन केंद्र में रेल मंत्री के रूप में उनका प्रदर्शन शानदार रहा। वहां उन पर अपने सहयोगियों को साथ रखने का कोई दबाव नहीं था और उन्हें सही ढंग के नौकरशाहों का समर्थन प्राप्त था जिनकी सलाह पर वह अमल किया करते थे। भुवन चंद्र खंडूड़ी ने अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भूतल परिवहन मंत्री के रूप में बहुत बढिय़ा काम किया था। उन्होंने सड़क निर्माण की दिशा में इतना काम किया था कि स्वर्णिम चतुर्भुज योजना वाजपेयी सरकार की सर्वाधिक उल्लेखनीय उपलब्धियों में शुमार हो गई।

: कभी खंडूड़ी के खास हुआ करते थे निशंक : उत्तराखंड में भ्रष्टाचार से मुक्ति की खंडूड़ी से है आस : ऐसा प्रतीत होता है कि यह लालू प्रसाद का असर है। मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद का कामकाज बहुत असरदार नहीं रहा था लेकिन केंद्र में रेल मंत्री के रूप में उनका प्रदर्शन शानदार रहा। वहां उन पर अपने सहयोगियों को साथ रखने का कोई दबाव नहीं था और उन्हें सही ढंग के नौकरशाहों का समर्थन प्राप्त था जिनकी सलाह पर वह अमल किया करते थे। भुवन चंद्र खंडूड़ी ने अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भूतल परिवहन मंत्री के रूप में बहुत बढिय़ा काम किया था। उन्होंने सड़क निर्माण की दिशा में इतना काम किया था कि स्वर्णिम चतुर्भुज योजना वाजपेयी सरकार की सर्वाधिक उल्लेखनीय उपलब्धियों में शुमार हो गई।

यही वजह थी कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उन्हें उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद का सबसे काबिल दावेदार माना। वर्ष 2007 में उन्हें प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। वहां पहुंचकर उन्होंने परिवर्तन का आह्वान किया। सत्तासीन होने के कुछ ही दिन बाद खंडूड़ी ने कहा, ‘मैं नौकरशाहों को दो सप्ताह का समय दे रहा हूं। अगर उन्होंने दो सप्ताह में अपने कामकाज में सुधार नहीं किया तो उन्हें निकाल बाहर किया जाएगा।’ उन्होंने राज्य के विकास के लिए अपनी प्राथमिकताओं की सूची भी तैयार कर ली- ‘उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं और अगर उसकी आय का सही तरह इस्तेेमाल किया जाए तो एक वर्ष की आय पांच वर्ष तक चल सकती है। मेरी शुरुआती प्राथमिकता में सिंचाई, स्वास्थ्य और शिक्षा हैं। उत्तराखंड में जल विद्युत के क्षेत्र में भी व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। हम देश को 40,000 से 50,000 मेगावॉट तक बिजली दे सकते हैं। हर मेगावॉट से 1 करोड़ रुपये की कमाई हो सकती है। इसके अलावा पर्यटन विकास के क्षेत्र में भी असीमित संभावनाएं हैं। हमें पर्यटकों का स्वागत करना होगा, उन्हें दूर नहीं जाने देना होगा। उसके बाद कृषि, बागवानी और फूलों की खेती तथा कुटीर उद्योगों की बारी आती है।

बहरहाल, यह तो हुई तब की बात। कुछ ही सप्ताह के भीतर खंडूड़ी ने खुद को समस्याओं में घिरा पाया। इनमें से कुछ समस्याएं दूसरों ने खड़ी की थीं जबकि अधिकांश के लिए वह खुद ही जिम्मेदार थे। देश के अन्य हिस्सों की तरह उत्तराखंड की राजनीति में भी क्षेत्रीयता और जाति आधारित बंटवारे की अहम भूमिका है। राज्य के दो प्रमुख हिस्से हैं गढ़वाल और कुमाऊं। दोनों के बीच  प्रतिद्वंद्विता मानी जाती है। सत्ता पर या तो ब्राह्मण काबिज होते हैं या फिर ठाकुर, यह बंटवारा भी बहुत गहरा है। खंडूड़ी अनचाहे ही इन दोनों के बीच की राजनीति के शिकार हो गए। पूर्व सैन्यकर्मी भी मतदाताओं में शामिल हैं इसलिए उन्होंने स्वाभाविक तौर पर उन्हें बढ़ावा देने की कोशिश की। पूर्व सरकारी अधिकारियों को भी खुश रखने की कोशिश की गई क्योंकि राज्य में दो लाख  कर्मचारी हैं जो जाहिर तौर पर मतदाता भी हैं। उनकी एक बड़ी उपलब्धि थी 304 मेगावॉट क्षमता वाली मनेरी भाली फेज-3 जलविद्युत परियोजना।

76 मेगावॉट उत्पादन वाले इसके पहले चरण का उद्घाटन तो उनके मुख्यमंत्री बनने के 10 महीनों के भीतर ही हो गया था। हालांकि इस परियोजना की शुरुआत पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने की थी लेकिन परियोजना की मसौदा रिपोर्ट इतनी खराब थी कि इसकी शुरुआत में देर हो गई। खंडूड़ी की हिल डेवलपमेंट इंडस्ट्रियल पॉलिसी को बेहतरीन संभव तरीके से तैयार किया गया था लेकिन यह किसी भी उद्यम को आकर्षित करने में नाकाम रही। प्रशासनिक मोर्चे पर तेजी से कदम बढ़ाने का इरादा जताने के बावजूद खंडूड़ी ने खुद को गढ़वाली ब्राह्मïणों से घिरा पाया। स्थानीय मीडिया में आई रिपोर्टों के मुताबिक सभी नौकरशाह तो नहीं लेकिन उनमें से एक उनके प्रति अत्यंत श्रद्घा भाव रखता था और रिपोर्ट के मुताबिक वह उन्हें ‘डैडी कहकर पुकारता था।

खंडूड़ी को वर्ष 2007 में पहली बार भाजपा में सार्वजनिक तौर पर विरोध का सामना करना पड़ा। दो ठाकुर नेताओं राजनाथ सिंह और भगत सिंह कोश्यारी ने वर्ष 2007 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ चुनाव अभियान का नेतृत्व किया। भाजपा को 70 सदस्यीय विधानसभा में 34 सीटें मिलीं। उसे उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) के चार विधायकों का समर्थन हासिल था। लेकिन मुख्यमंत्री खंडूड़ी को बना दिया गया, कोश्यारी ने उप मुख्यमंत्री का पद ठुकरा दिया। बाद में उन्हें राज्य सभा सदस्य बना दिया गया ताकि वह राज्य से बाहर रहें।

उस समय कोश्यारी और खंडूड़ी के समर्थकों के बीच जमकर संघर्ष हुआ था इसमें फर्नीचर तथा अन्य वस्तुओं की टूटफूट तो हुई ही थी, साथ ही पार्टी पर्यवेक्षकों वेंकैया नायडू और रविशंकर प्रसाद के साथ दुव्र्यवहार भी हुआ। बहरहाल, खंडूड़ी इस दृश्य को भूले नहीं। उत्तराखंड के लोगों ने ध्यान दिया कि चुनाव के बाद जब औपचारिक तौर पर सभी नेता एक दूसरे का हाथ थाम कर जीत का जश्न मनाते हैं तब खंडूड़ी ने कोश्यारी का हाथ थामने से साफ इनकार कर दिया था।

आगे चलकर माहौल इतना खराब हो गया कि खंडूड़ी को गद्दी छोडऩी पड़ी। लेकिन उनके उत्तराधिकारी कोश्यारी नहीं बल्कि रमेश पोखरियाल निशंक बने। पहले वह कोश्यारी के समर्थक थे लेकिन बाद में उन्होंने खंडूड़ी का दामन थाम लिया था। यही वजह है कि खंडूड़ी इतने आत्मविश्वास से कहते हैं कि उन्होंने राज्य के लिए कई परियोजनाओं के ख्वाब बुने थे लेकिन अपने कार्यकाल के शुरुआती दो वर्षों में वह उन्हें पूरा नहीं कर सके क्योंकि राज्य में उस दौरान कई चुनाव हुए। ध्यान देने योग्य बात यह है कि निशंक भी गढ़वाली ब्राह्मण हैं। निशंक उत्तराखंड के सबसे खराब मुख्यमंत्री साबित हुए। भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के दरमियान खंडूड़ी समर्थकों ने राज्य में अन्ना हजारे की शैली में अभियान की मांग की। अब खंडूड़ी दोबारा राज्य की गद्दी पर बैठ सकते हैं और उम्मीद है कि राज्य भ्रष्टाचार के भंवर से निकल आएगा।

बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार में प्रकाशित आदिति फडणीस की रिपोर्ट

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