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नरेंद्र मोदी उनका अपमान कर रहे हैं जो उपवास रखने को मजबूर हैं

जब मीडिया के हर मंच पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के उपवास की खबरें लगातार देखा तो अपने गाँव में बिताया गया अपना बचपन बहुत याद आया. बाइस्कोप की तरह तस्वीरें नज़र आती रहीं. एक जगह जहां बार-बार मन अटक रहा था, वह तस्वीर मेरे दरवाज़े के नीम के पेड़ के नीचे की गयी बातचीत का एक टुकड़ा था. उस वक़्त के वरिष्ठ नागरिक टिबिल साहेब ने कहा कि बच्चा आज तो बंडेरी (खपरैल की मुंडेर) पर धुंआ दिखाने के लिए चूल्हे में लकड़ी जलानी पड़ेगी. राशन है नहीं सो खाना तो नहीं बन पायेगा, शाम को जब भैंस दूध देगी तो बच्चों को पिला दिया जाये़या. आज हम लोग उपवास करेंगे. जिसको बच्चा कह कर संबोधित किया गया था वे मेरे स्वर्गीय पिता जी थे. मेरे अपने घर में भी खाने पीने की तकलीफ थी. मेरे पिता जी ने टिबिल साहेब की बात सुन कर सन्न खींच लिया. कुछ देर बाद मेरी बड़ी बहन एक गठरी जैसी कोई चीज़ लेकर टिबिल साहेब के घर जाती देखी गयी. 

जब मीडिया के हर मंच पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के उपवास की खबरें लगातार देखा तो अपने गाँव में बिताया गया अपना बचपन बहुत याद आया. बाइस्कोप की तरह तस्वीरें नज़र आती रहीं. एक जगह जहां बार-बार मन अटक रहा था, वह तस्वीर मेरे दरवाज़े के नीम के पेड़ के नीचे की गयी बातचीत का एक टुकड़ा था. उस वक़्त के वरिष्ठ नागरिक टिबिल साहेब ने कहा कि बच्चा आज तो बंडेरी (खपरैल की मुंडेर) पर धुंआ दिखाने के लिए चूल्हे में लकड़ी जलानी पड़ेगी. राशन है नहीं सो खाना तो नहीं बन पायेगा, शाम को जब भैंस दूध देगी तो बच्चों को पिला दिया जाये़या. आज हम लोग उपवास करेंगे. जिसको बच्चा कह कर संबोधित किया गया था वे मेरे स्वर्गीय पिता जी थे. मेरे अपने घर में भी खाने पीने की तकलीफ थी. मेरे पिता जी ने टिबिल साहेब की बात सुन कर सन्न खींच लिया. कुछ देर बाद मेरी बड़ी बहन एक गठरी जैसी कोई चीज़ लेकर टिबिल साहेब के घर जाती देखी गयी. 

यह साठ के दशक का मेरा गाँव है. आजादी मिले कोई १०-१२ साल हुए रहे होंगे. ग्रीन रिवोल्यूशन का कहीं आता पता नहीं था. खेती के तरीके बहुत पुराने थे. देहुला धान और जौ की खेती होती थी. पूस आते-आते खाने का सामान घर में चुक जाता था. भड़भूजे के यहाँ से भुनवा कर लाया गया दाना भी स्नैक्स की तरह नहीं, लंच या डिनर की तरह खाया जाता था. मेरे गाँव में लोगों के घरों में अक्सर उपवास हो जाया करता था. इस उपवास में बूढ़े और जवान तो शामिल रहते ही थे, बच्चों को भी शामिल होना पड़ता था. बड़े होने पर मैंने अर्थशास्त्र की किताबों में पढ़ा कि भारत के बड़े भूभाग में लोग इसी तरह की ज़िन्दगी बसर करने के लिए मजबूर थे. गरीब लोगों के इस गाँव में किसान यह स्वीकार कर ही नहीं सकता था कि उसके यहाँ खाने के लिए कुछ नहीं है. उसका ज़मीर ज़िंदा था और वह अपनी गरीबी को छुपाकर रखना चाहता था. गरीब आदमी जब भूख से मरता है तो वह हार जाता है. हारा हुआ आदमी बहुत कमज़ोर होता है.

महात्मा गांधी भी उपवास रखते थे. उन्होंने उपवास कभी धमकाने के लिए नहीं रखा. अपने विरोधी पर दबाव डालने के लिए भी कभी नहीं रखा. महात्मा जी अगर आज जिंदा होते तो वे गुजरात के मामले में उपवास ज़रूर रखते लेकिन इसलिए नहीं कि जिन लोगों को २००२ में मारा गया था, उनके घर वाले और डर जाएँ. उनका उपवास इसलिए होता कि जिन लोगों ने गुजरात में इंसानियत का क़त्ले-आम किया था वे अपनी गलती माने और दुबारा उसे दोहराने की बात न सोचें. आज की हालात बिलकुल अलग हैं. नरेंद्र मोदी के लोगों ने गुजरात में बहुत सारे घर ऐसे बना दिए थे, जहां कोई भी कमाने वाला नहीं बचा. आज वे लोग मजबूरी में अक्सर उपवास करते हैं. आज का गुजरात का उपवासी यह साबित करना चाहता है कि उसने जो कुछ गुजरात में २००२ में करवाया वह बिलकुल सही था. अब उसकी कोशिश है कि बाकी देश में भी सत्ता हासिल करे. उसकी योजना है कि पूरे भारत के मुसलमानों को उसी तरह से ठीक कर दिया जाय जैसे २००२ में गुजरात में किया गया था. आज गुजरात का स्टार उपवासी यह साबित करना चाहता है कि वह बहुत  ही विनम्र है. ठीक उसी तरह जैसे फिल्म “लगे रहो मुन्ना भाई” का मुरली प्रसाद शर्मा विनम्र हो गया था. लगता है कि नरेंद्र मोदी ने उसी विनम्रता को अपनाने की कोशिश की है जैसी संजय दत्त ने अपनाई थी .वैसे उपवास का स्वांग करके नरेंद्र मोदी उन लोगों का अपमान कर रहे हैं जो उपवास रखने के लिए मजबूर हैं.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्‍ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्‍स के नेशनल ब्‍यूरोचीफ हैं.

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