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आखिर राजबाला की मौत का जिम्मेदार कौन है….?

कल दिनांक 26 सितम्बर 2011 था। राजबाला का शहादत दिवस। कौन राजबाला! राजबाला वही अभागन थी, जो जून माह की चार तारीख को बाबा रामेदव के आह्वान पर गुड़गांव से दिल्ली के रामलीला मैदान में पहुंची थी और विदेशों में जमा देश का काला धन वापस लाने के लिये केन्द्र सरकार पर दबाव डालने की देशव्यापी मुहिम का हिस्सा थी और दिल्ली पुलिस के अत्याचार का शिकार बनी थीं। राजबाला के परिजनों ने उनका शव लेने से इनकार कर दिया। उन्हें अस्पताल के इलाज पर भरोसा नहीं था। घर में सारे फैसले वही करती थीं… टीवी पर ‘‘इन्टरव्यू‘‘ देते वक्त राजबाला की बहू केवल इतना ही कह पाई थी और उसकी आंखों में आंसू भर आये कि उनकी कमी घर में कौन पूरी कर पायेगा।

कल दिनांक 26 सितम्बर 2011 था। राजबाला का शहादत दिवस। कौन राजबाला! राजबाला वही अभागन थी, जो जून माह की चार तारीख को बाबा रामेदव के आह्वान पर गुड़गांव से दिल्ली के रामलीला मैदान में पहुंची थी और विदेशों में जमा देश का काला धन वापस लाने के लिये केन्द्र सरकार पर दबाव डालने की देशव्यापी मुहिम का हिस्सा थी और दिल्ली पुलिस के अत्याचार का शिकार बनी थीं। राजबाला के परिजनों ने उनका शव लेने से इनकार कर दिया। उन्हें अस्पताल के इलाज पर भरोसा नहीं था। घर में सारे फैसले वही करती थीं… टीवी पर ‘‘इन्टरव्यू‘‘ देते वक्त राजबाला की बहू केवल इतना ही कह पाई थी और उसकी आंखों में आंसू भर आये कि उनकी कमी घर में कौन पूरी कर पायेगा।
घटनाक्रम को देखें तो 4 जून की शाम को छह बजे केंन्द्र सरकार के दो मंत्रियों कपिल सिब्बल और सुबोध कांत सहाय द्वारा खचाखच भरी प्रेस कांफ्रेस में बाबा रामदेव की सत्याग्रह समाप्त करने की चिट्ठी सार्वजनिक करने के बाद ही यह स्पष्ट हो गया था कि सरकार बाबा के मंसूबों को और हवा देने के मूड में नहीं है और साम-दाम-दंड-भेद की नीति को अपनाकर ही दम लेगी। आधी रात को एक तूफान सा आया और रायफल, लाठी-डंडों से लैसे दिल्ली पुलिस के गुंडों ने न जाने किसके आदेश पर सारे पंडाल को तहस-नहस कर डाला। सोते हुए महिलाओं-बच्चों को बेदर्दी से पीटा गया, बुजुर्गों पर लाठियां भांजी गयी, इतना ही नहीं जब इस पर मन नहीं भरा तो पंडाल में ही आंसू गैस के गोले दागे गये। लोगों को उठा-उठाकर गाड़ियों में भरा गया और दिल्ली के अलग-अलग स्थानों पर छोड़ दिया गया। बाबा रामदेव अपनी सुरक्षा के लिये जिस महिला घेरे से घिरे थे, राजबाला संभवतः उसी का हिस्सा थीं। महिला वेश में बाबा तो किसी तरह वहां से निकल भागे लेकिन एक दृश्य जो टीवी कैमरों के जरिये घर-घर पहुंचा वह घायल राजबाला को दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में भर्ती कराने का था। उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट पहुंची थी और पहले ही दिन से वह आईसीयू में थीं और साढ़े तीन महीने जिंदगी से संघर्ष करने के बाद आखिरकार मौत की आगोश में समा गयी।

घटनाक्रम के बाद जैसा कि हमारे इस महान देश में होता आया है. बयानबाजी शुरू हो गयी। गृहमंत्री चिदम्बरम ने दिल्ली पुलिस पर ठीकरा फोड़ते हुए कहा कि केन्द्र की इसमें कोई भूमिका नहीं थी तो प्रधानमंत्री ने लाठीचार्ज पर अफसोस प्रकट करते हुए यह भी कह डाला कि ऐसा करना जरूरी था। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी और कांग्रेस के युवराज चुप्पी साधे हुए थे। बीजेपी ने इसे लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय बताते हुए लोकसभा का विशेष सत्र बुलाने का ज्ञापन राष्ट्रपति को सौंपा। काले धन के खुलासे के मामले में ढिलाई पर सरकार को लताड़ लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि ऐसी क्या मजबूरी थी आधी रात के बाद सोते हुए लोगों पर कहर ढाया गया। दिल्ली पुलिस की ओर से कहा गया कि नियमों का उल्लंघन कर वहां 50 से 60 हजार लोग एकत्र हो गये इससे बाबा की जान को खतरा उत्पन्न हो गया था।

लेकिन रस्सी को सांप बताने वाले मीडिया की हालत बिन पेंदी के उस लोटे सरीखी हो गयी है जिसका न तो कोई आदर्श है और न कोई सिद्धांत। पहले तो जब हमेशा खबरों की तलाश में रहने वाले मीडिया ने बाबा के सत्याग्रह को हाथों-हाथ लिया था, उससे पूरे देश में काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल तैयार हो गया था लेकिन जब आपरेशन रामलीला मैदान के बाद बड़बोले दिग्विजय सिंह ने बाबा को ठग और उनके सहयोगी बालकृष्ण को नेपाल से भागा हुआ अपराधी करार दिया तो मीडिया के इन्हीं दिग्गजों ने इस बयान को खूब तरजीह दी। पिटने और जान बचाकर भागने के बावजूद बाबा को सवालों में घेरा गया। सरकार ने आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय को बाबा के ट्रस्टों की सम्पत्ति की जांच का जिम्मा दिया तो लकीर के फकीर हो चुके मीडिया जगत ने इसे ही हेडलाइन्स बना डाला लेकिन काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे मीडिया के गंभीर मुद्दों की लिस्ट में न पहले कभी थे और न आज। सांप निकल जाने पर लाठी पीटने वाली मीडिया व्यावसायिकता की होड़ में मौलिकता कब की खो चुकी है।

आम आदमी को हर कदम पर ठोकर मारने वाले मंहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी सरीखे मुद्दे मीडिया को बासी भात के समान लगते हैं। रोज होने वाले कत्ल, बलात्कार और डकैती को धारावाहिक और फिल्मों की तरह ग्लैमर का तड़का लगाकर पेश किया जाता है। लगभग डराने वाले अंदाज में कार्यक्रम को प्रस्तुत करने वाले एंकर यह जताने की कोशिश तो जरूर करते हैं कि उनसे बड़ा शुभचिंतक दूसरा कोई नहीं है लेकिन जनता के सामने वे कोई समाधान प्रस्तुत नहीं कर पाते। विधायिका और कार्यपालिका के रंग-ढंग से आजिज आ चुकी पब्लिक के लिये ले देकर सुप्रीम कोर्ट का ही आसरा है अन्यथा निचली अदालतों में सालों-साल मुकदमे खत्म होते-होते घर-बार बिकने की नौबत भले ही आ जाये फिर भी न्याय नहीं मिल पाता। ऐसे में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्रकारिता को जो भूमिका अदा करनी चाहिए, वह पिछले करीब एक दशक से अमल में नहीं आ पा रही है। राजबाला का ही उदाहरण लें… 4 जून को हुए हादसे के बाद कितने पत्रकारों ने उसकी हालत जानने का प्रयास किया, कितने चैनल में यह खबर दिखाई गयी कि पुलिस बर्बरता की शिकार एक निरीह महिला को अस्पताल में सही इलाज भी मिल पा रहा है या नहीं। क्या किसी ने गुड़गांव में उसके घर जाकर परिजनों से कोई प्रतिक्रिया मांगी। अब जब राजबाला नहीं रही तो फिर मीडिया में फिर यह खबर चल पड़ी है। लेकिन मीडिया की सुर्खियों से दूर यह सवाल अनसुलझा ही रह जायेगा कि आखिर राजबाला की मौत का जिम्मेदार कौन है?

लेखक निखिल अग्रवाल पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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