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राजस्थान में राजनीति के भवंर में कांग्रेस

धोरों की धरती राजस्थान में इस बार रेतीला नहीं बल्कि राजनीतिक बवंडर मचा हुआ है। जिसकी सीधी चपेट में खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं। गहलोत व्यक्तिगत तौर पर भले ही साफ छवि वाले हों लेकिन उनके मंत्रिमंडल, विधायक और प्रशासन की कारगुजारी के कारण पूरी सरकार के सामने संकट आ खड़ा हुआ। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान को सबसे चिंता उन राज्यों की है जहां चुनावी बिसात बिछने वाली है। ऐसे में यदि राज्य के किसी बड़े नेता पर गाज गिरे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। क्योंकि कांग्रेस अपने वोट बैंक को बचाने के लिए एडी चोटी का जोर लगा सकती है। ऐसे में यह महीना प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए काफी कष्टदायी साबित होने वाला है।

धोरों की धरती राजस्थान में इस बार रेतीला नहीं बल्कि राजनीतिक बवंडर मचा हुआ है। जिसकी सीधी चपेट में खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं। गहलोत व्यक्तिगत तौर पर भले ही साफ छवि वाले हों लेकिन उनके मंत्रिमंडल, विधायक और प्रशासन की कारगुजारी के कारण पूरी सरकार के सामने संकट आ खड़ा हुआ। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान को सबसे चिंता उन राज्यों की है जहां चुनावी बिसात बिछने वाली है। ऐसे में यदि राज्य के किसी बड़े नेता पर गाज गिरे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। क्योंकि कांग्रेस अपने वोट बैंक को बचाने के लिए एडी चोटी का जोर लगा सकती है। ऐसे में यह महीना प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए काफी कष्टदायी साबित होने वाला है।

ताजा मामला जोधपुर की लापता एएनएम भंवरी देवी और भरतपुर में पुलिस फायरिंग में एक खास समुदाय के लोगों के मारे जाने का है। इतना ही नहीं, आलाकमान से मिल रहे संकेत भी गहलोत के माथे पर बल लाने के लिए काफी है। इन दोनों मामलों ने न सिर्फ राज्य सरकार की बल्कि कांग्रेस की भी बुरी गत कर दी है। दिल्ली से जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं, उसे इस बात की भी संभावना बन रही है कि जल्दी ही प्रदेश से गहलोत की विदाई हो सकती है। हालांकि यह मात्र संभावना ही है। जल संसाधन मंत्री महिपाल मदेरणा और गृहमंत्री शांति धारीवाल की कार्यप्रणाली को लेकर आलाकमान ने अपनी नाराजगी पहले ही जता दी है। गहलोत की कुर्सी पर भले ही कोई आंच न आए लेकिन इन मंत्रियों की कुर्सी चली जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। मदेरणा और गहलोत में पहले से ही छत्तीस का आंकड़ा है। वर्ष 1988 जब कांग्रेस विधानसभा चुनाव लड़ रही थी तो मदेरणा के पिता पारसनाथ मदेरणा के नेतृत्व में पूरा चुनाव लडा गया लेकिन विधानसभा में अधिक सीट से उत्साहित आलाकमान ने गहलोत को मुख्यमंत्री के रूप में राजस्थान की कमान सौंप दी। बस इसी बात से मदेरणा गहलोत से खफा हैं।

पहले बात जोधपुर में रहस्मयी ढंग से गायब हुई एएनएम भंवरी देवी की। भंवरी को गायब हुए कई सप्ताह बीत चुके हैं लेकिन आज तक सरकार उसका पता नहीं लगा पाई है। अपनी बीबी की तलाश में भटक रहे अमरचंद्र ने तो सीधा राज्य के जल संसाधन मंत्री महिपाल मदेरणा पर यह आरोप लगा कर पहले ही सनसनी फैला चुका है कि मदेरणा ने ही उसकी पत्नी भंवरी देवी को अपहरण, दुष्कर्म व हत्या करवाई है। जोधपुर के बोरूंदा में नियुक्त हाई प्रोफाइल एएनएम भंवरी देवी को अब तक राजस्थान की सरकार नहीं खोज पाई है। भंवरी उस वक्त सबसे अधिक चर्चा में आई थी, जब उसने दावा किया था कि उसके पास एक कैबिनेट मंत्री की ऐसी सीडी मौजूद है जो राजनीति में में भंवर ला सकता है। मीडिया में आ रही तस्वीरें ने भी भंवरी और मंत्री की बीच नजदीकियों को खोल कर सामने रख दिया है।

इसी तरह भरतपुर के गोविंदगढ गांव में 14 सितंबर को पुलिस की गोलियां का निशाना बने मेव समुदाय के लोगों की नौ मौंतों ने भी सरकार को मुसीबत में डाल दिया है। राजनैतिक दलों से लेकर मानवाधिकार संगठनों ने इसके लिए सरकार और पुलिस को ही दोषी माना है। मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की रिपोर्ट के अनुसार तो पुलिस का सांप्रदायिकरण ही इन मौतों के लिए जिम्मेदार है।

पीयूसीएल राजस्थान के अध्यक्ष प्रेम कृष्ण शर्मा कहते हैं कि चलिए एक बार मान भी लेते हैं कि पुलिस ने एक विशेष समुदाय के लोगों को जानबूझ कर निशाना नहीं बनाया लेकिन यह कैसे हो सकता है कि पुलिस की गोली से केवल एक ही समुदाय के लोग मारे जाएं। पीयूसीएल ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया है कि गोविंदगढ का माहौल बिगाड़ने और दंगा फैलाने में राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बजरंग दल जैसे भगवा संगठनों के नेताओं की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। पीयूसीएल की ओर से गोपालगढ़ भेजी गई जांच दल की सदस्य और संगठन की महासचिव कविता श्रीवास्तव कहती हैं कि हमारी चिंता इस बात को लेकर सबसे अधिक है कि किस प्रकार पुलिस ने दो लोगों के आपसी विवाद में भाग लेते हुए एक खास समुदाय को निशाना बनाया। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यदि पुलिस ने सही कदम उठाते हुए गोलीबारी की है, तो यह एक पहेली है कि मरने वाले सभी एक ही समुदाय के कैसे हो सकते हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के आरोप हैं कि इस घटना के पीछे स्थानीय पुलिस के अलावा गुर्जर नेता और आरएसएस, बजरंग दल और विहिप के कार्यकर्ता शामिल हो सकते हैं। आरोप यह लगाया कि ये लोग घटना से पहले थाने में थे, जहां दोनों समुदाय के बीच समझौते के लिए बैठक चल रही थी तथा इन्हीं लोगों ने दबाव बनाकर कलेक्टर से फायरिंग के आदेश लिखवाए। इसकी भी जांच करवाए जाने की आवश्यकता है।

लेकिन भाजपा ऐसे किसी भी आरोप से सहमत नहीं है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अरूण  चतुर्वेदी कहते हैं कि यह आरोप बेबुनियाद है। स्थानीय प्रषासन पहल पर ही भाजपा के नेताओं ने स्थानीय विधायक जाहिदा हिना के साथ वहां मौजूद थे। राजस्थान पीयूसीएल के अध्यध्क्ष प्रेम कृष्ण शर्मा का कहते हैं कि यदि समय रहते प्रशासन गंभीरता दिखाते हुए हजारों की भीड़ पर काबू करने की कोशिश करता तो बेगुनाहों की जान नहीं जाती। लेकिन पुलिस ने भीड़ को बढ़ने दिया। ऐसा ही आरोप भाजपा और कांग्रेस लगा रही है जो कि पूरी सरकार के लिए चिंता का सबब है।

कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान कहते हैं कि गोपालगढ़ की घटना में पुलिस प्रशासन की कमियां जरूर रही हैं। उन्होंने कहा कि यदि पुलिस प्रशासन पहले से सचेत होता तो इस घटना को टाला जा सकता था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि पुलिस और प्रशासन के स्तर पर कोई कमी नहीं रही, कमियां जरूर रही हैं। लेकिन इसके लिए मुख्यमंत्री और सरकार पर दोष मंडना सही नहीं है। भाजपा दवारा मुख्यमंत्री के इस्तीफे पर चंद्रभान कहते हैं कि सौ लोगों को अपने शासनकल में मारे वाली भाजपा किस मुंह से इस्तीफा मांग रही है।

दूसरी ओर, कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी की ओर से भेजी गई कांग्रेस सांसदों की टीम ने भी गहलोत सरकार के लिए मुसीबत पैदा कर दी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मस्जिद के अंदर जिस प्रकार अंधाधुंध गोलीबारी की गई है, उसके लिए स्थानीय पुलिस ही जिम्मेदार है। इस रिपोर्ट के बाद गहलोत सरकार को जवाब देना भारी पड़ सकता है। गहलोत सरकार ने मामले को बढ़ता देखकर आनन फानन में दोनों केस को सीबीआई के हवाले कर विपक्ष की बोलती बंद करने की कोशिश की लेकिन विपक्ष खामोश रहने वाला नहीं है। मुख्यमंत्री की स्थिति अभी कुछ इस तरह हो गई है कि यदि वह कुछ करते हैं तो नुकसान और नहीं करते हैं तो नुकसान। कांग्रेस का परंपरागत वोट रहे मेव और दलितों के साथ जिस तरह से प्रदेश में अत्याचार हो रहे हैं, उस पर मुख्यमंत्री की चुपी चौंकाने वाली है। दूसरी ओर, दलित नर्स भंवरी देवी की तलाश को लेकर जोधपुर समेत पूरे इलाके में आए दिन धरने प्रदर्शन हो रहे हैं जो कि कहीं न कहीं सरकार के लिए चिंता का सबब हैं।

जमाते इस्लामी संगठन के मोहम्मद सलीम इंजीनियर गहलोत पर निशाना साधता हुए कहते हैं कि इनके राज में न तो अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं न दलित। ऐसे में गृहमंत्री का असंवेदनशील रवैया और तकलीफ पहुंचाता है। कांग्रेस नेतृत्व को इन दोनों को तुरंत हटाकर नए लोगों को सत्ता सौंपनी चाहिए। लेकिन सलीम को कांग्रेस से फिलहाल कोई दिक्कत नहीं है। वे कहते हैं कि यदि कांग्रेस जाती है तो भाजपा आएगी, जो कि और अधिक नुकसान है। जनता को तीसरे विकल्प की तलाश है। जिस दिन यह मिल गया, उस दिन भाजपा और कांग्रेस दोनों ने हम हाथ जोड लेंगे। लेकिन राज्य के आला अधिकारी सरकार का बचाव करते हैं। ऐसे ही एक अधिकारी हैं गृह सचिव पीके देब। देब कहते हैं कि इतने बड़े देश में कुछ न कुछ होता ही रहता है। राजस्थान में पिछले छह महीने से कोई बड़ी घटना नहीं हुई। ऐसे में यह कहना है कि घटनाओं को रोक नहीं पा रहा है तो यह बिल्कुल गलत है। हर केस में हमने तत्परता दिखाई और नतीजे आ रहे हैं।

उधर, पूरे मामले पर भाजपा भी खामोश बैठने वाली नहीं है। राजस्थान भाजपा के अध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी अपना गुस्सा कुछ यूं बयां करते हैं….हमारे माननीय मुख्यमंत्री के पास विजन के साथ नेतृत्व की कमी है। मुख्यमंत्री की न तो अपने मंत्रियों पर कोई लगाम है और न अधिकारियों पर। यदि भंवरी देवी कांड में फंसे मंत्री इतने ही दूध के धुले हैं तो नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दें और जब जांच में वह बरी हो जाते हैं तो फिर से कुर्सी पर बैठ जाएं। भाजपा मुख्यमंत्री के परिवार पर भी हमले करने से नहीं बचती है। अपने परिवारवालों को फायदा पहुंचाना का आरोप झेल रहे अशोक गहलोत को लेकर भाजपा की यही मांग है कि मुख्यमंत्री इस पूरे मामले की जांच करवाएं। चूंकि वह खामोश हैं, इसलिए दाल में कुछ काला नजर आता है। उधर, जब आउटलुक ने कांग्रेस और सरकार का पक्ष जानने की कोशिश की तो कोई भी मुंह खोलने को तैयार नहीं था। गृहमंत्री बार बार फोन पर आने से बचते रहे, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष चंद्रभान का मोबाइल स्विच ऑफ ही रहा।

गहलोत ने अपने पहले मुख्यमंत्री के कार्यकाल में जो मजबूत धर्मनिरप़ेक्ष छवि का निर्माण किया था, अब उस पर सवाल खडे हो गए हैं। गहलोत ने विहिप के नेता प्रवीण तोगडिया की गिरफतारी पर जो साहस दिखला कर एक मजबूत पैगाम छोडा था कि वह अपने सूबे में किसी को अंशाति नहीं फैलाने दें। अब उनके सामने सबसे बडी चुनौती यह साबित करेंगे कि वह उसी तरह मजबूत हैं और धर्मनिरपेक्ष मुदों के लिए प्रतिबध हैं।

 

लेखक आशीष महर्षि राजस्‍थान के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. उनका यह लेख आउटलुक में प्रकाशित हो चुका है. वहीं  से साभार लिया गया है.

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