पड़ोसी पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध इस समय सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं. पाक के सारे अखबार अमेरिका विरोधी खबरों से रंगे हुए हैं. उनमें चिंताभरी नाराजगी की एक सामान्य वजह यह है मानों वॉशिंगटन कभी भी पाक पर हमला कर देगा. ‘डेली टाइम्स’ ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी का बयान प्रमुखता से प्रकाशित किया है कि पाक को बचाने के लिए सभी एकजुट हों. ‘डॉन’ ने पाक खुफिया एजेन्सी आईएसआई प्रमुख अहमद शुजा पाशा की इस धमकी को सुर्खी दी है कि पाक में आतंकियों पर अमेरिकी हमले अब बर्दाश्त नहीं होंगे. ‘द नेशन’ ने दोनों देशों के खराब रिश्तों की वजह अमेरिकी अहंकार को बताया है.
‘डॉन’ ने माना है कि दोनों देश कठिन दौर से गुजर रहे हैं लेकिन उनके अच्छे द्विपक्षीय संबंध जरूरी हैं. ‘पाकिस्तान थिंक’ और ‘गल्फ टुडे’ ने सलाह दी है कि दोनों को तुरंत बातचीत करके ब़ता आपसी तनाव खत्म करना चाहिए और आगे भी मिल कर काम करना चाहिए. लेकिन इन सबके बीच ‘पाकिस्तान ऑब्जर्वर’ ने सारा दोष अमेरिकी सेना के शीर्ष अफसर माईक मलेन के सिर म़ढ़ा है. उसने लिखा है कि मलेन ने पाक के खिलाफ बयानबाजी में सारी हदें तोड़ दीं, इसी वजह से रिश्तों में कडुवाहट आई.
दरअसल, माईक मलेन ने पिछले दिनों कहा कि पाक खुफिया एजेन्सी आईएसआई का आतंकी गुट हक्कानी नेटवर्क से नजदीकी संबंध है. तालिबान का अंग रहे इस गुट ने हाल में अफगानिस्तान में अमेरिकी दूतावास पर हमला किया जिसमें अनेक जानें गईं. फिर दो दिनों के दरम्यान ही उसने वहीं ‘नाटो’ के एक ठिकाने और सीआईए कार्यालय पर भी हमला किया. मलेन ने हक्कानी नेटवर्क के अलावा दूसरे आतंकी संगठनों जैसे लश्कर-ए-तोयबा के साथ भी आईएसआई के नजदीकी संबंधों की बात कही है. ये सभी पाक के उत्तरी क्षेत्र वजीरिस्तान और अफगानिस्तान में सक्रिय हैं. और सबसे ज्यादा चुभने वाली बात मलेन ने यह कही कि आतंकी हमले आईएसआई की जानकारी में हो रहे हैं. ये बातें कोई और कहता तो शायद बात आई गई हो जाती लेकिन माईक मलेन अमेरिका में अब तक पाक हितों के रक्षक माने जाते रहे हैं, इसलिए ये बातें और भी नागवार गुजर रही हैं.
दिलचस्प तो यह है कि यह वही मलेन हैं जिन्होंने पहले पाक से संबंधों की वकालत यह कहकर की थी कि पाक से गड़बड़ रिश्तों का होना, एकदम रिश्ता न होने से तो बेहतर ही है. यानी मलेन को पहले भी पाक की आतंकियों से साठगांठ को लेकर आशंका थी. लेकिन एशिया में एक मजबूत सहयोगी के रूप में उसकी हरकतें बर्दाश्त हो रही थीं. लेकिन अब नहीं. अब तो अमेरिका अपनी उस भारी भरकम आर्थिक मदद को भी बंद कर रहा है जो वह हर साल पाक को देता रहा था. वाशिंगटन का तर्क है कि पाक एक ओर आतंक के खात्मे के नाम पर खरबों डॉलर मदद ले रहा है तो दूसरी और वह आतंक ब़ढ़ा भी रहा है. जाहिर है कि आर्थिक सहायता बंद होने से इस्लामाबाद का तिलमिला उठना स्वाभाविक है.
उधर, पाक विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने अमेरिका पर पलटवार करते हुए कहा है कि वह अपनी हद में रहे और पाक पर आरोप लगाना बंद करे. खार ने यह भी कहा है कि जिस हक्कानी नेटवर्क के बारे में अमेरिका इतनी हाय तौबा मचा रहा है, यह वही है जो अनेक वर्षों तक अमेरिका का चहेता रहा है. पाक के आंतरिक मंत्री रहमान मलिक ने इस का और खुलासा करते हुए कहा कि अफगान युद्ध के समय सीआईए ने ही हक्कानी को पैदा किया और प्रशिक्षित किया. हमारा उससे कोई रिश्ता नहीं है. हालांकि पाक सेना ने बाद में बयान जारी करके माना कि आईएसआई का हक्कानी से संबंध है लेकिन सफाई दी कि अनेक देशों के खुफिया तंत्र का हक्कानी से संपर्क है. पर इसके लिए सिर्फ पाक पर ही उंगली क्यों उठाई जा रही है.
दरअसल, अस्सी के दशक में शीत युद्ध के समय जब अफगानिस्तान में सोवियत सेना मौजूद थी तो उसका विरोध कर रहे मुजाहिद्दीनों के नेता थे जलालुद्दीन हक्कानी. जलालुद्दीन के नाम पर ही हक्कानी नेटवर्क का नाम प़ड़ा है. दुनिया जानती है कि जलालुद्दीन अमेरिका के बहुत प्रिय थे. तब अमेरिकी कांग्रेस सदस्य चार्ली विलसन ने जलालुद्दीन को ‘दुनिया भर की अच्छाइयों का प्रतीक’ कहा था. वाशिंगटन की नजर में तब उनकी इतनी इज्जत थी कि रोनाल्ड रेगन के राष्ट्रपतित्व काल में जलालुद्दीन हक्कानी ने व्हाइट हाऊस की यात्रा भी की थी. लेकिन बात खटकी में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला करके तालिबानी सरकार को काबुल से अपदस्थ कर दिया था. तब जलालुद्दीन वॉशिंगटन से नाराज हो गया. अब जलालुद्दीन का बेटा सिराजुद्दीन हक्कानी इस नेटवर्क को पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्र वजीरिस्तान से संचालित करता है. यह इलाका दुर्गम क्षेत्रों के चलते कमोबेश अर्ध स्वायत्त क्षेत्र जैसा ही है.
अब वॉशिंगटन यह दबाव बना रहा है कि पाक ऐसे चरमपंथी संगठनों से संपर्क तो़ड़े और पूरी तरह से आतंक के खिलाफ जंग में मदद के, लेकिन पाक की परेशानी यह है कि उसे न निगलते बन रहा है और न ही उगलते. पाक विदेश नीति दशकों से चरमपंथी संगठनों से नजदीकी रिश्तों पर आधारित रही है. कश्मीर में उसने यही किया है. बांग्लादेश निर्माण के पूर्व पूर्वी पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों की हत्या भी उसने इसी नीति के तहत करवाई. पिछले दशकों में ईरान में शिया क्रांति के बाद शियाओं की हत्या में भी उसकी भूमिका रही. सोवियत सेना की अफगानिस्तान में मौजूदगी के दौरान और उसके बाद भी उसने अनेक चरमपंथी मजहबी संगठनों से नजदीकी रिश्ते ही नहीं बनाये, उन्हें बढ़ावा भी दिया. चीन के सीमावर्ती क्षेत्र उइगर में भी इनकी गतिविधियां बीजिंग के लिए चिंता की सबब रही हैं. मजे की बात है कि जिस तरह इस्लामाबाद अमेरिका से मदद लेकर भी अमेरिका विरोधी हरकतों में आतंक का साथ देता रहा है, उसी तरह अब वो चीन के साथ भी कर रहा है. इसी लिए उस पर चीन भी भरोसा नहीं कर रहा. मलेन के बयान के ठीक बाद चीन के उपप्रधानमंत्री मेंग जियानजाऊ दो दिन की यात्रा पर पाक आये थे, तब बीजिंग ने इस्लामाबाद को युद्ध-शांति हर हाल में मदद का भरोसा तो दिया लेकिन उसने द्विपक्षीय रक्षा संधि से इनकार कर दिया.
दरअसल जुलाई में काबुल में भारतीय दूतावास पर हमला हक्कानी के चलते ही हुआ था. इसी साल इंटर कांटिनेंटल होटल पर भी हमला हुआ. मई में काबुल में बमबारी और अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई और अन्य पर भी जानलेवा हमला हुआ. पिछले महीने करजई के भाई की मौत भी हमले में ही हुई. इसके पूर्व ओसामा बिन लादेन का पाक के ऐबटाबाद में मारा जाना, अमेरिकी जासूस की पाक में गिरफ्तारी, पत्रकार डेविड पर्ल की हत्या के बाद आईएसआई द्वारा पत्रकार सलीम शहजाद की हत्या में भागीदारी जैसी घटनाएं भा हुईं. अब वॉशिंगटन इन घटनाओं को भी इन्हीं संदर्भों में देख रहा है. तभी तो मलेन ने मुंबई हमलों का भी जिक्र करते हुए उसमें लश्कर का हाथ होने की बात उठाई, जिसे पाक सरकार का समर्थन मिलता रहा है.
बहरहाल, अब पाक सरकार इन स्थितियों में अपनी राष्ट्रीय एकजुटता पर ही जोर दे रही है. उसने पिछले दिनों इस्लामाबाद में सभी पार्टियों, सेना और खुफिया तंत्र के आला अधिकारियों की बैठक बुलाकर यही संदेश देना चाहा है. उसे डर है कि संयुक्त राष्ट्र के जरिए पाक पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जा
सकते हैं. उसे राजनयिक दृष्टि से अलग थलग पड़ने का भी डर है. आशंका में सैन्य कार्रवाई की बात भी उठ रही है. यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिका पाक के नाभिकीय हथियारों को हथियाना चाह रहा है. उधर, पाक में यह चर्चा भी हो रहा है कि यदि प्रतिबंध लगा तो ‘नाटो’ सेनाओं की आपूर्ति भी पाक द्वारा रोकी जा सकती है. बहरहाल, इन चर्चाओं के बीच विंस्टन चर्चिल की यह उक्ति सही साबित हो रही है कि अमेरिकी जब अनेक विकल्प आजमा चुकते हैं तो सही बात पर अंततः आ ही जाते हैं. उधर, भारत धैर्य से स्थितियों पर निगाह रखे हुए है, आखिर उसकी वर्षों से कही जा रही बातें सच जो साबित हो रही हैं.
लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.


