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पीस पार्टी ने बदला सुल्‍तानपुर की राजनीति का समीकरण

सुलतानपुर. आम तौर पर बसपा का गढ़ माने जाने वाले सुलतानपुर की राजनीति में डॉ. मोहम्मद अयूब की पीस पार्टी ने एक नया आयाम जोड़ दिया है. इस जिले की पांच सीटों में से अब तक चार सीटें बसपा के पास हैं. इस बार भी आम तौर पर माना जा रहा था कि ज़्यादातर सीटों पर मुकाबला बसपा और सपा के बीच होगा लेकिन पीस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने लम्भुआ विधानसभा सीट से अपने ठाकुर उम्मीदवार के नाम का ऐलान करके मुक़म्मल तरीके से लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया है. लोकसभा चुनाव २००९ में बहुत दिन बाद कांग्रेसी उम्मीदवार की जीत के बाद माना जा रहा था कि इस इलाके में कांग्रेस भी थोड़ी बहुत मौजूदगी दर्ज कराएगी, लेकिन ऐसा कहीं होता कहीं नहीं दिख रहा है. जहां तक बीजेपी का सवाल है, उसने राम जन्मभूमि के आन्दोलन के बाद हुए दो चुनावों में सफलता पायी थी लेकिन अब वह बहुत दूर कहीं हाशिये पर चली गयी. लेकिन ऐसा लगता है कि पीस पार्टी की नई पहल के बाद समीकरण बिलकुल बदल जायेंगे.

सुलतानपुर. आम तौर पर बसपा का गढ़ माने जाने वाले सुलतानपुर की राजनीति में डॉ. मोहम्मद अयूब की पीस पार्टी ने एक नया आयाम जोड़ दिया है. इस जिले की पांच सीटों में से अब तक चार सीटें बसपा के पास हैं. इस बार भी आम तौर पर माना जा रहा था कि ज़्यादातर सीटों पर मुकाबला बसपा और सपा के बीच होगा लेकिन पीस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने लम्भुआ विधानसभा सीट से अपने ठाकुर उम्मीदवार के नाम का ऐलान करके मुक़म्मल तरीके से लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया है. लोकसभा चुनाव २००९ में बहुत दिन बाद कांग्रेसी उम्मीदवार की जीत के बाद माना जा रहा था कि इस इलाके में कांग्रेस भी थोड़ी बहुत मौजूदगी दर्ज कराएगी, लेकिन ऐसा कहीं होता कहीं नहीं दिख रहा है. जहां तक बीजेपी का सवाल है, उसने राम जन्मभूमि के आन्दोलन के बाद हुए दो चुनावों में सफलता पायी थी लेकिन अब वह बहुत दूर कहीं हाशिये पर चली गयी. लेकिन ऐसा लगता है कि पीस पार्टी की नई पहल के बाद समीकरण बिलकुल बदल जायेंगे.
सुलतानपुर जिले में पिछले कई वर्षों से लोकसभा सीट बीजेपी और बीएसपी के कमज़ोर उम्मीदवारों के बीच बंटती रही है. बीजेपी ने कभी किसी बाबा को टिकट दे दिया तो कभी किसी पुलिस वाले को लेकिन जनसमर्थन का सैलाब ऐसा था कि पार्टी जीत जाती थी. जब राम जन्मभूमि वाला राजनीतिक मुद्दा कमज़ोर पड़ा तो बीएसपी के ऐसे उम्मीदवार जीतने लगे जिनका कहीं किसी ने नाम तक न सुना था. बीएसपी के पक्के वोटों की ताक़त पर ऐसे लोग जीत गए जिनका राजनीतिक मजबूती के बारे में ज्ञान लगभग शून्य था. ऐसे ही एक बीएसपी सांसद को हराने के लिए २००९ में लगभग पूरा जिला एकजुट हो गया और कांग्रेस के एक मज़बूत नेता को चुनाव जिता दिया और संजय गांधी और राजीव गाँधी युग के ताक़तवर कांग्रेस नेता संजय सिंह एमपी बन गए. लेकिन उनकी जीत के बाद भी पार्टी को कोई मजबूती नहीं मिल सकी, क्योंकि उनके आलाकमान ने उन्हें दिल्ली में कोई हैसियत नहीं दी.

आज कांग्रेस की हालात खस्ता है. हालांकि पार्टी के बहुत बड़े नेता आस्कर फर्नांडीज़ के सहयोगी बीपी सिंह दिल्ली में माहौल बनाए हुए हैं कि वे जयसिंहपुर विधान सभा क्षेत्र से चुनाव जीत सकते हैं लेकिन क्षेत्र में उनकी ज़मीनी पहचान कुछ नहीं हैं. लोग उनको गंम्भीरता से नहीं ले रहे हैं. जयसिंहपुर विधान सभा क्षेत्र में एक अजीब बात देखने में आई. कांग्रेस के लिए टिकट की दौड़ में मुंबई के एक व्यापारी भी हैं. कहते हैं कि वे सीधे राहुल गाँधी के दरबार से टिकट पा जायेंगे. इलाके के लोग उसको गंभीरता से ले रहे हैं. उसका एक भाई जिला पंचायत का सदस्य बनने में सफल रहा था. पूरे जिले में कांग्रेस के उम्मीदवारों में इनका नाम ही मुकाबले में मौजूद रह सकने लायक उम्मीद्वारों में लिया जा रहा है. हालांकि आईआईटी से बीटेक पास करने वाला एक नौजवान भी लम्भुआ से कांग्रेस के टिकट की कोशिश कर रहा है लेकिन जब कांग्रेस की ही हालत खस्ता है तो उसके उम्मीदवारों की क्या बिसात.

जिले में चर्चा है कि बीएसपी के मौजूदा विधायक चन्द्रभद्र सिंह बीजेपी के साथ भी जा सकते हैं. आकलन यह है कि अगर वे बीजेपी में जाते हैं तो बीजेपी को मजबूती मिलेगी. लेकिन यह बात चर्चा के स्तर पर ही है. इस बात को गंभीरता से लेने वालों की भारी कमी है. सुलतानपुर शहर से बीजेपी के कुछ ऐसे उम्मीदवार सुनायी पड़ रहे हैं जो जिले में बीजेपी की मौजूदगी का माहौल बना सकते हैं. हाँ, अगर और पार्टियों ने उलटे सीधे टिकट दे दिए तो शहर की सीट पर बीजेपी की जीत की थोड़ी बहुत संभावना बन सकती है. लेकिन अगर चन्द्रभद्र सिंह बीजेपी के साथ न गए तो पार्टी का कोई नामलेवा नहीं है.

राष्ट्रीय स्तर की दोनों पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस की हालत एक जैसी ही है. जिले के जिन बड़े पत्रकारों से बातचीत हुई सब का मानना है कि लड़ाई बसपा और सपा के बीच ही है. कादीपुर सुरक्षित विधानसभा सीट पर बसपा के वर्तमान विधायक के खिलाफ कोई आरोप नहीं हैं लेकिन उनके खिलाफ सपा का जो उम्मीदवार है उसकी छवि एक बेदाग़ इंसान की है. १९७४ में वह तत्कालीन जनसंघ की टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे थे. लेकिन कांग्रेस के उम्मीदवार जयराज गौतम ने उन्हें हरा दिया था. ३७ साल की अपनी चुनावी राजनीति में वे इस मुकाम पर हैं  जहां उनके साथ लोगों की सहानुभूति है. क्षेत्र में मुसलमानों और पिछड़ी जातियों का प्रतिशत अच्छा है इसलिए वे मज़बूत माने जा रहे हैं. अगर कहीं कांग्रेसी उम्मीदवार ठीक से लड़ गया तो बसपा विधायक के लिए मुश्किल पेश आ सकती है.

जिले की एक अन्य प्रतिष्ठित सीट लम्भुआ है. इस सीट पर भी सपा का उम्मीदवार मज़बूत है. हालांकि पार्टी ने वहां भी दुविधा दिखाई है. एक बार टिकट देकर बदल दिया गया है. चर्चा है कि फिर बदल दिया जाएगा. ऊपर से उसका मुकाबला राज्य के पर्यटन मंत्री विनोद सिंह से है. लम्भुआ में आम तौर पर ठाकुर और ब्रह्मण एक दूसरे के खिलाफ रहते हैं. सपा का ब्राह्मण उम्मीदवार पहले भी विधायक रह चुका है और ब्राह्मणों में लोकप्रिय है. बसपा के विनोद सिंह का दावा है कि उनके खिलाफ कोई नहीं जीत सकता. उन्होंने बहुत काम किया है. गोमती नदी पर तीन पुल उनके सौजन्य से ही बन रहे हैं. वैसे भी वे क्षेत्र के लोगों से संपर्क में रहते हैं लेकिन उनके खिलाफ दो बातें हो सकती हैं. एक तो वे इलाके में एक ख़ास वर्ग के ठाकुरों को साथ लेकर चल रहे हैं. इसके अलावा पीस पार्टी के लम्भुआ से ताज़ा घोषित हुए उमीदवार उनकी मुसीबत बढ़ा सकते हैं. केडी सिंह नाम के यह व्यक्ति ठाकुर नौजवानों में आज से ही चर्चा में आ गए हैं. जो ठाकुर लड़के उनका गुणगान कर रहे हैं अगर वे साथ चले गए तो विनोद सिंह को फ़ौरन किसी नई रणनीति पर काम करने के लिए मजबूर होना पडेगा. कुल मिलाकर सुल्तानपुर जिले की राजनीति ऐसी है जहां बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है.

वरिष्‍ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह एवं विजय पाण्‍डेय की रिपोर्ट.

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