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हिंदी विश्‍वविद्यालय में आदिवासी चिंतक प्रो. मुण्‍डा को दी गई श्रद्धांजलि

वर्धा: आदिवासी चिंतक प्रो.रामदयाल मुण्‍डा के निधन पर महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के डॉ. बाबासाहब आंबेडकर दलित एवं जनजाति अध्‍ययन केंद्र में विश्‍वविद्यालय परिवार ने उनकी आत्‍मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की। अपने शोक संदेश में दलित एवं जनजाति अध्‍ययन केंद्र के निदेशक प्रो. लेला कारूण्‍यकरा ने प्रो. मुण्‍डा को समाज को आगे ले जानेवाले कर्मपुरूष बताते हुए कहा कि वे हमारे विभाग से जुड़े थे, कैंसर से पीडि़त थे, 01 अक्‍टूवर को उनका महापरिनिर्वाण हो गया। उनके साथ बिताए पलों को साझा करते हुए उन्‍होंने कहा कि इस विभाग में एक मीटिंग के सिलसिले में वे यहां आए थे तो उन्‍हें जानकारी मिली कि उनको राज्‍यसभा का सदस्‍य बना दिया गया है। वर्धा में उनके सम्‍मान में एक डिनर पार्टी आयोजित की गई थी। उसमें मुण्‍डा जी ने यहां के लोगों से कहा था कि मैं छह वर्ष के लिए राज्‍यसभा का सदस्‍य बना हूं, लेकिन मुझे 60 वर्ष का काम करना है। सामाजिक कार्यक्षेत्र में कोई इनसे बड़ा आदर्श पुरूष इस युग में नज़र नहीं आते हैं।

वर्धा: आदिवासी चिंतक प्रो.रामदयाल मुण्‍डा के निधन पर महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के डॉ. बाबासाहब आंबेडकर दलित एवं जनजाति अध्‍ययन केंद्र में विश्‍वविद्यालय परिवार ने उनकी आत्‍मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की। अपने शोक संदेश में दलित एवं जनजाति अध्‍ययन केंद्र के निदेशक प्रो. लेला कारूण्‍यकरा ने प्रो. मुण्‍डा को समाज को आगे ले जानेवाले कर्मपुरूष बताते हुए कहा कि वे हमारे विभाग से जुड़े थे, कैंसर से पीडि़त थे, 01 अक्‍टूवर को उनका महापरिनिर्वाण हो गया। उनके साथ बिताए पलों को साझा करते हुए उन्‍होंने कहा कि इस विभाग में एक मीटिंग के सिलसिले में वे यहां आए थे तो उन्‍हें जानकारी मिली कि उनको राज्‍यसभा का सदस्‍य बना दिया गया है। वर्धा में उनके सम्‍मान में एक डिनर पार्टी आयोजित की गई थी। उसमें मुण्‍डा जी ने यहां के लोगों से कहा था कि मैं छह वर्ष के लिए राज्‍यसभा का सदस्‍य बना हूं, लेकिन मुझे 60 वर्ष का काम करना है। सामाजिक कार्यक्षेत्र में कोई इनसे बड़ा आदर्श पुरूष इस युग में नज़र नहीं आते हैं।
शोक सभा के दौरान आदिवासी चिंतक व वरिष्‍ठ पत्रकार प्रो.रामशरण जोशी ने शब्‍द पुष्‍प अर्पित कर श्रद्धांजलि देते हुए रामदयाल मुण्‍डा से वर्ष 2007 में न्‍यूयार्क में हुई लंबी चर्चा का जिक्र किया। बोले, उनकी चिंता में स्‍पष्‍ट था कि उपभोक्‍तावादी दौर में नए एजेंडे सामने आ रहे हैं। सरकार वन, भू अधिग्रहण कानून ला रही है जो कि कार्पोरेट निगमों के पक्ष में जाता है। सब जगह आदिवासियों की जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है। ऐसे में शांतिपूर्वक तरीके से हम अपनी संपत्ति, अपने अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए राज्‍य-सत्‍ता से लड़ सकते हैं। क्‍या ये संभव है कि जितने भी वंचित वर्ग हैं, हाशिये के लोग हैं, उनका साझा मंच बने। अगर साझा मंच बनता है तो हम राज्‍य-सत्‍ता का मुकाबला कर सकते हैं। आज जो रेड कोरीडोर बढ़ र‍हा है, उसे रोका जा सकता है। जहां वे सोशल एक्टिविस्‍ट के रूप में जाने जाते थे वहीं वे एक अच्‍छे एकेडमिशियन भी थे। बी.डी.शर्मा, रमणिका गुप्‍ता जैसे लोग उनसे लोहा मानते थे। प्रो. मुण्‍डा का निधन संपूर्ण भारतीय नागरिकों के लिए एक सामूहिक क्षति है। हमें सोचना पड़ेगा कि कैसे इस क्षति की भरपायी हो सकेगी। लेकिन इतना जरूर है कि उनकी लड़ाई को आगे जरूर बढाया जाना चाहिए। जो काम उनके पूरे नहीं हुए हैं उसे नई पीढ़ी को पूरा करना है।

डॉ.भदन्‍त आनन्‍द कौसल्‍यायन बौद्ध अध्‍ययन केन्‍द्र के कार्यकारी निदेशक डॉ.एम.एल.कासारे ने मुण्‍डा जी के निधन को सामाजिक क्षति बताते हुए कहा कि उनकी विद्वता का लाभ विश्‍वविद्यालय को मिलता रहा है। दलित एवं जनजाति अध्‍ययन विभाग के पाठ्यक्रम निर्माण में वे हमारे साथ थे। वे समय-समय पर हमारा मार्गदर्शन करते रहे हैं। साहित्‍य विद्यापीठ के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुनील सुमन ने रामदयाल मुण्‍डा को बिरसा मुण्‍डा, सिद्धू कान्‍हू, तिलका मांझी जैसे सामाजिक परिवर्तनकारी बताते हुए कहा कि जहां इन तीनों ने अपनी अस्मिता की लड़ाई तीर कमान से लड़ी वहीं प्रो.मुण्‍डा ने कलम के माध्‍यम से उस लड़ाई को आगे बढ़ाया। प्रो. मुण्‍डा को आदिवासी अस्मिता की बौद्धिक निधि बताते हुए उन्‍होंने कहा कि प्रतिरोध की संस्‍कृति उनके लेखन में और व्‍यक्तिगत जीवन में भी दिखाई देता है। उन्‍होंने विरोध होने के बावजूद भी रांची विवि में आदिवासी भाषा साहित्‍य का विभाग खुलवाया, विभागाध्‍यक्ष बने। बाद में कुलपति भी बने। वे साहित्‍य के साथ-साथ कला के भी पारधी थे, वाद्य यंत्र बजाते थे और नाचते भी थे। जनगणना में जाति के प्रश्‍नों पर उठ रहे सवालों का हवाला देते हुए उन्‍होंने कहा कि चूंकि आदिवासी किसी धर्म में नहीं आते हैं, लेकिन जनगणना अधिकारी हिदू धर्म में निशान कर देते हैं, करीब 10 करोड़ आदिवासी हिंदू धर्म में दर्ज हो जाते हैं, इसका कड़ा विरोध रामदयाल मुण्‍डा ने किया था। जितनी विरासत वे छोड़ गए हैं उसको हम संभालें, यह बड़ी चुनौती है। शोक सभा के दौरान विश्‍वविद्यालय के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी बड़ी संख्‍या में उपस्‍थित थे।

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