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दुख-सुख

टूटेगी 147 साल की परम्‍परा : मारा जाएगा भाड़े का रावण

आगरा। उत्तर भारत की प्रमुख रामलीला के लिए आज का दिन शर्मनाक होगा जब रामलीला कमेटी की विवेकशून्यता और जातिवादी मानसिकता के कारण दशहरा पर किराये का रावण मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बाणों से धराशायी होगा। 147 साल से लगातार आगरा का कुशवाहा परिवार जो रामलीला में रावण परिवार का अभिनय करता था। वह नदारद रहेगा। कभी इस शहर में रामलीला की धूम रहती थी। इसे एक लोकपर्व के रूप में नगर ही नहीं अपितु जिले के लोग मनाते थे। रामलीला के तहत राम बरात को देखने के लिए शहर में आस-पास के जिलों के लोग भी मेहमान के रूप में आते थे और पूरी रात राम बरात का आनंद लेते थे। लेकिन बदलते परिवेश ने रामलीला के परम्परागत स्वरूप को भी नष्ट कर दिया है। कभी इस लोकनाट्य में लोक की भागीदारी होती थी लेकिन वह अब समाप्त हो गई है। अब यह विशुद्ध राजनैतिक अखाड़े में तबदील हो गई है।

आगरा। उत्तर भारत की प्रमुख रामलीला के लिए आज का दिन शर्मनाक होगा जब रामलीला कमेटी की विवेकशून्यता और जातिवादी मानसिकता के कारण दशहरा पर किराये का रावण मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बाणों से धराशायी होगा। 147 साल से लगातार आगरा का कुशवाहा परिवार जो रामलीला में रावण परिवार का अभिनय करता था। वह नदारद रहेगा। कभी इस शहर में रामलीला की धूम रहती थी। इसे एक लोकपर्व के रूप में नगर ही नहीं अपितु जिले के लोग मनाते थे। रामलीला के तहत राम बरात को देखने के लिए शहर में आस-पास के जिलों के लोग भी मेहमान के रूप में आते थे और पूरी रात राम बरात का आनंद लेते थे। लेकिन बदलते परिवेश ने रामलीला के परम्परागत स्वरूप को भी नष्ट कर दिया है। कभी इस लोकनाट्य में लोक की भागीदारी होती थी लेकिन वह अब समाप्त हो गई है। अब यह विशुद्ध राजनैतिक अखाड़े में तबदील हो गई है।
वह जमाना याद आता है कि जब आगरा के बच्चे ही रामलीला के विभिन्न पा़त्रों के रूप में अभिनय करते थे। जिस मोहल्ले के बच्चे राम, लक्ष्मण, सीता, भरत या श़त्रुघ्न बनते थे। वहां के लोगों में उत्साह का समंदर ठाठें भरता था। एक गर्व और स्वाभिमान की अनुभूति होती थी। पूरा मोहल्ला बिना किसी धर्म जाति के भेदभाव के रामलीला देखने जाता था और अपने आप-पास के बच्चों को जब वह अभिनय और मंचन करते देखता तो यकायक ही उनके मुंह से निकल जाता था ‘‘सियावर रामचंद्र की जय‘। लेकिन अब नजारा बदल गया है। विगत 147 वर्षों से रामलीला में रावण दल का अभिनय करने वाले लोग मंच से नदारद हो गये हैं। पूरे शहर की रामलीला मुट्ठी भर लोगों की गिरफत में आ गई है। अब रामलीला में मा़त्र औपचारिकताएं भी पूरी हो रहीं हैं। उसे देखने वालो जनसैलाब गायब हो गया है। मंच के आस-पास रामलीला कमेटी से जुड़े लोग व उनके परिजन भी मंडराते दिखाई देते हैं। उसमें शहर की आम जनता की भागीदारी समाप्त हो गई है।

यह आगरा का दुर्भाग्‍य रहा कि यहां की लगभग सभी लोककलाएं व्यापारियों ने अपने कब्जे में कर लीं। यहां की जीवंत कला जगत के साथ भी यह हुआ। वह दूसरी बात है कि रंगलीला के माध्यम से इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास जारी है। यह कलाकारों की नगरी आगरा के लिए दुर्भाग्‍य और शर्म की बात है कि इसमें मंचन करने वाले कलाकार पेशेवर हैं और उन्हें लगभग छह लाख रुपये देकर बुलाया गया है। रावण की भूमिका अदा करने वाले वीरेन्द्र कुमार उर्फ राजू को रामलीला कमेटी की हठधर्मिता और जातिवादी मनोवृत्ति के कारण अलग होना पड़ा। इस आलेख का लेखक इस बात का साक्षी है कि विगत कई वर्षों से रावण दल का अपमान रामलीला कमेटी कर रही है। वह नजारा कितना शर्मनाक लगता था जब दिग्विजयी रावण जल संस्थान के टेंकर से अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी पीते थे और उधर भाड़े के कलाकारों को ससम्मान मिनरल वाटर की बोतलें उपलब्ध करायीं जाती हैं।

वर्तमान संदर्भ में रामलीला और जनकपुरी कमेटी के टकराव को देखते हुए लगता है कि इस लोकनाट्य पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। वैसे एक बात की तारीफ की जानी चाहिए कि पहली बार जनकपुरी कमेटी ने रामलीला कमेटी के वर्चस्व को चुनौती दी है। रावण दल द्वारा इस रामलीला से अपने को अलग कर लेने से इसका लोकस्वरूप एवं लोकव्यापकता समाप्त हो गई है। देखने से पता चलता है कि रामलीला कमेटी में जाति विशेष के तथा दल विशेष के लोगों का ही वर्चस्व है। इस कमेटी में अधिकांश लोग व्यापारी हैं और जैसी कि इस वर्ग की मानसिकता केवल मुनाफा कमाने में होती है। वहां के हर फैसले इसी तथ्य को ध्यान में रखकर किये जाते हैं। इस कमेटी में शहर की बहुसंख्यक आबादी क्ष़ित्रय, कायस्थ, पंजाबी, दलित व पिछड़ों को दूर रखा जाता है। हां अपने स्वार्थों के लिए अथवा प्रशासन पर दबाव डालने के लिए प्रभावशाली दल के राजनेताओं अवश्य अध्यक्ष पद पर सुशोभित कर दिया जाता है। राम के नाम पर जनकपुरी के लिए खुलेआम बोली लगती है। जो मर्यादा पुरुषोत्तम राम मर्यादा और पिता के वचन का पालन करने के लिए वनवास गये। वहां उन्हें समाज के शोषित वर्गों का समर्थन और सहायता मिली। यह स्पष्ट है कि उन्होंने भीलनी के जूठे बेर खाये। वानर आदिवासियों ने उनकी रावण युद्ध में पूरी सहायता की। केवट ने उनकी जलयात्रा में पर्याप्त मदद की। भगवान राम के इन्हीं विशिष्ट सहयोगियों के वंशजों को रामलीला कमेटी कमतर आंकती आ रही है और इनका अपमान और उपेक्षा करने से भी पीछे नहीं रहती।

जब सभी क्षेत्रों में पुरानी परम्पराओं के स्थान पर मानववादी दृष्टिकोण हावी है। जब सभी लोग समान है तो फिर रामलीला कमेटी से वैश्यों से इतर अन्य जातियों सहित दलित और पिछड़े गायब क्यों हैं? आगरा के कलाकारों को इस महत्वपूर्ण लोकनाट्य में अभिनय और मंचन करने का अवसर क्यों नहीं मिलता? रामलीला के नाम पर वर्ष भर जो चंदा होता है, क्या उसका लेखा परीक्षण हुआ? क्या रामलीला कमेटी ने यह साहस किया कि वह अपने आय-व्यय को सार्वजनिक करे? इन सब सवालों का जबाव यही है कि वर्चस्ववादी लोग किसी भी कीमत पर इस महत्वपूर्ण लोकनाट्य में आम जनता की भागीदारी नहीं चाहते? इसके लिए शहर के बुद्धिजीवियों, कलाकारों, साहित्यकारों, स्वतंत्र चिंतकों और समाजसेवियों को आगे आना होगा और इस महत्वूपर्ण लोकनाट्य रामलीला के भविष्य का नये सिरे से ताना बाना बुनना होगा। बिना लोक के लोकनाट्य कैसा?

लेखक डा. महाराज सिंह परिहार आगरा में जनसंदेश टाइम्‍स के ब्‍यूरोचीफ तथा कवि हैं.

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