यमुनानगर। डीएवी गल्र्स कालेज में चौथे हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के दौरान चलाया जा रहा फिल्म एप्रीशिएशन कोर्स तकनीक व कंटेंट का संगम है। कोर्स के दौरान विद्यार्थियों के जहां बेसिक फंड़े क्लीयर किए जाते हैं, वहीं उन्हें फिल्मों की तकनीक व कंटेंट से भी अवगत कराया जाता है। यह कहना है कि कोर्स के निदेशक मशहूर कथाकार संजय सहाय का। सुरंग जैसे कहानी संग्रह के रचनाकार संजय सहाय की दिलचस्पी प्रतिभाओं को अपने तरह उभारने की भी रही है। हालांकि इस कोर्स की कमान मशहूर फिल्मकार के विक्रम सिंह ने अपने कुशल हाथों से संभाल रखी है। कहीं एक गांव जैसे क्लासिक टीवी धारावाहिक और दर्जनों डाक्युमेंट्री के निर्माता के विक्रम सिंह की पकड़ फिल्म निर्माण के सिर्फ तकनीकी पक्ष पर ही नहीं है, बल्कि कंटेंट पर भी है। यही वजह है कि वे फिल्म एप्रीशिएशन कोर्स में शामिल हुए छात्रों को फिल्म निर्माण की तकनीकी बारीकियां ही नहीं, बल्कि कंटेंट के संदर्भ में भी जता-बता रहे हैं। उनकी समझाने की शैली का समोहन ही कहा जाएगा कि कोर्स में शामिल हो रहे बच्चों की दिलचस्पी बढ़ी है।
पीटीसी न्यूज में काम करने के बाद पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के मीडिया एवं जनसंपर्क विभाग में कार्य कर रहे सरदार अमरप्रीत सिंह कहते हैं कि उनके छात्र तो विक्रम सिंह की शैली के कायल हो गए हैं। विक्रम सिंह की शैली फिल्म निर्माण की परिस्थितियों और समस्या को पहले छात्रों के सामने रखने की है। अमरप्रीत का कहना है कि सिंह ने कला एवं व्यवसायिक सिनेमा के मूलभूत अंतर को पूरी तरह से स्पष्ट किया है। जिससे न सिर्फ छात्रों की, बल्कि हम जैसे पत्रकारिता के प्रध्यापकों का भी नजरिया साफ हुआ है। विक्रम सिंह कहते हैं कि अगर आपको फिल्मों को समझना है, उनमें गहरे तक डूबना है तो बकौल सिंह, पागलपन की समझ आपमें विकसित होनी चाहिए। जाहिर है फिल्म एप्रीसिएशन पढ़ाने की ऐसी शैली निश्चित तौर पर फिल्मों को नये नजरिये से देखने और रचने की दृष्टि विकसित करने में मदद देती है।
विक्रम सिंह छात्रों से उस स्थिति विशेष के लिए काम करने के विकल्प सुझाने को कहते हैं। इससे विषय से छात्रों को सीधे-सीधे जुडऩे का मौका मिलता है। इसके बाद छात्रों की कमियों की तरफ ध्यान दिलाने की बजाय उन्हें गाइड करने की भूमिका में विक्रम सिंह आ जाते हैं। इसके जरिए वे तकनीक और कंटेंट के साथ ही नए सिनेमा में आ रहे नए बदलावों की तरफ ध्यान दिलाते हैं। दिल्ली के एक कॉलेज से आए छात्र शशांक कहते हैं कि पढ़ाने की ये शैली उन्हें फिल्म और उसके निर्माण की दिशा में कुछ नया सोचने के लिए मजबूर कर रही है और निश्चित तौर पर उसका फायदा हो रहा है। के विक्रम सिंह की पढ़ाने की ये शैली ही है कि बच्चे उनसे सीखने के लिए लालायित नजर आ रहे हैं। एक छात्रा का कहना है कि फिल्म की बारीकियां जितना उसने इस कोर्स से सीखी है, उतना शायद ही अपने क्लासरूम में सीख पाई होगी।
तकनीकी विषयों की पढ़ाई से छात्रों को जोडऩा मुश्किल होता है। लेकिन फिल्म एप्रीशिएशन कोर्स में छात्रों को जुड़े हुए देखा जा सकता है। इसके पहले सुरेश शर्मा की क्लास में भी छात्रों में वैसा ही रूझान दिखा था। सुरेश शर्मा का कहना है कि छात्रों को इतिहास बताकर फिल्म निर्माण की जानकारी तो दी जा सकती है पर इसके जरिये उनमें विषय को लेकर रूझान पैदा करना आसान नहीं। लेकिन अगर संवाद किया जाय तो वे तकनीक की चुनौती को भी स्वीकार कर लेते हैं। फिल्म एप्रीशिएशन कोर्स में चुनौती स्वीकार करने की ये प्रवृत्ति बार-बार नजर आती है। कालेज प्रिंसिपल डा. सुषमा आर्य का कहना है कि कोर्स के दौरान विद्यार्थियों को फिल्म से संबंधित तकनीक व कंटेंट को बारीकियों से अवगत कराया जाता है। इसके अलावा उन्हें यह भी बताया जाता है कि वे किस प्रकार से इस क्षेत्र में अपना कैरियर बना सकते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले तीन सालों में १००० से ज्यादा विद्यार्थी फिल्म एप्रीशिएशन कोर्स कर चुके हैं।


