एप्पल कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स के निधन पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वे बताती हैं कि दुनिया ने उनके जाने से क्या खो दिया है। स्टीव के नेतृत्व में एप्पल ने लगातार नई ऊंचाइयों का प्राप्त किया। आज एप्पल ने मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर अमेरिका की ऐक्सॉन मोबिल को भी पीछे छोड़कर दुनिया की कंपनियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लिया है। लेकिन यह सब उनका सही परिचय नहीं है।
असल बात यह है कि ये तमाम सफलताएं एक ऐसे व्यक्ति की हैं, जिसके पास इंजीनियरिंग या किसी भी दूसरे विषय की कोई डिग्री नहीं थी। इसके बावजूद उनका नाम अमेरिका में 300 से अधिक पेटेंट के आविष्कारक या सह-आविष्कारक के रूप में दर्ज है। यह एक ऐसे शख्स की कहानी है, जिसके बचपन से जवानी तक का समय काफी उथल-पुथल से भरा था। एक बिनब्याही मां के घर में जन्म, फिर दत्तक पुत्र के रूप में पालन-पोषण, कॉलेज की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ देना और हर रोज भोजन जुटाने के लिए खासा संघर्ष करना। लेकिन इसी शख्स ने 1997 से 2010 के बीच 13 वर्ष में ही हमारे संगीत सुनने, बात करने, फिल्में देखने और कंप्यूटर पर काम करने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया। तकनीक के उत्पाद पहली बार जीवन शैली का हिस्सा बन गए।
स्टीव के पास कोई डिग्री तो नहीं ही थी, वह हार्डवेयर इंजीनियरिंग और सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग भी नहीं समझते थे। फिर ऐसा क्या था कि उन्हें डिजिटल युग में इतनी प्रसिद्धि मिली? दरअसल स्टीव ने अपने आप को टेक्नो-नेतृत्व की एक ऐसी शैली में ढाला था, जो कि अपने इनोवेटिव विचारों को मूर्त रूप देने के लिए सर्वश्रेष्ठ कर्मचारियों की टीम बनाना जानता था। वह अपनी टीम को लगातार प्रेरित, उत्साहित और उत्तेजित करके एक आदर्श उत्पाद विकसित करना जानते थे, जिसमें उत्पाद की डिजाइन पर उनका फैसला ही आखिरी माना जाता था। बीच में काफी समय तक जब वह एप्पल से अलग हुए, तो उन्होंने एक एनीमेशन कंपनी को खरीदकर कलाकारों और एनीमेटरों की बड़ी टीम तैयार की। इस काम में भी उन्हें खासी सफलता भी मिली। डिज्नी की सबसे सफल एनीमेशन फिल्मों में गिनी जाने वाली ट्वॉय स्टोरी के पीछे स्टीव जॉब ही सबसे बड़ी प्रेरणा थे। वह इस फिल्म के कार्यकारी निर्माता भी थे।
स्टीव की अद्भुत प्रतिभा की एक खासियत थी कि वह हर चीज से सीखना जानते थे। यहां तक कि उन्होंने इसका भी जिक्र किया था कि वह मौत की आशंका से कैसे सीखते रहे और इसका मुकाबला कैसे करते रहे। स्टीव जॉब्स का जीवन संघर्ष हमें यह बताता है कि विषम से विषम परिस्थितियों में भी एक मामूली व्यक्ति दुनिया को कैसे प्रभावित कर सकता है, बशर्ते वह जीवन के हर हालात, यहां तक कि मौत को भी अपना गुरु बना सके।
लेखक हरिवंश चतुर्वेदी बिमटेक के डायरेक्टर हैं. उनका यह लिखा दैनिक हिंदुस्तान से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


