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व्‍यापक लेखन आंदोलन के लिए जलेस और जसम का साझा मोर्चा जरूरी : डा. नामवर सिंह

लखनऊ : प्रगतिशील लेखक संघ की 75 वीं वर्षगांठ पर आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन के अंतिम दिन संगठन और राजनीतिक परिस्थितियों पर खुलकर चर्चा हुई। प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा0 नामवर सिंह ने अपने समापन वक्तव्य में कहा कि संगठन को नई चुनौतियों को समझने और उनके जवाब प्रस्तुत करने के लिए आज एक नए घोषणा पत्र की जरुरत है ताकि जब सौवां वर्षगांठ मनाई जाय तो लोगों को अपने सामाजिक और राजनीतिक कार्यभार का एहसास हो। उन्होंने कहा कि आज एक व्यापक लेखन आंदोलन खड़ा करने के लिए जरुरी है कि जलेस और जसम के साथ भी साझा मोर्चा बनाया जाय। उन्होंने लेखक संगठन के मातृ पार्टी के साथ वैचारिक साझेपन पर भी जोर दिया।

लखनऊ : प्रगतिशील लेखक संघ की 75 वीं वर्षगांठ पर आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन के अंतिम दिन संगठन और राजनीतिक परिस्थितियों पर खुलकर चर्चा हुई। प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा0 नामवर सिंह ने अपने समापन वक्तव्य में कहा कि संगठन को नई चुनौतियों को समझने और उनके जवाब प्रस्तुत करने के लिए आज एक नए घोषणा पत्र की जरुरत है ताकि जब सौवां वर्षगांठ मनाई जाय तो लोगों को अपने सामाजिक और राजनीतिक कार्यभार का एहसास हो। उन्होंने कहा कि आज एक व्यापक लेखन आंदोलन खड़ा करने के लिए जरुरी है कि जलेस और जसम के साथ भी साझा मोर्चा बनाया जाय। उन्होंने लेखक संगठन के मातृ पार्टी के साथ वैचारिक साझेपन पर भी जोर दिया।

वरिष्ठ भाकपा नेता अतुल कुमार अंजान ने कहा कि आज साहित्य में भी आवारा पूंजी के साथ आवारा मीडिया और आवारा साहित्य का उत्पादन शुरु हो गया है। जिससे आज प्रगतिशील लेखक आंदोलन को लड़ना होगा। साहित्य और संस्कृति ही बेहतर राजनीतिक विकल्प का रास्ता बनाते हैं आज प्रलेस को इस जिम्मेदारी को निभाना होगा। वरिष्ठ लेखक प्रो0 चैथी राम यादव ने कहा कि सोवियत यूनियन के विघटन को साहित्यकारों ने मार्क्‍सवादी समाजवाद के खात्में के बतौर ले लिया जो एक भ्रामक विश्लेषण था। उन्होंने कहा कि साहित्य को फिर से मार्क्‍सवाद को एक विकल्प के बतौर प्रस्तुत करना होगा यही प्रगतिशील लेखक संघ की राजनीतिक जिम्मेदारी है। ऐसे में प्रलेस को किसान मजदूर आदि के सहवर्ती आंदोलनों से जोड़ना होगा। जनता के प्रति प्रतिबद्धता लानी होगी तभी पक्षधरता के जोखिम सामने आएंगे।

वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि प्रगतिशील लेखक संघ आधुनिक भारत का पहला ऐसा लेखक आंदोलन था जिसने साहित्य को राजनीति से जोड़ने का काम किया था। आज इस परम्परा को फिर से मजबूत बनाने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि उपनिवेशिक काल में प्रलेस ब्रिटिश साम्रज्यवाद के साथ-साथ धार्मिक कठमुल्लावाद से भी लड़ा था आज इस आंदोलन को फिर से इस भूमिका में आना होगा। वाराणसी से आए मूलचंद्र सोनकर ने कहा कि आज दलितों और पिछड़ों के सवालों को भी अपने विमर्श में रखना होगा। उन्होंने कहा कि सावित्री बाई फुले, पंडिता रमाबाई को आप संज्ञान में नहीं लेंगे तो उनका गलत लोगों द्वारा इस्तेमाल आप नहीं रोक पाएंगे।

दिल्ली से आए वरिष्ठ लेखक श्याम कश्‍यप ने कहा कि संगठन पर अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए जब तक संगठन का पार्टी के साथ संबन्ध रहा आंदोलन अपनी भूमिका में ज्यादा कारगर साबित रहा। सम्मेलन में पिछले दिनों लेखिका शीबा असलम फहमी पर हुए हमले की निंदा की गयी। सम्मेलन मे मुख्य रुप से शामिल रहे दीनू कश्यप, प्रो0 काशीनाथ सिंह, राजेन्द्र राजन, अली जावेद, साबिर रुदौलबी, डा0 गया सिंह, जय प्रकाश धूमकेतु, संजय श्रीवास्तव, आनन्द शुक्ला, हरमंदिर पांण्डे, नरेश कुमार, सुभाष चंद्र कुशवाहा, रवि शेखर, एकता सिंह, शाहनवाज आलम आदि शामिल रहे। प्रेस रिलीज

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